नई दिल्ली (इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम)। राजधानी में कविता कोश-मुक्तांगन के मंच पर हाल ही में राकेश श्रीमाल का काव्य पाठ सुनने को मिला। संवेदनाओं से भरी उनकी कविताएँ सुनने वालों के भीतर कहीं पैठ गईं। कम शब्दों में गहरा अर्थ बोध और अनुभूति का संसार दे गईं। राकेश श्रीमाल वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं। वे नवभारत और प्रभात किरण जैसे समाचारों पत्रों के साथ ही जनसत्ता में एक दशक तक अपनी सेवाएं दे चुके हैं। कलावार्ता के संपादन से जुड़े रहे हैं। वर्तमान में वे हिंदी विश्वविद्यालय के कोलकाता केंद्र से ताना-बाना पत्रिका संपादन कर रहे हैं। हम यहां उनकी सुनाई रचनाओं के साथ उनके वीडियो साझा कर रहे हैं।
तुम सो गई हो / शायद वहां स्वप्न देख रही हो /जो जागने पर तुम्हें याद नहीं रहेगा / याद केवल यही रहेगा / ठीक से सोई कि नहीं / कितनी नींद बाक़ी है / शेष बचे जीवन में / कितने झूठ जो छुपा गए / कितने सच जो बता नहीं पाए / तुम ठीक से सोना सोने में ही संभव है / हमारा जीवन के युद्द से बाहर रहना
मैं सो रहा हूं / उसी कमरे में / जिसमें तुम भी सोई हो / मैं धीमे से आऊंगा / धीमे से जगाऊँगा / कहीं तुम परेशान ना हो जाओ / हम बैठेंगे थोड़ी देर / फिर सो जायेंगे / एक दूसरे की यादों में
मैं तुमसे दूर रहते हुए /तुम्हारी देह के काग़ज़ पर लिख रहा हूं / तुम इसे फाड़ मत देना / संभाल लेना अपने ही जीवन में / स्मृति की तरह / ताकि मैं जीवित रह सकूं / उस लिपी में / जिसे कोई भी पढ़ नहीं पायेगा
राकेश श्रीमाल का काव्य पाठ अराधना प्रधान की मेज़बानी में दिल्ली के ऊषा फार्म्स में 6 अक्टूबर को रखा गया था। इस दौरान सुमन केशरी जैसी वरिष्ठ और सिद्धहस्त रचनाकार के साथ युवा कवि श्रीधर दुबे, अरूणाभ सौरभ ने अपनी कविताएँ सुनाई। आयोजन स्थल भी किसी कविता से कम नहीं था।
यहां पर खुला रंगमंच है, चित्रकला के स्टुडियो हैं, बड़े एसी रिहर्सल हॉल और रूम हैं, एक संग्रहालय जैसी वर्कशॉप है और एक कलात्मक ऑडिटोरिमय है। यह सब बना है सुकून भरी हरीतिमा,बाग बग़ीचों के बीच, वो भी बेहद करीने से तराशे गए। मुक्तांगन में ऐसे आयोजन निरंतर होते रहते हैं। अराधना प्रधान और उनके साथ युवा कलाकारों की एक टीम ऐसे साहित्यक,रंगमंच और चित्रकला संबंधी आयोजनों में मदद करती है।

