दूसरों के आइडिये का मीडियम है एक्टर: नसीरूद्दीन शाह

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लोकमित्र गौतम, इंदौर स्टूडियो। ‘एक एक्टर दूसरों के आइडिये का मीडियम या माध्यम होता है। भले ही उसका अपना राजनीतिक नज़रिया हो। परंतु सचाई ये है कि एक कलाकार के रूप में उसके पास अपने ‘पॉलिटिकल व्यू’ को अभिव्यक्त करने का मौका नहीं है’। जाने-माने एक्टर नसीरूद्दीन शाह ने एक विशेष साक्षात्कार में यह बात कही। कुछ अरसा पहले उनसे यह बातचीत उनके घर पर हुई। यहां पढ़िये उसी साक्षात्कार के संपादित अंश। कैसे नज़र आये आपका ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’: राजनीतिक विचारधारा से जुड़े सवाल पर ही वरिष्ठ अभिनेता ने कहा- ‘आपका पॉलिटिकल व्यूज़ इस बात से ज़रूर दिख सकता है कि आप किस तरह का काम करना पसंद करते हैं। अब अगर कोई अगर फंडामेंटलिस्ट के डिफेंस में फिल्म बनाने लगे और कहे कि मैंने यह पैसे के लिये किया तो यह ठीक नहीं होगा। इसलिए कलाकार को अपने व्यूज या विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए ख़ुद लिखना पड़ता है। बहुत से इसी वजह से एक्टर के बाद डायरेक्टर बनते हैं’। फिल्में सिर्फ हेयर स्टाइल बदलती हैं: आपका एक मशहूर स्टेटमेंट हैं -‘फिल्में हेयर स्टाइल के अलावा कुछ नहीं बदल सकती’। आपने ऐसा क्यों कहा ? 70  के दशक में परवान चढ़े कला सिनेमा के इस पोस्टर ब्वॉय ने कहा- ‘एक समय था, जब लगता था कि सोद्देश्य फिल्मों से बदलाव आयेगा। तब हमारे किरदार बदलाव की तमन्ना में जीते-मरते थे। बेशक उस वक्त हम सभी को दुनिया बदलने का ख्याल आता था, लेकिन यह अहसास बाद में हुआ कि यह खामख्याली थी। हम सबको यह सोचना ही नहीं चाहिए था कि हम इंडस्ट्री को बदलकर रख देंगे। हम ऐसी दुनिया बनाने की कोशिश करेंगे ..वैसी दुनिया बना सकेंगे। क्या वाकई काम तलाशने वाले, मामूली और बेरोजगार लोग इस दुनिया से टकरा सकते हैं? फिल्मों का समाज पर असर होता है? : इस सवाल पर नसीर बोले, ‘हम फिल्मों के असर को ओवर एस्टीमेट करते हैं। अगर फिल्मों में समाज को बदलने की कूवत होती तो फिर हमारा समाज आज कैसा होता? कौन सी फिल्म है जिसमें आदर्श की बात नहीं होती ? क्या किसी फिल्म में कभी यह कहा जाता है कि अपने माँ-बाप से बदतमीजी करो? देश के साथ गद्दारी करो या ब्लैक मार्केटिंग करो या क्राइम करो, स्मगलर बन जाओ? ज़्यादातर फिल्में संदेश अच्छा ही देती हैं। परंतु मान लेते हैं कि हम हमेशा समाज में जितनी बुराइयां हैं वे सब फिल्मों की वजह से हैं’? फिल्में अच्छा-बुरा नहीं करतीं: नसीर आगे कहने लगे,  ‘मेरे ख़याल में फ़िल्में ना कुछ अच्छा करती हैं और न बुरा करती हैं। मुझे नहीं लगता कि सिनेमा में समाज को बदल पाने की ताकत रखता है। मेरे अपने बिलीफ उन दिनों बिलकुल मामूली या कहें आम थे। मैं हिन्दी फिल्मों का हीरो बनना चाहता था। पर मुझे मिल गयीं अलबर्ट पिंटो, निशांत और मंथन जैसी फ़िल्में। वो सब मुझे करना नहीं था। इत्तफाक की बात थी। मैं स्पोक्समैन था उन सब फिल्म मेकर्स के लिये।  मैं यह ज़रूर कहूंगा कि इस तरह फिल्मों की बदौलत मैंने भी ग्रेजुअली ग्रो किया है’। सत्ता पक्ष और सहनशीलता की बात: क्या सत्ता पक्ष में अभिव्यक्ति के प्रति टॉलरेंस की कमी आई है? इस सवाल पर वरिष्ठ अभिनेता ने कहा -‘बिल्कुल, इमरजेंसी के वक्त भी अभिव्यक्ति पर रोक लगाई गयी थी लेकिन आर के लक्ष्मण हर दिन एक कार्टून बना देते थे। आज शायद यह संभव नहीं है। फिर भी मैं कहना चाहता हूँ कि आर्टिस्ट अपनी बात कहने के लिए रास्ता ढूंढ ही लेते हैं बशर्ते उनके पास कुछ कहने की बेचैनी हो’। लोकप्रिय और जन सिनेमा की बहस: आप जनता के पक्षधर सिनेमा के एक प्रतीक बनकर उभरे थे। इसके बरअक्स लोकप्रिय सिनेमा की बहस होती है। आप क्या कहेंगे? नसीर ने इस बहस को ही सिरे से नकार दिया। उन्होंने कहा– ‘मेरे खयाल में इस तरह की बहस से बहुत नुकसान हुआ है। मुझे इस बात की शुरू से ही तकलीफ़ होती थी। जब मैं कॉलेज में था तब ख्वाजा अहमद अब्बास साहब की फ़िल्में बनती थीं। श्याम बेनेगल और मृणालसेन से भी यह पहले की बात है’। तब भी वे आर्ट फ़िल्में हीं थीं: शहर और सपना,आसमान महल, सात हिन्दुस्तानी और तब भी वे आर्ट फ़िल्में कहलाती थीं। मुझे लगता था कि बहुत अच्छी कहानियाँ हैं इन फिल्मों के अंदर और भले ही इनमें कश्मीर नहीं है और हीरोइन नहीं है फिर भी ये अच्छी फ़िल्में हैं लेकिन ये चलती क्यों नहीं हैं? लोग इन्हें देखने क्यों नहीं आते। मतलब इन फिल्मों को लेकर यह लेबल लग गया। आर्ट और कॉमर्स! और फिर उसकी जगह सामानांतर सिनेमा, फिर आल्टरनेटिव सिनेमा और पता नहीं कैसे-कैसे लेबल ईजाद हुए। इन सबने नुकसान किया। ऐसे लेबलों की वजह से दर्शक पहले से अपना सोच बनाने लगे, अरे यह तो आर्ट सिनेमा है! अच्छी फ़िल्मों के हक़ की बात: यह पूछे जाने पर कि जिस तरह अच्छी शिक्षा, साफ़ पानी जैसी चीज़ों पर हम अपना अधिकार समझते हैं, क्या कभी ऐसा वक्त आयेगा जब लोग कहेंगे, अच्छी फिल्में पाना हमारा अधिकार है? यह बात सुनते ही नसीर एकदम बोले- ‘अरे वाह, क्या बात कह दी आपने। ये बात सत्यजित रे साहब ने 50 साल पहले अपनी किताब ‘अवर फिल्म्स, देअर फिल्म्स’ में कही है। इसमें उन्होंने हिन्दुस्तानी सिनेमा के साथ बाक़ी दुनिया के बेहतरीन सिनेमा का विश्लेषण किया है। हॉलीवुड भी उसमें शामिल था लेकिन हॉलीवुड बहुत कम था। ख़ासतौर पर इतालवी, जापानी, फ्रांसीसी आदि फ़िल्मों पर। उन्होंने कहा था काश हमारी ऑडियंस और बेहतर की माँग करती। मगर वह दिन आयेगा। असल में दर्शकों को जो परोसा गया है, वे उसी में ख़ुश है। वही फैमिलियर टाइप का मसाला। अनफैमिलियर उन्हें चाहिये ही नहीं’! पूरी दुनिया में यही हो रहा है: यह पूछे जाने पर कि क्या भारत में ही यह हो रहा है? नसीर ने कहा, ‘यह तो पूरी दुनिया में हो रहा है। अमेरिकी फिल्मों को देख लीजिये! कैसे बेहूदा सुपर हीरो वाली फ़िल्में चल रही हैं। ये ‘लॉर्ड्स ऑफ़ द रिंग’ जैसी फ़िल्में क्या हैं? लगता है ये सब हमारी माइथोलोजी से ही चुराई गईं हैं। मुख्यधारा के नाम पर हॉलीवुड ऐसी ही फ़िल्में बनाता है या फिर वो बहुत छोटी-छोटी फ़िल्में बनाते हैं, जिनको हर साल ऑस्कर दे देते हैं। ये अमेरिकी बड़े चालाक हैं (हँसते हैं) ….क्योंकि इन ऑस्कर वाली फिल्मों का निर्माण तो फ़िल्म स्टूडियोज अपनी चिल्लर से ही कर लेते हैं। काश हमारे यहाँ भी ऐसा होता? क्या यह ऑर्गनाइज्ड क्राइम है?: इस सवाल पर नसीर चौंके, फिर अपनी टिप्पणी की, ‘ऑर्गनाइज्ड क्राइम’ आपने बहुत अच्छा टर्म इस्तेमाल किया है, ऑल मोस्ट लाइक दैट। बहुत कम हिन्दी फ़िल्में हैं जो हर तरह से ओरिजनल वर्क के साथ बन रही हैं। आमिर ख़ान जैसे कम लोग हैं जो अच्छी फ़िल्में बनाना अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं। ऐसे और भी लोग हैं। मगर ज़्यादातर यह काम मुनाफ़े का धंधा ही बन चुका है। ऐसे मेकर्स कभी नहीं चाहेंगे कि कभी दर्शक अच्छे सिनेमा की मांग करें। ऐसा होने पर इनका धंधा चौपट हो जायेगा। इसलिए वे चाहते हैं ‘कीप द ऑडियंस डम्प’। क्या पहले ऐसा नहीं होता था?: नसीर ने जवाब दिया, ‘हां, पहले भी यह होता था। राजकपूर साहब की कुछ फ़िल्में भी, उनके गाने वगैरह, कुछ आइडिया चार्ली चौपलिन से और कुछ कहीं और से मारे गए हैं। बिमल रॉय साहब की भी कुछ फिल्मों को गौर से देखें तो वे डी सीका की फिल्मों की कॉपी हैं। एक शांताराम थे, जो वाकई ओरिजनल फ़िल्में बनाते थे। इसी तरह अब्बास साहब थे लेकिन ऐसे ओरिजनल काम करने वाले बहुत कम लोग रहे। ज़्यादातर लोग चोरी करने वाले रहे। ये यही लोग हैं जिन्होंने ऑडियंस के टेस्ट को ख़राब करने काम किया। चोरी की फ़िल्मों से पाई सफलता: नसीर कहते रहे – ‘70 के दशक में जो एक्शन फिल्में लिखी जा रही थीं, वे सबकी सब चुराई हुईं थीं। सीन तकरीबन हूबहू होते थे। धुनें उड़ा ली जाती थीं। चोरी के इन आइडियों पर बड़ी-बड़ी कामयाब फ़िल्में लिखी गईं। ऐसी फ़िल्में भी इस खेल में शामिल रही हैं जो आज मास्टर पीस मानी जाती हैं। उन पर किताबें लिखी जा रही हैं। इससे यह हुआ कि चोरी बिलकुल लेजिटीमेट हो गयी। हालांकि मैं कहूँगा कि आजकल नौजवान जो कहानियां लिख रहे हैं या नाटक लिख रहे हैं या फ़िल्में बना रहे हैं। ये सब उनके अपने मसलों के बारे में हैं। ये भी एक अच्छी बात है। एट लीस्ट वो ओरिजनल तो हैं। इस लिहाज से वो ईमानदार हैं भले स्तर जो भी हो। यह एक अलग विषय है। मगर वे अपनी समस्याओं को टैकल करने या उनपर बात करने की कोशिश तो कर रहे हैं’। क्या सिनेमा का समाज शास्त्र नहीं: यह पूछे जाने पर नसीरुद्दीन बोले – ‘मेरे ख्याल से हिस्ट्री बुक की तरह उसकी भूमिका हो सकती है लेकिन किसी सोशल फ्रंट की तरह भूमिका नहीं हो सकती। हाँ, ऐज ए रिकार्ड उसका काफ़ी महत्व है…As an opinion. But also as a record…more important than opinion is record.. जैसे चार्ली चैपलिन ने हिटलर पर एक फिल्म बनाई थी। बहुत मज़ेदार है लेकिन उसे देखकर आपको उस भयावहता का अंदाजा नहीं होता जो हिटलर की खुद बनवाई फिल्म ‘द ट्रिम्फ ऑफ़ द विल’ में होता है। देखकर आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे। कला सिनेमा से जुड़ी कुछ और बातें: इस साक्षात्कार में नसीर साहब से कला सिनेमा के दौर की कुछ और बातों पर भी चर्चा हुई। इसमें एनएफडीसी के ज़रिये आर्ट सिनेमा को मिली मदद की बात थीं, उसमें यह बात सामने आईं कि इस मदद के बावजूद सिनेमाघरों में कला फिल्मों के प्रदर्शन का अभाव था। इसी बात पर जब पूछा गया कि तकनीकी सुविधाओं के बावजूद आज उस तरह की फिल्में बनाने की कोई ललक है? नसीरूद्दीन ने कहा- ‘तकनीक की वजह से आज भले ही प्रयोगधर्मी फिल्में बनाना आसान है मगर फिल्मों को रिलीज कर पाना आज पहले से भी ज़्यादा मुश्किल हो गया है’। कला गतिविधियों और कलाकारों के बारे में देखते और पढ़ते रहिये – https://indorestudio.com/

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