शकील अख़्तर,इंदौर स्टूडियो। हिन्दी रंगमंच की एक बेमिसाल शख़्सियत थे मोहन महर्षि। एकदम अलग और बेजोड़। वे अपनी धुन के योगी थे, अपने काम के प्रति प्रतिबद्ध और समर्पित। हाल ही में उनका 83 साल की उम्र में निधन हो गया। उनके जाने पर भले उतनी बड़ी हलचल न दिखी हो, मगर रंगमंच को लेकर किये गये उनके कामों को कभी भुलाया नहीं जा सकता। ऐसा काम जो किसी पाठ्यक्रम और किसी शोध से कम नहीं। उन्हें करीब से जानने वाले A Complete Theatre Personality (एक संपूर्ण रंग-व्यक्तित्व) के रूप में याद कर रहे हैं। मानते हैं कि इब्राहिम अल्काज़ी के बाद उनके रंगकर्म को सही मायनों में मोहन महर्षि ही आगे बढ़ाने का काम कर रहे थे। (स्व. महर्षि निर्देशित नाटक ‘आइंस्टीन’ का एक दृश्य)
50 बरस का सफ़र, 90 नाटकों का निर्देशन: महर्षि जी ने अपने 50 साल से अधिक के रंगमंच के सफ़र में 90 से अधिक नाटकों का निर्देशन किया। महज़ एक निर्देशक के रूप में ही नहीं आपने, एक नाटककार, स्टेज डिज़ाइनर, एक अध्यापक और रंगमंच प्रशासक के रूप में भी अपने काम की अमिट छाप छोड़ी। अपने नाट्य प्रयोगों की एक अलग दुनिया और इतिहास रचा। आप राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय,दिल्ली के निदेशक रहने के साथ ही मॉरीशस सरकार के थियेटर सलाहकार और पंजाब यूनिवर्सिटी में रंगमंच के प्रोफेसर रहे। कई देशी-विदेशी नाट्य हस्तियों के साथ मिलकर बेहतरीन काम किया। (सैट डिज़ाइनर के रूप में भी महर्षि के प्रयोग एक पूरा पाठ्यक्रम बन गये। नाटक ‘आइंस्टीन’ का मंच।)
एक से बढ़कर एक प्रयोग: मोहन महर्षि ने नाटकों के एक से बढ़कर एक प्रयोग किये। अभिनव कल्पना और मंच की बेमिसाल सज्जाकारी प्रस्तुत की। उनकी सबसे यादगार प्रस्तुतियाँ हैं- सुनो जनमेजय (1964), शुतुरमुर्ग (1965), एवम् इंद्रजीत (1967), आषाढ़ का एक दिन (1968), अंधा युग (1975), रानी जिंदन (1981), जोसेफ का मुकद्दमा (1987), आइंस्टीन (1994), राजा की रसोई (1998), दीवार में एक खिड़की रहती थी (2001), ऑथेलो (2005), विद्योत्तमा (2006), डियर बापू (2006), मैं इस्ताम्बुल हूं (2008), नाटक – दीवार में एक खिड़की रहती थी (2013)
कई यादगार प्रस्तुतियों के निर्देशक: इसके साथ ही मौलियर का कंजूस, शेक्सपियर का ‘ए मिड समर नाइट्स ड्रीम’, जीन एनोइल का ‘एंटीगोन’, सोफोकल्स का ‘ओडिपस’, ड्यूरन मैट का ‘द विजिट’ और गिरीश कर्नाड का ‘तुगलक’ जैसे उनके निर्देशित नाटक भुलाये नहीं जा सकते। मॉरीशस में आपने स्थानीय कलाकारों के साथ ‘अंधा युग’ का निर्माण किया था, आषाढ़ का एक दिन और एवम् इंद्रजीत का निर्देशन भी किया। (नाटक ‘विद्योत्तमा’ का एक दृश्य। एक स्टेज डिज़ाइनर के रूप में इस नाटक में भी महर्षि जी की कल्पना मुग्ध करती है।) 
विदेशी नाटकों का उत्कृष्ट अनुवाद: रंगमंच को एक निर्देशक के रूप में ही नहीं मोहन महर्षि का एक लेखक के रूप में बहुत बड़ा योगदान मिला। उन्होंने नाटक लिखे, अनुवादित और रूपांतरित (adaptations) किये। उनके अनुवाद इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि वे केवल अनुवाद नहीं है। उनके ख़ास अनुवादित नाटकों में अगस्त स्ट्रिंडबर्ग का ‘द फादर’, सोफोकल्स का ‘ओडिपस’ और औलिस का ‘इफिजेनिया’, एशिलस का ‘एगैमेमोन’, यूरिपेड्स का ‘ट्रोजन महिला’, बर्टोल्ट ब्रेख्त का ‘मां’, जीन पॉल सार्ट का ‘मेन विदाउट शैडो’ और शेक्सपियर का ‘ऑथेलो’ को याद कर सकते हैं। इसके अलावा काफ्का का ‘द ट्रायल’ पर आधारित ‘जोसेफ का मुकदमा’, ‘हो रहेगा कुछ ना कुछ’, अनुराग माथुर का ‘लाइफ ऑफ एन एक्जीक्यूटिव’ पर आधारित ‘साँप-सीढ़ी’, और इसी नाम से विनोद शुक्ला के उपन्यास पर आधारित ‘दीवार में खिड़की रहती थी’ उनके रूपांतरित प्रयोग हैं। (नाटक ‘इस्ताम्बुल’ का मंच और उसका एक दृश्य)
देश-विदेश में महत्वपूर्ण पदों पर रहे: 1970 में, महर्षि को दूरदर्शन, नई दिल्ली में निर्माता नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने समसामयिक मामलों के साथ-साथ साहित्यिक कार्यक्रम भी तैयार किए। 1973 में उन्होंने दूरदर्शन के निर्माता के रूप में अपनी नौकरी छोड़ दी और मॉरीशस चले गए। मॉरीशस के प्रधान मंत्री के सांस्कृतिक सलाहकार के रूप में उनका नया कार्यभार चुनौतीपूर्ण था। उन्होंने इंडो-मॉरीशस समूहों के बीच काम किया और हिंदी, उर्दू, तमिल, तेलुगु और मराठी में वार्षिक थिएटर उत्सवों की शुरुआत की। उन्होंने विदेशों में विभिन्न त्योहारों और अंतर्राष्ट्रीय थिएटर सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। महर्षि ने पीटर ब्रूक, यूगिनो बारबा, कार्लोस कुन, हेनर मुलर और सत्यजीत रे जैसे अंतरराष्ट्रीय थिएटर और फिल्मी हस्तियों से मिलने के लिए दुनिया भर की यात्रा की। (नाटक ‘जोसफ़’ का एक दृश्य)
रंग-शिक्षक के रूप में विशिष्ट योगदान: एक टीचर के रूप मोहन महर्षि ने, एनएसडी से लेकर विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों तक अपना विशिष्ठ शैक्षणिक योगदान दिया। वे विद्यार्थियों से प्यार करने वाले एक बेहतरीन टीचर बने। आप, 1980 से पंजाब वर्ल्ड स्कूल के रंगमंच विभाग में प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष के रहे। बाद में वाइस चांसलर भी बने। 1984 में, महर्षि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय,दिल्ली के निदेशक बने। उन्होंने एनएसडी के उपाध्यक्ष और कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। इसके अलावा सरोजिनी नायडू स्कूल ऑफ आर्ट्स, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हैदराबाद, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली, कानपुर और हैदराबाद, राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान, अहमदाबाद ,दून स्कूल, देहरादून, इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज, शिमला में भी अध्यापन से जुड़े रहे। रंगमंच संबंधी गतिविधियों के साथ देश में रंगकर्म को आगे बढ़ाया। (स्व.महर्षि लिखित नाटक ‘राजा की रसोई’ का एक दृश्य)
अजमेर में जन्म, जयपुर में रंगकर्म: 83 बरस पहले, 30 जनवरी, 1940 को अजमेर में मोहन महर्षि का जन्म हुआ था। आपने राजस्थान यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद नाटक की दुनिया को समझने के लिये दिल्ली पहुँचे। यहाँ इब्राहिम अलकाज़ी के ज़माने में आपने एनएसडी से स्नातक की उपाधि (1964) प्राप्त की। इसके बाद दिल्ली और जयपुर में ‘दिशांतर’ और बाद में ‘संकेत थिएटर समूह’ की स्थापना की। जयपुर में आपने राजस्थान यूनिवर्सिटी के छात्रों के साथ काम करते हुए रंगमंच आंदोलन की शुरुआत की। बादल सरकार (एवम इंद्रजीत), ज्ञानदेव अग्निहोत्री (शुतुरमुर्ग) और आद्या रंगाचार्य (सुनो जनमेजय) जैसे नाटककारों की प्रस्तुतियों से अपनी तरह के रंगमंच की शुरूआत की। (2005 में मंचित नाटक ‘डियर बापू’ का एक दृश्य) 
भुला न सकेगा अपने महर्षि को राजस्थान: शुरूआती दौर में आपने जयपुर में काम करते हुए विदेशी नाटकों के प्रयोग भी किये थे। इनमें बर्तोल्त ब्रेख्त, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, हेनरिक इबसेन और ड्यूरेनमैट के नाटकों का निर्देशन शामिल रहा। दिल्ली से लेकर जयपुर का यह काम रंगकर्म के क्षेत्र में उनके विस्तार का आधार बना। देखते-देखते वे रंग-जगत की एक नामी शख़्सियत बन गये। रंगमंच के क्षेत्र में स्व.महर्षि के योगदान को राजस्थान कभी भुला न सकेगा।
स्व. महर्षि एक अविस्मरणीय अध्याय: मोहन जी को बहुत से सम्मानों के साथ ही 1993 में संगीत नाटक अकादमी ने नाट्य जगत के सर्वोच्च पुरस्कार से नवाजा गया। मगर आज उनके बारे में हम अध्धयन करते हैं, तब लगता है रंगमंच की ऐसी बुलंद शख्सियत का कम ही आकलन हो सका है। मोहन महर्षि रंगमंच का अपने आप में अविस्मरणीय अध्याय हैं, एक पाठ्यक्रम हैं। उनके काम और योगदान को कभी भुलाया ना जा सकेगा। नाटकों के अलावा भारत एक खोज जैसे धारावाहिक में अभिनय के साथ फ़िल्म के क्षेत्र में उनका काम रहा है। यहाँ हमने उनके रंगमंच में किये गये कामों की ही याद किया है। उनके अवसान पर विनम्र श्रद्धांजलि। आगे पढ़िये –
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