Wednesday, May 13, 2026
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वो रोना चाहती है और सब कहते हैं ‘वह हंसती बहुत है !’

(स्वरांगी साने के कविता संग्रह पर विजय कुमार मल्होत्रा की समीक्षा रिपोर्ट)
   इंदौर स्टुडियो। जब भी उससे पूछा जाता है, ‘कैसी हो’ तो वह हँस देती है। पूछते हैं उससे-इसमें हँसने की क्या बात ! हाँ हँसने वाली कोई बात नहीं होती..दर असल वह रोना चाहती है और सब कहते हैं ‘वह हँसती बहुत है’।  …स्वरांगी साने रचित यह कविता उनके संग्रह की शीर्षक कविता हैं। उनके संग्रह का नाम भी है – ‘वह हँसती बहुत है।’ स्वरांगी के इस कविता संग्रह में प्रेम और विरह की सूक्ष्म और मार्मिक अनुभूतियां हैं। स्त्री के जीवन और अंतर की सच्ची कविताएं हैं।
मेरी कविताओं में टूटने की पीड़ा :
स्वरांगी ने स्वयं ‘आत्मकथ्य’ में स्वीकार किया है कि ‘ मेरी कविताओं में टूटने की पीड़ा है, क्योंकि वही घनीभूत हो गई है मुझमें।’ कदाचित् यही भारतीय समाज में स्त्री के जीवन का सच है…स्त्री जीवन की विडंबना है। जैसे कि फ़रमान नाम की एक कविता में कहती हैं…’मठाधीशों ने ‘फ़रमान’ सुना दिया है….ज़ोर से मत हँसो..इस तरह मत देखो….इतना सजना ठीक नहीं…इतना नखरा अच्छा नहीं…धीरे हँसो / नीचे देखो…।’ कविता-संग्रह के तीन भाग हैं… ‘वह जब कहती है’, ‘वह करती है प्रेम’ और ‘वह चाहती है ‘लय’….’ लेकिन तीनों भागों में संकलित कविताओं में अंतर्निहित है…कवयित्री की घनीभूत पीड़ा। कुछ नहीं प्याज़ काट रही हूं..!
   भाँति-भाँति के प्रतीकों के माध्यम से कवयित्री ने इस रिसते दर्द को उकेरा है. ‘प्याज’ शीर्षक से लिखी अपनी कविता में स्वरांगी ने प्याज के प्रतीक का अद्भुत प्रयोग किया है। इसमें हर पीढ़ी की नारी की व्यथा निहित है। जब देखो माँ प्याज काटने बैठ जाती थी…दीदी को भी प्याज काटना बड़ा प्यारा लगता था। तब समझ नहीं पाती थी, लेकिन आज बेटी पूछती है, क्या हुआ ? तो वह कह देती है, कुछ नहीं.. प्याज काट रही हूँ।कवयित्री सावधान करती है उन तमाम लोगों को जो रोती बच्ची  को हँसाने की कोशिश करते हैं, ध्यान रखिए आप पर उसे फुसलाने का आरोप लग सकता है। ‘किरायेदार’ के माध्यम से वह कहती है कि लड़की का कोई घर अपना नहीं होता। ‘अहिल्या’ को प्रतीक बनाकर स्त्रियों के बारे में वह कहती है या तो उसे पतिव्रता होना है या पत्थर। उसके लिए तीसरा कोई विकल्प नहीं है। वह कुछ कहना चाहती है, लेकिन सच तो यह है कि वह कुछ कहना नहीं चाहती। अपनी ‘जादू’ कविता में वह बताती है कि जब भी वह बीमार पड़ती थी तो दादी की पोटली खुल जाती थी। आज दादी-नानी बनने पर समझ में आता है कि ये गिलगिलगप्पा का जादू कैसे काम करता है। ‘परफ़ेक्शन’ में वह ओढ़ी झूठी मुस्कान को ही ‘परफ़ेक्ट’ होते समाज का प्रतीक मानती है, लेकिन अपने-आपसे तेज़ी से निष्कासित होते रहने की व्यथा से आहत हो जाती है। ‘देह’ में वह स्त्री की देह के बारे में माँ की परिभाषा को याद रखती है..’देह भूख है…तृप्त रखना हमेशा…हौले से कहा था माँ ने..’ उसको समझ में आने लगता है अपना रोग कि ‘तुम हो लड़की’.. कहाँ तो वह निपट अकेले ही लड़-भिड़ जाना चाहती थी पूरी व्यवस्था से, लेकिन उसने ऐसे कुछ नहीं किया, क्योंकि उसे हार मान लेने का रोग लग गया है।स्त्री शिद्दत से करती है प्यार :
स्त्री जब प्यार करती है तो शिद्दत से करती है। जब तुम नहीं होते तभी वह चिड़चिड़ी हो जाती है..कोई कहता है बी.पी. बढ़ गया है…उसे पता है अपने मर्ज़ का इलाज़, लेकिन तुम मेरे अजीब तरह से पेश आते करने की वजहें ढूँढते रहते हो..जबकि उसकी संजीवनी बूटी तुम हो… मासिक धर्म के स्राव के कारण जब उसे अपवित्र मान लिया जाता है तो वह अपने भीतर रिसते दर्द को सहते हुए अपनी व्यथा को प्रकट करते हुए कहती है कि वह जब दो कदम भी न चल पाती है तब भी दौड़-दौड़ करती है तीमारदारी। ‘पर’ शीर्षक से लिखी उसकी कविता में उसके आँसू, उसका दर्द और उसके एकाकीपन के बीच छिपी है उसकी चाह कि वह उसके कंधे पर सिर रख ले, लेकिन आखिर मिल ही गया उसे चार कंधों का सहारा..पर उसे अब क्या!
समुद्र में इतना खारापन कहाँ से आया ?
भाग 2 के अंतर्गत समुद्र को देखकर वह जानना चाहती है कि समुद्र में इतना खारापन कहाँ से आया ? मैंने एक बार मीठी नदी को समुद्र में रोते देखा था। ‘संवाद’ कविता में वह खुद से संवाद शुरू करने अर्थात् अपने-आपको पहचान पाने का राज़ खोलते हुए बताती है कि जब उसने तुम्हें फ़ोन किया तो तुम न मेरी आवाज़ पहचान पाए, न मेरा नाम ही…. पूछ बैठे कौन….इस प्रश्न ने मुझे अब तक उलझा रखा है और मैंने बंद कर दिया है तुमसे अपना वार्तालाप..अब शुरू हुआ है मेरा खुद से संवाद। ‘पाप किया ऐसा’ कविता में वह अपने पाप को स्वीकार करते हुए बताती है कि बचपन से सीखे पाठ के अनुरूप ही प्यार करने के बावजूद वह कह उठती है कि ‘नहीं है प्यार में…’. ‘दो रूप’ शीर्षक की अपनी कविता में वह प्रेमी और पति के प्रति प्यार के दोनों रूपों को बहुत अच्छी तरह परिभाषित करती है. प्रेमी से कहा कई बार..बहुत याद आ रही है तुम्हारी और पति से पूछा इतना ही कि कब घर आ रहे हो…प्रेमी से जब मिली पूरा श्रृंगार किया …पति के सामने अस्त-व्यस्त ही रही।हज़ारों बार किया गुनाह..बनी मुजरिम :
‘मुज़रिम’ शीर्षक की अपनी कविता में वह अपने ज़ुर्म को स्वीकार करती है कि उसने एक-दो बार नहीं, हज़ारों-हज़ार बार मारा है अपनी इच्छाओं को…गला घोंटा है उनका, तीखे वार किये हैं उन पर…वह यह स्वीकार करती है कि चाहे तो वह जी सकती है पर ऐसे कि जैसे वह है ही नहीं…प्रेम करने का राज़ बताते हुए ‘ऐसे करना प्रेम’ कविता में वह कहती है कि तुम्हारा नाम हर जगह से पोंछना …किसी को नहीं दिखाना…जब करें तुम्हारी बात तब साध लेना चुप्पी… ‘याचना’ शीर्षक की अपनी कविता में वह अपने को पगली बताती है। ‘परिचय’ में वह अपना नाम बताती है उर्मिला, जिसे छोड़ गया था लक्ष्मण बिना उसकी किसी गलती के । ‘फ़ेसबुक’ के छद्म संसार में दोस्तों की  संख्या बढ़ने पर भी वह समझ लेती है कि कोई अपना कहने को नहीं है आसपास । उसकी चाहत इतनी ही है कि कुछ पैसे छिपा लूँ चावल की डिब्बे में…जिसे मेरे अलावा कोई न खोज पाए कभी…जब कुछ न हो मेरे पास..तब तुम्हारे प्यार को पा सकूँ. ‘रसोई’ की आड़ में वह छिपाती रही उसका नाम…पूछा सबने कौन है…क्या नाम है उसका तो उसने हँसकर बता दिया नाम…ये रोटी…ये दाल… और छिपाकर रख लिया उसे देह की हाँडी में जीवन के ताप पर .. ।
तुम्हारी दुनिया में अब मेरी जगह नहीं :
सुखद ‘यात्रा’ के नियम के बहाने वह बताती है कि यात्रा करते समय अनावश्यक बोझ नहीं ढोते और तुमने उतार फेंका मुझे..हँसकर कहा जाता है न अलविदा..जैसे तुम कह रहे थे …मेरे आँसू इतनी बात न समझ पाए और तुम नाराज़ हो गए…पूछ रहे थे क्या लाऊँ…मैं फफक उठी – लौट आओ…नदी, पर्वत, तालाब, झरने, फूल, पौधे ..इमारतें-खंडहर …तुम निकल पड़े दुनिया देखने…मेरी तो पूरी दुनिया ही तुम थे…जिसे साथ ले गए थे..अपने साथ…मुझे अकेला छोड़…कह रहे थे…तुम्हारी दुनिया में..अब मेरी जगह नहीं रही…पर गए तो तुम थे..मैं तो अब भी यहीं हूँ जस की तस…ये तुम्हारे दिये दुःख हैं, तुम्हारी दी पीड़ा है, यात्रा से लौटे हो..मेरे लिए ये कैसे उपहार लेकर?  ‘डर’ शीर्षक की कविता में पति-पत्नी की उबाऊ ज़िंदगी का बखूबी वर्णन किया गया है…जब हम नहीं होते साथ तो नहीं होते साथ…पर जब होते हैं साथ तो हम नहीं जीते वैसे जैसे सब जीते हैं…तब मैं जीती हूँ…जैसा तुम चाहते हो और तुम जीते हो जैसा मैं चाहती हूँ….हम प्रेम करते हैं ऐसे जैसे इसी तरह हो सकता है जीवन का श्रेष्ठतम प्रेम…सबके साथ होते हुए भी अकेले पड़ जाते हैं हम.. जब नहीं होते साथ-साथ..हाँ, हम अकेले हो जाने से डरते हैं.. । ‘अनावृत’ कविता में वह पति-पत्नी के प्रेम की तुलना सूखे पत्ते से करते हुए कहती है…मैंने चाहा तुम्हें…जैसे पत्ते चाहते हैं …और फिर खुद ही सूखकर अलग हो जाते हैं…।
ज़्यादा ज़रूरी है स्वर..आरोह-अवरोह :
तीसरे भाग में कवयित्री नृत्य के प्रतीक के माध्यम से गायिका के परमानंद का वर्णन करते हुए कहती है कि गायिका को न शब्दों का उपालंभ चाहिए…न उनके अर्थों की व्यंजना…उसके लिए शब्द से भी ज़्यादा ज़रूरी है कि स्वर, आरोह-अवरोह.. वह स्वरों में खो रही है..वही है उसका परमानंद, उसका मोक्ष.. ‘नर्तकी’ कविता में वह नर्तकी की तरह जाएगी विंग्स में… लौटेगी फिर से अपने अँधेरे में..’आम्रपाली’ बस नाचना जानती थी..लेकिन जब उसके पास आया कोई तो वह नाचना भूल गई… ‘अष्टनायिका’ शीर्षक की अपनी अंतिम कविता में वह कवयित्री जो स्वयं बहुत अच्छी नर्तकी भी है…नायिका भेद समझाते हुए भी अपने दर्द को अलग-अलग नायिकाओं के माध्यम से उकेरती चली जाती है…’प्रोषितपतिका’ कहती है …तुम चले गए हो यह कहकर कि लौटोगे…उसने भी माना यही कि जाने के साथ जुड़ा होता है लौटना…’खंडिता’ नायिका को देखकर वह समझ नहीं पा रही कि उसकी आँखों की चमक में किसी और की लौ क्यों है भला?  ‘विप्रलब्धा’ को देखकर वह कहती है… तुमने कहा था आज मिलेंगे…मिलेंगे ऐसे जैसे कभी न मिला कोई…वहाँ उस जगह मिल गए पृथ्वी, गगन नीर, पवन, अग्निदेव भी…नहीं मिले तो बस इन पंच तत्वों से बने तुम….’उत्कंठिता’ सोचती रह जाती है कि तुम आओगे…तो सबसे पहले क्या पूछोगे …पूछोगे उसका हाल या अपने आने के कारण गिना दोगे।
आँखों में इतना नीर कि सब कहें सदानीरा :

‘नीर’ शीर्षक की अपनी कविता में उसकी आँखों में इतना नीर है इतना कि सब उसे सदानीरा के नाम से जानते हैं. सदानीरा परेशान है और पूछे जा रही है ‘नीर भरन कैसे जाऊँ सखि अब’ ! …. कहते हैं ‘उसने घाट-घाट का पानी पिया है’ पर वह तो हर घाट से लौटी है खाली हाथ..सबका मानना है ‘समरथ को नहीं दोष गुंसाई’ अब वह खुद ही मान रही है कि वह है दीन-हीन तो निश्चय ही दोषी होगी वह ही…सब कह रहे हैं ऐसा हो नहीं सकता कि ‘नाम नयनसुख और हो अंधा’…उसका नाम ही है सदानीरा…उसके पास तो होना ही चाहिए, होगा ही…और वह लिप्सा की गगरी लिये निकली है जल की टोह में… इस कविता-संग्रह में प्रेम, बिछोह और उसकी पीड़ा की व्यंजना बहुत सूक्ष्म और मार्मिक ढंग से की गई है।
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