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धर्मेंद्र बेहद जज़्बाती इंसान थे और अक्सर अपनी बातें शेरो-शायरी में कहा करते थे। उनकी कही बातें उनके दिल की आवाज़ हुआ करती थी। बहुत बार उनकी बातें तल्ख़ हक़ीक़त को बयान करती थी। वे ख़ुद लिखते थे। बहुत से प्रोग्राम या फिर सोशल मीडिया पर अपना लिखा या कहा शेयर किया करते थे। धर्मेंद्र जी की शायरी की कोई अलग से प्रकाशित किताब तो नहीं है लेकिन उनकी किताब ‘Dharmendra: Not Just A He-Man’ में उन्होंने अपनी कविताएँ और नज़्में साझा की हैं.. उनकी ज़िदंगी को बयान करने वाली एक नज़्म में उन्होंने लिखा है…
मन्नतों की मुराद, दुआओं की देन
मालिक की मेहर का इक वरदान हूं मैं
महान माँ की ममता, अज़ीम बाप की शफ़क़त का
अज़ीमो शान इक अहसान हूं मैं
इंसानियत का पुजारी, छोटो का लाड़-प्यार,
बड़ों का आदर सम्मान हूँ मैं
दुनिया सारी बन जाये एक कुनबा
एकता की हसरतों का अरमान हूँ मैं
नेकी मेरी शक्ति है, किसी बद से कभी डरता नहीं
ऐसा आत्म सम्मान हूं मैं
मुहब्बत है ख़ुदा और ख़ुदा है मुहब्बत
ख़ुदा की मुहब्बत का इक फ़रमान हूं मैं
प्यार मुहब्बत दुआएं आपकी, सेजती हैं जज़्बात को मेरे
इसीलिये आज भी जवान हूँ मैं
ग़लतियों का पुतला आख़िर इक इंसान हूँ मैंसबके साथ हँसने-बोलने वाले धर्मेंद्र अंदरूनी तौर पर तनहाई जीने वाले इंसान थे। उनके दिल से निकली ये बात भी उनके अकेलेपन को बयान करती है।
दिल की गहराइयों से बोल रहा हूँ, एक दर्द है मेरे सीने में,
हर रोज़ मैं रोता हूँ, हँसता हूँ, तन्हाई की आदत डाल ली है मैंने।
धर्मेंद्र मानते थे कि हर मुश्किल को गले लगाना ज़रूरी है भले वह कितनी भी तल्ख़ या कड़वी क्यों न हो। वे मशूहर गीत की लाइनें दोहराकर कहते –
दुनिया में आए हैं तो जीना ही पड़ेगा, जीवन है ज़हर तो पीना ही पड़ेगा।
साथ में ये भी कहते…
ये रातें, ये तन्हाई, ये वीरानापन, सब कुछ है मेरा, मैंने इसी को चुना है…
फ़िल्मी हस्ती होने के बाजवूद वे उम्र भर खुद को वो एक आम इंसान ही समझते रहे। वे बड़ी सादगी से कहते –
मैं एक गुमनाम शायर हूँ, न कोई मंज़िल है न कोई ठिकाना।
मैं एक मामूली सा इंसान हूँ, बस प्यार और मोहब्बत ही मेरा फ़साना।
वे कहते मेरे लिखने से मेरी तनहाई, मेरा ग़म कुछ कम हो जाता है।
कुछ लिखता हूँ तो इलाज-ए-दर्द हो जाता है, वरना ये दिल तो बस रोया ही करता है।
मैं हूँ एक शायर, जिसे दुनिया नहीं जानती, महफ़िलें तो सजती हैं पर तन्हा ही रहता है।

ज़िदंगी के आख़िरी सालों में उन्होंने काफ़ी वक्त अपने फार्म हाउस पर भी गुज़ारा। वहां रहते हुए उन्होंने कहा –
अकेला हूँ, तन्हा हूँ, मगर ख़ुश हूँ, अपनी मिट्टी से दूर नहीं हूँ।
हवाओं में साँस ले रहा हूँ और अपनी माटी की खुशबू से महक रहा हूँ।
चंद रोज़ पहले उन्होंने एक बार फिर गहरी बात कही-
सबकुछ पाकर भी हासिल-ए-ज़िदंगी कुछ भी नहीं
कमबख़्त जान क्यों जाती है जाते हुए…!
दिलीप कुमार और सायरा बानो की तरह अमिताभ बच्चन से उनकी गहरी दोस्ती और अपनापन रहा। उन्होंने ‘कौन बनेगा करोड़पति (KBC)’ में अमिताभ बच्चन के सामने “धरम अकॉर्डिंग टू धरम” नज़्म पढ़ी थी। ‘आप की अदालत’,’द कपिल शर्मा शो’ या ‘कॉफ़ी विथ करण’ जैसे कार्यक्रमों में उन्होंने अपनी शायरी सुनाई थीं। सोशल मीडिया अकाउंट पर फार्म हाउस के ऐसे वीडियो भी उपलब्ध हैं, जिनमें वे प्रकृति के बीच खड़े होकर अपनी लिखी शायरी या जुबान पर आई बातों को बयान करते दिखाई दिये। रिपोर्ट, इंदौर स्टूडियो। इनपुट और तस्वीरें कोपॉयलट और जेमिनी। इस स्टोरी के आख़िर तस्वीर में धर्मेंद्र, राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के हाथों चार अप्रैल दो हज़ार बारह को नई दिल्ली में मौजूद राष्ट्रपति भवन में पद्म भूषण पुरस्कार लेते नज़र आ रहे हैं। आगे पढ़िये – विवेचना के ‘कला महोत्सव’ को जिसने देखा, वो देखता ही रह गया! https://indorestudio.com/vivechna-ka-kala-mahotsav/


धरम पाजी के जीवन और उनके व्यक्तित्व के बारे इतनी अच्छी समीक्षा आपने की, कि पढ़ कर मजा आ गया, उनका लिखा हुआ, “मैं अपना नहीं बन पाया तो आप जैसा कैसे”