जयसिंह रघुवंशी,इंदौर स्टूडियो डॉट कॉम,23 अप्रैल 2020। सुनील मिश्र से मेरी पहली मुलाकात मेरे गुरु स्व. श्रीराम ताम्रकर के जरिये हुई थी। श्रीरामजी को सुनील भी अपना गुरु मानते थे, इस लिहाज से वे मेरे गुरु भाई हुए। उनके नहीं रहने से मुझे लग रहा है कि मेरा अपना भाई चला गया हो। अभी उम्र ही क्या थी उनकी। एक फिल्म लेखक के रूप में उनके पास देने के लिए बहुत कुछ था। अभी तो उन्होंने शुरुआत ही की थी। कला-संस्कृतिकर्मी, लेखक, फिल्म समीक्षक और विश्लेषक होने के नाते कितने आलेख, किताबें, किस्से उनके मन के कोनों में छिपे हुए थे। धीरे-धीरे वे उन्हें आकार दे रहे थे। आंच पर सेंक रहे थे, लेकिन इसके पहले ही उन्हें हमसे छिन लिया गया। उनके जाने से हम कितने आलेखों, नाटकों और किताबों से वंचित रह गए।
सुनील बेहद मृदुभाषी थे। स्वभाव में उन्हें सरलता पसंद थी। इसलिए उनका दायरा बहुत विस्तृत था। कला प्रेमी, लेखक, कलाकारों से उनकी गहरी दोस्ती थी। यह दोस्ती पारिवारिक हो जाया करती थी। वे जब भी किसी से हालचाल पूछते थे तो उसके अपनों की खैर-खबर जरूर लेते थे। उम्र में बड़ों को सम्मान और छोटों को प्यार देना उनके स्वभाव का अभिन्न हिस्सा था।
सुनील बेहद मेहनती और ईमानदारी के साथ अपने कार्य को अंजाम देते थे। मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग में तयशुदा घंटों से ज्यादा काम करते थे। देर रात उनका घर लौटना होता था। शहर दर शहर घूमते रहते थे। ऐसा कई बार होता था कि वे सुबह ट्रेन से सफर कर घर लौटते और शाम को दूसरे शहर के लिए ट्रेन से रवाना हो जाते थे, लेकिन कभी इसकी शिकायत वे नहीं करते थे। उनकी चिंता सदैव इस बात के लिए होती थी कि कार्यक्रम गरिमापूर्ण और स्तरीय हो। इतना काम होने के बावजूद वे कभी हड़बड़ी में नजर नहीं आए। तल्लीनता से वे अपना काम करते थे। यही बात उनके लेखन में भी नजर आती थी। कई घंटे की नौकरी के बाद भी वे रात में अपने लैपटॉप पर अपने लेखन को अंजाम देते थे। विशेष आलेखों के लिए वे काफी तैयारी और रिसर्च करते थे और संतुष्ट होने के बाद ही पन्ने पर उतारते थे। सिनेमा का उन्हें शौक था और लेखन के लिए उन्होंने इसी विधा को चुना। सिनेमा पर ज्यादातर गॉसिपनुमा लिखा जाता है, लेकिन सुनील भाई के लेखन में गंभीरता, ठहराव और गहराई नजर आती है। एक विश्लेषक के रूप में उनका नजरिया नई बातों को पेश करता था। कला फिल्मों के प्रति उनमें गहरी रूचि थी। उन्होंने कई प्रतिष्ठित और नामी कलाकारों के लंबे इंटरव्यू लिए, जिसमें उनके प्रश्न सारगर्भित और गहराई लिए हुआ करते थे। इंस्टाग्राम में उन्होंने 100 से ज्यादा कलाकारों के लाइव इंटरव्यू लिए और उनका यह कार्यक्रम बेहद पसंद किया गया।
तीन साल पहले उन्हें सर्वोत्तम फिल्म समीक्षक के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान प्राप्त करने के बाद उन्होंने कहा- ‘तकरीबन 20 साल की लेखन यात्रा को सम्मान मिला है। यह मेरा सम्मान नहीं, बल्कि उन कलाकारों, लेखकों व संस्कृतिकर्मियों का सम्मान है, जो अपनी रचनाधर्मिता की यात्रा छोटे शहरों से शुरू करते है। अव्वल तो फिल्मों पर लेखन मायानगरी मुंबई से शुरू होता है और वहीं खत्म होता है। पुरस्कार इस मायने में महत्वपूर्ण है कि पहली दफा मध्यप्रदेश के किसी संस्कृतिकर्मी व लेखक को मिला है।’ सुनील मिश्र ने अपनी लेखन यात्रा और कला पत्रकारिता की शुरूआत नईदुनिया से की थी। वे अक्सर कहा करते थे कि ‘कला पत्रकारिता में श्रीराम ताम्रकर का साथ मुझे वर्ष 1979 से मिला। मैंने लगातार उनके सानिध्य पत्रकारिता सीखी और लगातार रियाज करता रहा। यह पुरस्कार एक तरह से मेरे गुरुजनों को आदरांजलि है। वे मुझे सदैव याद रहेंगे।’
देश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनके आलेख छपे। हिंदी फिल्मों के बारे में गंभीर लेखन करने वाले दिन पर दिन कम होते जा रहे हैं और इसको लेकर वे चिंता भी व्यक्त करते थे। उनकी नाराजगी उन पत्र-पत्रिकाओं से भी थी जो गंभीर किस्म के लेखन को जगह नहीं देते थे। आकाशवाणी-दूरदर्शन के अलावा अनेक चैनलों के लिए उन्होंने सिनेमा केन्द्रित कार्यक्रमों का समन्वय-संयोजन किया। वह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि़द्यालय के अनेक सत्रों में फिल्म पत्रकारिता की कक्षाएं भी लेते थे। वे अनेक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में सहभागी रहे। उन्होंने अमिताभ बच्चन पर एक किताब एक दशक पहले लिखी थी। सुनील मिश्र भारत सरकार के विज्ञान एवं तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा सिनेमा एवं रंगमंच पर तैयार किए गये परिभाषा कोष की सलाहकार समिति में भी रहे। सिनेमा पर विश्लेषणात्मक लेखन के लिए वे हमेशा याद किए जाएंगे।

