Saturday, May 9, 2026
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‘दिल ही तो है’ की कविताएँ झकझोरती हैं,सोचने पर विवश करती हैं – डॉ.आभा मिश्रा

समीक्षक डॉ. आभा मिश्रा

पुस्तक समीक्षा: दिल ही तो है
रचनाकार : शकील अख़्तर
प्रकाशक : स्टोरी मिरर डॉट कॉम                                                                                                                                                      सहज,मासूम शब्द और असाधारण बात। सीनियर टीवी जर्नलिस्ट और रचनाकार शकील अख़्तर के काव्य संग्रह की यह वो खूबी है, जो इस संग्रह को महत्वपूर्ण कृति बना देती है। 100 से अधिक कविताओं और गीतों के इस संग्रह का नाम है- ‘दिल ही तो है।’ संग्रह की कविताएं झकझोरती,हतप्रभ करती हैं, सोचने पर विवश करती हैं।

‘देखो अपने आसपास
कितनों के चेहरे पर नक़ाब
किसी की ज़ुबां पर नफ़रत का राष्ट्रवाद है
कोई क़त्ल को कहता जेहाद है
क्या ये हमारी कल्पना का समाज है?’

इस काव्य संग्रह में रचनाकार के बहुआयामी लेखन को आठ अंकों में सुनियोजित ढंग से विभाजित किया गया है। प्रेम,अध्यात्म,देशभक्ति,प्रासंगिक रचनाओं और नाट्यगीतों के रंग और भाव वैविध्य को संजोए यह काव्यसंग्रह बेहद संवेदनशील है। हर पन्ना,हर रचना,हर शब्द ऐसा मानो उसकी जगह कोई और नहीं ले सकता। आज के दौर की ये कविआएं कथ्य और शिल्प दोनों की दृष्टि से समकालीन कविता में एक नया अध्याय जोड़ती है। इनमें नयी कविता का तेवर भी हैं और प्रयोगवादी शिल्प भी।  ‘सृष्टि का सौंदर्य’ कविता का यह अंश दृष्टव्य है-

‘संबंध अनछुआ
होता है अजाना…
जैसे वंसत में रह गया हो सिर्फ़ क़िताबों में 
या शब्द खो चुके हों अपनी अर्थवत्ता… .’

रचनाकार के लेखन की रेंज वैयक्तिक धड़कनों से शुरू होकर समाज, देश और फिर विश्व के अहम मसलों को अत्यंत मर्मस्पर्शी ढंग से उकेरती है। संग्रह में उनकी ऐसी ही एक कविता आज के हालात और इंसान की ज़िदंगी की हक़ीक़त बयान करती है।

तिल तिल-सा हिया दिया   
अंदर-अंदर जला किया
अंधेरे में धुएं से उठकर
आग मैं अपनी पीता हूं
हज़ार नग़मे साथ लिए 
ज़िदंगी हज़ार जीता हूं’

अधिकांश कविताएं समय से साक्षात्कार करती हैं। सटीक और बेबाकपन से रचनाओं में समाज की विभीषिकाओं का भी चित्रण किया गया है-

‘लाशों के ढेर पर हर सवाल 
मौन है  
क्या मालूम क़ातिल कौन है?’
*******
‘सदी आगे निकल गई, धर्म पीछे अटक गया
सदियों से मेरा मुक़द्दर, सूली पर लटक गया’

कविताओं में अनेक स्थलों पर अपनी धारदार शैली से रचनाकार ने सामाजिक व्यवस्था पर कटाक्ष किया है। कवि की प्रतिबद्धता समाज में हाथिए पर जी रहे वर्ग के प्रति स्पष्ट दिखती है।‘सड़क के बच्चे’ कविता में पीड़ा भाव तीव्रता से उभरा है-

‘न रोटी, न कपड़े,
पत्तों से वो टूटे-बिखरे
दरख़्त से अपने उखड़े-उजड़े
उनका क्या है
सड़क के वो बच्चे जैसे पंछी है, हवा हैं’

इसी क्रम में –‘ अकेला कहां है आयलान ?’ एक महत्वपूर्ण कविता है

‘लाखों बच्चे अब भी आवाज़ लगा रहे हैं
लेकिन उम्मीद की नाव नहीं है
चारों तरफ बस साज़िशों का पानी है’

संग्रह में रचनाओं की केंद्रीय चेतना लोकधर्मी है-
‘इसकी नज़र में समाज, इसके दायरे में देशकाल
हर मसाइल के पन्ने, नई रोशनी के आइने में खोलती है
यह परछाइयां जब बोलती हैं,गहरे राज़ खोलती हैं ‘
“दिल ही तो है “– काव्य संग्रह जीवन यात्रा की यह रोमांचक है। भावनाओं के कोमल पंखों से कल्पना की उड़ान भरती रचनाएं, अंकों के पड़ाव पार करते हुए गंभीर, चिंतनपरक होती जाती है।

‘फूलों की क्यारी में मैंने 
कुछ ख्वाब लगा दिए हैं
हवाएं खुश्बूएं लाती हैं
ऋतुएं गीत सुनाती हैं
बोलो अब भी तुम उदास तो नहीं’

भावनाओं की सूक्ष्मतम अभिव्यक्ति और भाषा का स्वाभाविक सौंदर्य प्रत्येक रचना को विशिष्ट बना देता है।

‘आवाज़ नहीं आती लेकिन बातें चलती रहती हैं
दिन में भी ख्वाबों की रातें चलती रहती हैं’

भाषा में कसावट है और एक ऐसी रवानगी है कि कविता दर कविता पढ़ते चले जाने का मोह रूकता नहीं। यह कविताएं बदलते परिवेश का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ हैं।

‘हर क़तरा, हर किनारा
हर नदिया की धारा
सहरा की धूल
वादी के फूल
मेरे वक्त के ये निशां
ये मेरे गीत,मेरे दिल की जुबां ‘

समूची रचना प्रक्रिया में राजनैतिक एवं साम्प्रदायिक उठापटक के प्रति व्यग्रता है दिखती है-

‘पीली सरसों पर क्यों तूने 
खून रंग चढ़ाया
मां कैसा ये वंसत आया, कैसा ये वंसत आया !’

इन रचनाओं में देश के प्रति अगाध प्रेम उमड़ता है। देश के ताने-बाने को जब भी क्षति पहुंचती है, रचनाकार में मौजूद भारत की आत्मा का अंश पुकार उठता है-

हम कब सीखेंगे हम हिंदुस्तानी है,
यह देश हमारा है
हर इंसा प्यारा है
क्यों जलाएं गुलशन ये
घर हमारा है 
हम कब सीखेंगे हम हिंदुस्तानी है’
****
कहने दो जो ज़माना कहता है
मेरा भारत मेरे दिल में रहता है
दौड़ता है रगों में
चलता है साथ-साथ 
मेरी आरज़ु-ए-मंज़िल में रहता है
***
कविताएं समृद्ध शब्द-सामर्थ्य के साथ भाषायी उपकरणों में ढली है। देशज शब्दावाली का सुंदर प्रयोग अनेक स्थानों पर किया गया है-

उसके मौसम में भीगकर
फिर हरियाएंगे,चुगियाएंगे
उसके दर आएंगे
कहकहाएंगे, मुसियाएंगे’

पुस्तक की सृजनात्मक पहलू कथ्य और भाषा की अदायगी के नवीन आयाम प्रस्तुत करता है।
दरअसल यह काव्य संग्रह आधुनिक जीवन की विसंगतियों और तमाम विडम्बनाओं के कुहासे में
उजास की किरण है।

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