शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘देखो पूजा ! इस प्लेटफार्म पर कोई नहीं है- मैं हूँ और तुम! चलो ट्राय करते हैं’। बरसों बाद रेलवे स्टेशन के सूने प्लेटफार्म पर पूजा कपूर से अभिनव शर्मा की मुलाक़ात हुई है। 55 साल का अभिनव, पूजा को उस नाटक की याद दिलाता है, जो उन्होंने कॉलेज के दिनों में साथ किया था। और फिर दोनों मोहन राकेश के लिखे नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ के ‘कालिदास और मल्लिका’ बन जाते हैं! मल्लिका के शब्द गूँजते हैं -‘वही आषाढ़ का दिन! उसी प्रकार मेघ गरज रहे हैं, वैसे ही वर्षा हो रही है। वही घर है, वहीं मैं हूँ.. परंतु फिर’!…
यह दृश्य है नाटक ‘सर्दियों का फिर वही मौसम’ का। प्लेटफार्म पर प्यार के मौसम वाले इस रोमांटिक नाटक को लिखा और निर्देशित किया है आशीष श्रीवास्तव ने। मंडी हाउस, दिल्ली के एलटीजी सभागार में 22 नवंबर 2025 की शाम इस नाटक का मंचन हुआ। चेतना रंगमंच समूह, भोपाल की इस प्रस्तुति को देखने के लिये राजधानी के दर्शकों में ख़ासी दिलचस्पी दिखी। हालांकि दिल्ली इन दिनों प्रदूषण की मार झेल रही है। ज़्यादातर लोग फिलहाल सोच-समझकर आयोजनों में शामिल हो रहे हैं।
यह नाटक कई मायनों में प्रभावित करता है। इसकी पहली वजह है- कहानी और प्रस्तुतिकरण। दूसरा- नाटक में पूजा और अभिनव के मुख्य किरदारों में राजीव श्रीवास्तव और नीति श्रीवास्तव का सहज अभिनय। साथ में अन्य कलाकारों का प्रदर्शन। तीसरा- नाटक का मंच और इसकी प्रकाश योजना। चौथा– ध्वनि प्रभाव और संगीत। पाँचवाँ- नाटक में नाटक और कविताओं का सदुपयोग। इस तरह से यह नाटक आशीष श्रीवास्तव की निर्देशकीय परिकल्पना और उनके कहानी कहने की कला को मंच पर बड़ी कामयाबी के साथ सामने लाता है।
नाटक में पूजा और अभिनव का रेलवे स्टेशन पर मिलना संयोग से होता है। सर्दी की रात है और प्लेटफार्म पर सन्नाटा पसरा पड़ा है। दोनों जब यहां पर मिले हैं तब तक दोनों की ज़िदंगी के कई बसंत बीत चुके हैं। दोनों की उम्र 50 के पार पहुँच चुकी है। एक बैंक ऑफिसर है और दूसरी हिन्दी की प्रोफ़ेसर लेकिन दोनों अब अकेले हो चुके हैं। अभिनव की पत्नी और पूजा के पति की मृत्यु हो चुकी है। यानी दिल्ली के सूने रेलवे स्टेशन पर ‘सर्दियों का फिर वही मौसम’ के लौटने की कोई संभावना नहीं है। कहानी का ये अजब संयोग, दिलचस्प उतार-चढ़ावों से गुज़रने लगता है। नाटक को देखते हुए दर्शकों का ये सोचना स्वाभाविक लगता है कि आख़िर कितनी पूजाओं और अभिनवों की ज़िदंगी में ऐसा दुर्लभ संयोग आता है!
पहली नज़र में ही अभिनव प्लेटफार्म पर आई दोस्त-पूजा कपूर को पहचान लेता है। लेकिन पूजा कॉलेज के दिनों के शर्मीले और कम बोलने वाले ‘अभि’ को पहचान नहीं पाती। हालांकि जब अभिनव उसे गुज़रे दिनों की याद दिलाता है, तब पूजा उसे पहचान लेती है। मगर पहचान की तसदीक होने तक कहानी कई मोड़ों से गुज़रती हैं। इस दौरान रोमानी और मज़ेदार बातें करने वाला अभिनव, पूजा को चाय भी पिलाता है और पसंद की आइसक्रीम भी खिलाता है!
एक आम हिंदुस्तानी महिला की तरह पूजा को, आधी रात प्लेटफार्म पर, एक अजनबी का अनौपचारिक होना अच्छा नहीं लगता। मगर जब उसे पता चलता है कि ये बंदा, उसके कॉलेज के दिनों का ‘अभि’ है, तब वह उसके बदले स्वभाव पर हैरानी जताती है! दोनों ज़िदंगी में आये बदलावों के बारे में बातें करते हुए अपने पति और पत्नी को याद करते हैं।
कहानी में अभि और पूजा में एक-दूसरे से हुए ‘पहले प्यार’ की भावनाएं जब प्रबल होती हैं, वह उसके कहने पर अपनी एक कविता सुनाता है- ‘मरने से पहले मैं तुमसे एक बार मिलना चाहता था’..,मगर तब तक दिल्ली से भोपाल जाने वाली ट्रेन के प्लेटफार्म पर आने की घोषणा हो जाती है।… इसके बाद क्या होता है, नाटक में यह देखना दिलचस्प होगा। इस कहानी को राजीव श्रीवास्तव जिस तरह से जीते और गति देते हैं, वह तारीफ़ के काबिल हैं। उनके मज़ेदार संवाद दर्शकों को ख़ासा हँसाते हैं। पूजा कपूर के रूप में नीति श्रीवास्तव भी मंच पर उनका अच्छा साथ निभाती हैं।
यह प्रस्तुति दर्शकों को डेढ़ घंटे तक बाँधे रखती है। कम पात्रों वाली ये प्रस्तुति, आज के दौर का तरीका भी है। आज ज़्यादा कलाकारों की जगह, कम कलाकारों के शोज़ प्राथमिकता में आ गये हैं। बड़ी कास्ट और बड़े बजट वाले नाटक, हर थियेटर ग्रुप के लिये संभव भी नहीं है। इस तरह से आशीष का लिखा यह नाटक, रंगमंच के लिए उनकी सुविचारित नीति को दर्शाता है। इससे पहले वे ‘बेटर हाफ’ नाटक के भी कई शोज़ कर चुके हैं।
दिल्ली में ‘सर्दियों का फिर वही मौसम’ का 30 वाँ शो था। वे दस साल से इस नाटक के शोज़ कर रहे हैं। 2014 में इस नाटक का पहला मंचन भोपाल के भारत भवन में हुआ था। यह नाटक अब प्रकाशित भी होने वाला है। नाटक के दिल्ली के साथ ही मुंबई, असम, मेघालय, गुरु ग्राम, इंदौर, भोपाल और दमोह में शोज़ हो चुके हैं। ‘बेटर हाफ’ के भी दिल्ली में 2 शोज़ हो चुके हैं। ज़ाहिर है कि ‘चेतना रंग समूह’ के दिल्ली में भी दर्शक बन रहे हैं और आशीष श्रीवास्तव कोशिश कर रहे हैं कि वे राजधानी में अपने नाटकों के शोज़ लाते रहें।
नाटक के अभिनय में रेलवे पुलिस का जवान, चाय वाला और पूजा भाभी का पड़ोसी जैसी भूमिकाएं निभाने वाले कलाकार भी अपने अभिनय की छाप छोड़ जाते हैं। यह नाटक की तीसरी कास्ट है। समझा जा सकता है कि नाटक तीन बार तैयार होकर बिखर गया है। अब फिर एक नई टीम इसके प्रदर्शन कर रही है। नाटक में पूजा के भांजे का अभिनय करने वाले कृष जैन और चायवाले के साथ हवलदार का किरदार करने वाले राज कुशवाह ने किया, ये दोनों कलाकार पहली बार मंच पर अभिनय करते नज़र आये। अन्य कलाकारों में राजीव और नीति श्रीवास्तव के साथ ही शिव कटारिया शामिल हैं। सेट डिज़ाइन दिनेश नायर का था और संगीत मनोहर राव का। जबकि प्रकाश परिकल्पना सीनियर थियेटर आर्टिस्ट कमल जैन की है। वे खुद नाट्य दल के साथ दिल्ली आये थे।
यह बताना ज़रूरी होगा कि कमल जैन ने ही भोपाल के नीलबड़ में- टेरेस पर बनाये गये ‘चेतना नाट्य सभागार’ की लाइट डिज़ाइन की है, उसका सैटअप तैयार किया है। आशीष श्रीवास्तव इस थियेटर के निर्माण के लिये बरसों से प्रयासरत थे। चेतना रंग समूह के यहां पर बीते डेढ़ दशक से आयोजन होते रहे हैं। उनके टेरेस थियेटर के माध्यम से बहुत से रंग प्रेमी और दर्शक भी बन गये हैं। इनमें बहुत से बाल कलाकार शामिल हैं। नये सभागार के शुभारंभ प्रस्तुति के रूप में ‘गाँधारी’ नाटक का हाल ही में मंचन हुआ है। आगे पढ़िये – एक भूली हुई तहज़ीब का सफ़र थी उमराव जान https://indorestudio.com/iffi-conversation-muzaffar-ali-shad-ali/










*सर्दियों का फिर वही मौसम* इस शो को आपके साथ देखने का अवसर आपसे मिला, बहुत अच्छा लगा। और आपने जो इसे अपने शब्दों में उकेरा है,वह सच में काबिले तारीफ है, आप इंदौर स्टूडियो के द्वारा ऐसे ही समीक्षा लिखते रहिए,पढ़कर अच्छा लगता है।