Wednesday, May 20, 2026
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दिल्ली के कैम्पस कैसे सजता है नुक्कड़ नाटकों का रंग

थिएटर ओलम्पिक्स में इस बार दिल्ली के 65 कॉलेज के छात्र कलाकार भी हिस्सा ले रहे हैं। हर नाटक में कमसेकम 12 से 15 कलाकार शामिल हो रहे हैं। नाटकों में उनका जोश देखते ही बनता है। दिल्ली के कॉलेजों में नाटकों का कैसा माहौल है, नाटक किस तरह से यहां के छात्र तैयार करते हैं। इस लेख में हमें इसके बारे में पूरी जानकारी दे रहे हैं दिल्ली के रंगमंच के जाने-पहचाने अभिनेता और निर्देशक – हिम्मत सिंह नेगी।  

कैम्पस थिएटर से मैं काफी सालों से जुडा हूं। एक प्रतिभागी, एक प्रशिक्षक और एक आयोजक के तौर पर मेरा नाता रहा है। कैम्पस थिएटर को मेंने काफी करीब से देखा है। मेरे खयाल में यह काफी लोगों का थियेटर है। यह किसी एक व्यक्ति का थिएटर नहीं है। असल में कॉलेज के थिएटर ग्रुप्स अलग-अलग कॉलेज की प्रतियोगिताओं में जाकर जगह-जगह थिएटर करते हैं। एक अच्छी परंपरा यह भी है कि यह लोग जजेस और अपने साथियों या देखने वालों से परफॉरमेंस के बारे में पूछते हैं। उसकी समीक्षा करते हैं। इससे एक अच्छी बात यह होती है कि इन ग्रुप्स के परफॉरमेंस में हर बार सुधार होता जाता है। पहले से ज़्यादा निखर कर वो परफॉर्म करते हैं।

 कैसे तैयार होते हैं नाटक ?

इनकी रचना प्रक्रिया को समझना भी ज़रूरी है। यह लोग एक सत्र में एक, दो या अधिकतम तीन नाटक ही करते हैं। नाटक तैयार करने के लिये इनके पास अधिकतम छह महीने होते हैं। जुलाई,अगस्त से ये प्रक्रिया शुरू होती है। पहले यह नाटक को चुनाव के लिये काफी विचार-विमर्श करते हैं। काफी खोज करते हैं। किसी विषय का तब चुनाव करते हैं, जब उन्हें लगता है कि उन्हें इस विषय पर अपने नाटक के ज़रिये बात करना चाहिये। वे इसके लिये काफी रिसर्च भी करते हैं। इसके बात स्क्रिप्ट खुद लिखने और उसकी प्रस्तुति का सिलसिला शुरू होता है।

 कॉलेज प्रबंधन से कितनी मदद मिलती है ?

नाटकों को तैयार करने या उसके कलाकारों को दी जाने वाली सुविधाओं को लेकर आमतौर पर कम ही कॉलेज दिलचस्पी लेते हैं। इसकी वजह यह भी है कि खासकर दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े ज़्यादातर कॉलेज एकेडमिक हैं। उनकी अध्य्यन अध्यापन में रूचि ज़्यादा रहती है। छात्रों की अपनी रचनात्मक जीजिविषा उनको नाटकों की तरफ ले आती है। इसलिये नाटक चुने जाने से लेकर अपने ग्रुप का नाम रखने तक छात्र-छात्राओं का ही रोल होता है। जैसे लेडी इरविन कॉलेज के नाट्य समूह का नाम आकार है जो वहां की ही एक कलाकार छात्रा आकृति ने रखा था। हां जब किसी कॉलेज के ग्रुप को लोकप्रियता मिलती है या उनके सबजेक्ट या परफॉरमेंस की सराहना होती है तब ज़रूर कॉलेज सहयोग के लिये आगे आते हैं। परंतु नाट्यकला के लिये कोई फंड नहीं होता है। मिसाल के लिये इंस्टीट्यूट ऑफ होम इकॉनॉमिक्स है। यहां के टीचर्स पहले सपोर्ट नहीं करते थे। मगर जैसे-जैसे छात्र-छात्राओं के प्रदर्शनों को सराहना मिली, तब सहयोग भी मिलने लगा।

कैम्पस के छात्र नुक्कड़ नाटक क्यों चुनते हैं ?

चूंकि कॉलेज के स्टूडेंट्स ज़्यादातर नुक्कड़ नाटक ही खेलते हैं। नाटकों का चुनाव भी उसी के हिसाब से होता है। इसकी एक बडी वजह ऑडिटोरियम का ना होना है। सुविधाओं का अभाव है। जबकि नुक्कड़ नाटक आसानी से कहीं भी खेले जा सकते हैं। खुले में प्रयोग हो सकता है। बहुत तामझाम की ज़रूरत नहीं है। कहीं भी आसानी से इसे परफॉर्म किया जा सकता है। यानी कॉलेज में बॉक्स थिएटर की जगह नुक्कड़ थिएटर ही ज्यादा अपनाया जाता है। कॉम्पिटीशन्स काफी होते हैं इसलिये नुक्कड़ एक बढ़िया विकल्प होता है।

नाटक किसी प्रासंगिक विषय पर हो सकता है, धार्मिक, राजनैतिक या किसी सामाजिक मुद्दे से जुड़ा हो सकता है। इसमें सांप्रदायिक सदभाव,राजनैतिक चेतना, सत्ता विरोधी, एड्स,सेक्स एजुकेशन,डिप्रेशन,स्त्री-पुरूष समानता,छेड़छाड़,बलात्कार जैसे विषय होते हैं। रिचर्स वर्क, इनपुट सब छात्र ही देते हैं। कोई गीत-संगीत तैयार करता है। कोई नाटक के फॉम तय करता है। कोई मेकअप, कोई पोशाखों का चयन करता है। नाटकों के माध्यम से यह लोग एक अच्छा संदेश देने की कोशिश करते हैं। वो संदेश राष्ट्रीय भावना के अनुरूप ही होता है और सबके हित की बात होती है। हां, कभी-कभी कुछ कॉलेज कुछ प्रभावशाली लोगों के दबाव में किसी खास विचारधारा को ही लेकर चलते हैं। इससे समग्रता की कमी का अहसास होता है। नाटक में दूसरा पक्ष उपेक्षित हो जाता है या उसकी जानबूझ कर हत्या हो जाती है। जब राजनैतिक संगठन रचनात्मक आज़ादी की उपेक्षा करते हैं,तब ऐसी स्थिति आती है।

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