मैं जो कुछ हूँ, उर्दू की वजह से हूँ- दुबई में सम्मानित डॉ.सईद आलम

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शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘मुझे अवॉर्ड दिये जाने को लेकर कहा गया है कि मैंने उर्दू की जो ख़िदमत की है, उसके लिये यह अवॉर्ड दिया गया है। हालांकि मैं किसी अवॉर्ड के लायक नहीं। मेरा मानना है कि ये अवॉर्ड तो उर्दू को मिलना चाहिये, क्योंकि उर्दू हमारी ख़िदमत करती रहती है। आज मैं जो कुछ भी हूं, वो उर्दू की वजह से हूँ’। उर्दू ड्रामों के मशहूर राइटर, एक्टर और डायरेक्टर डॉ.एम सईद आलम ने यह बात कही। वे दुबई (UAE) में  ‘अलमबरदार-ए-उर्दू अवार्ड 2025’ दिये जाने पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे। ‘बज़्म-ए-उर्दू’ ने दिया अवॉर्ड: दुबई की नामी कल्चरल आर्गनाइज़ेशन ‘बज़्म-ए-उर्दू’ ने उन्हें इस साल यह अवॉर्ड दिया है। डॉ. सईद ने कहा – ‘सच कहूँ तो मैं उर्दू का बड़ा शुक्रगुज़ार हूँ लेकिन चूँकि अवॉर्ड दे ही दिया गया है तो मैं इसे बाख़ुशी कुबूल करता हूँ और अपना अवॉर्ड उन तमाम साथियों और दोस्तों की नज्र करता हूं, जिन्होंने पिछले 30 सालों से मेरे उर्दू ड्रामों में काम किया है, मेरा साथ दिया है’। दुबई में 7 नाटकों का मंचन: दुबई में अपने शोज़ के बारे में उन्होंने बताया – ‘मुझे ‘बज़्म-ए-उर्दू’ के माध्यम से दुबई में 7 बार मुख़्तलिफ़ प्लेज़ करने का मौका मिला है। इनमें –गालिब इन न्यू डेल्ही, लाल क़िले का आख़िरी मुशायरा, मुशायरे रफ़्तगाँ, बिग बी, चाचा छक्कन इन एक्शन, अकबर द ग्रेट नहीं रहे, मौलाना आज़ाद की कलम से’ जैसे नाटक रहे हैं’। आपको बता दें कि डॉ.सईद आलम 50 से अधिक उर्दू नाटकों के 2 हज़ार से ज़्यादा शोज़ कर चुके हैं। ‘गालिब इन न्यू डेल्ही’ जैसे नाटक के 634 शोज़ हो चुके हैं। बड़ी बात ये भी है कि उन्होंने ज़्यादातर ड्रामे खुद ही लिखे हैं, उनमें अभिनय किया है, निर्देशन देने के साथ उनका प्रॉडक्शन किया है। मुशायरों के साथ ड्रामों का आयोजन: डॉ.सईद आलम ने उन्हें दुबई में अवॉर्ड देने वाली संस्था के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा, ‘दुबई में ‘बज़्म-ए-उर्दू’  की अपनी समझदार आडियंस है, इसमें हिन्दुस्तानी के अलावा खाड़ी देशों, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान के दर्शक भी शामिल हैं या फिर वो लोग हैं जो उर्दू लैंग्वेज को जानते और समझते हैं, जिनकी मादरी ज़ुबान उर्दू है। यह संस्था उनके लिये मुशायरे और ड्रामों के प्रोग्राम करती है। मुशायरों के प्रोग्राम और भी संस्थाएं करती हैं, लेकिन ‘बज़्म-ए-उर्दू’ के मंच पर बहुत सारे ड्रामे भी आयोजित होते हैं। इसी वजह से हमें 7-8 बार मौका मिला है। इस बार इन प्रस्तुतियों का नतीजा अवॉर्ड की शक्ल में आया है!…’ रेहान साहब की सरपरस्ती में ‘बज़्म’: उन्होंने बताया- ‘बज़्म-ए-उर्दू’ दुबई की एक नान प्रॉफिटेबल, नान रिलीजियस, नान पोलिटिकल कल्चरल ऑर्गनाइज़ेशन है, जो उर्दू को बढ़ावा देने के काम में दिलो जान से जुटी है। इसकी स्थापना कुछ साल पहले आईआईटी, खड़गपुर से ग्रेजुएट रेहान अहमद खान ने की थी। पहले वे दुबई में रहते थे, आजकल कनाडा में रहते हैं। बज़्म का कारवां, उन्हीं की सरपरस्ती में आगे बढ़ रहा है। उनके साथ ही इस ऑर्गनाइज़ेशन से बड़े काबिल, मशहूर और मेहनती लोग जुड़े हुए हैं। इनमें शादाब उल्फ़त, तरन्नुम अहमद, सरवर साहब जैसे बहुत से लोग शामिल हैं। ये सभी बज़्म की बेलौस ख़िदमत करते हैं। इनमें से बहुत से ख़ुद बहुत अच्छे शायर या अदाकार हैं, लेकिन वे बज़्म के लिये पूरी जाफेशानी से काम करते हैं।उर्दू से नावाकिफ़ हो रहे लोग: उर्दू ज़ुबान के मुस्तकबिल पर पूछे गये सवाल पर डॉ. सईद ने कहा, अफ़सोस कि आज उर्दू से लोग धीरे-धीरे नावाकिफ़ होते जा रहे हैं। ये रोज़गार या कामकाज की भाषा नहीं रह गई है और जो भाषा का उपयोग कारोबार में होता है, उसका मुस्तकबिल भी रोशन होता है। आज आप ज़्यादा से ज़्यादा इस उर्दू के टीचर बन सकते हैं। ऐसे में अगर कोई संस्था मुशायरे, ड्रामे या दूसरे अदबी प्रोग्राम करती है तो वह उन लोगों तक पहुँचती हैं जो उर्दू से प्यार करते हैं। भले वो उर्दू को लिखना-पढ़ना ना जानते हों। ऐसे बहुत से लोग हैं- चाहे वो दुबई में रहते हों या दिल्ली में या फिर अमेरिका-इंग्लैंड में।उर्दू की ताक़त है हिन्दी: उन्होंने कहा – ‘लेकिन उर्दू की एक ‘Inherent strength’ है। वो है उर्दू का अदब-उर्दू का मयार। इसी वजह से इस शीरीं ज़ुबान को लोग इसे पसंद करते हैं। इसकी एक ख़ास बात और है। उर्दू ख़ासी हद तक हिन्दी है या कहें कि हिन्दी ख़ासी हद तक उर्दू। जहां-जहां भी हिन्दी बोली जायेगी, वहां-वहां पर उर्दू भी समझी और बोली जायेगी। दोनों की ग्रामर एक हैं, बहुत से लफ़्ज एक-दूसरे में घुले-मिले हैं। मिसाल के लिये उठना-बैठना, खाना-पीना, रोटी-तवा वगैरह’। रेख़्ता जैसे प्लेटफार्म की बड़ी भूमिका: डॉ.सईद आलम ने कहा- ‘आजकल ‘रेख्ता’ जैसे बहुत से प्लेटफार्म भी हैं जो उर्दू को नई ज़िदंगी देने में अपना बड़ा योगदान दे रहे हैं। जावेद अख़्तर जैसे शायर भी हैं, जिनके हज़ारों फॉलोअर्स हैं। वे उन जैसी हस्तियों को देखते-सुनते और सीखते हैं। उर्दू की खूबियों को पहचानते और महसूस करते हैं। इस तरह से कह सकता हूं कि उर्दू का भविष्य चमकदार भले न हो लेकिन इस लैंग्वेज को कभी कुछ नहीं होगा। यह हमेशा कायम रहेगी’। घर का उर्दू माहौल काम आया: डॉ. आलम ने बताया, ‘मेरी तालीम तो अंग्रेज़ी में हुई है, मगर मेरे घर में उर्दू का माहौल था। घर में उर्दू के अख़बार और रिसाले आते थे, कुरान शरीफ़ पढ़ाया जाता था, इस तरह हम उर्दू के रस्मुल-ख़त (script) से वाकिफ़ हो गये। यानी मैं उर्दू का एक्सपर्ट नहीं हूँ। इसके बावजूद इस ज़ुबान ने मुझे बहुत कुछ दिया है’। उर्दू की वजह से करियर बना: डॉ.सईद आलम ने कहा- ‘अगर मेरा पूरा करियर 40 साल का है तो 30 साल का करियर उर्दू की वजह से ही बना। जो कुछ भी कामयाबी मिली, वह उर्दू की वजह से ही मिली। मेरी पीएचडी की वजह से मुझे रिसर्च का फ़ायदा मेरे नाटकों में मिला, अलावा इसके इंटरनेशनल पॉलिटिक्स की मेरी पढ़ाई कभी काम नहीं आई। मगर वालदेन(माता-पिता) की घर में मिली उर्दू की तालीम और कौमी आवाज़ जैसे अख़बार ने मुझे जो सिखाया, उसकी वजह से मैं इस पेशे में कुछ कर पाया’।उर्दू में पेशेवर थियेटर का मिला फ़ायदा: उन्होंने कहा – ‘उर्दू ज़ुबान में अपने पेशेवर थियेटर का मुझे बहुत फ़ायदा मिला। मैंने अपने थियेटर की वजह से कभी किसी से कोई नौकरी नहीं मांगी, कभी किसी पर निर्भर नहीं रहा। संघर्ष तो आज भी है, मगर कभी किसी का दरवाज़ा खटखटाना नहीं पड़ा। मेरे नाटक, अनजान लोग टिकट लेकर देखते रहे। मेरे साथी कलाकारों को मैं ‘पे’ करता रहा। किसी के भरोसे नहीं रहा। उर्दू ने मुझे इतना कुछ दिया’।(डॉ. सईद आलम के साथ इस रिपोर्ट के लेखक शकील अख़्तर। शकील अख़्तर रचनाकार पत्रकार और कला समीक्षक हैं। वे रंगमंच के कलाकार रहे। 30 सालों से कला आयोजनों और कलाकारों पर लिख रहे हैं। कला केंद्रित वेबसाइट indorestudio.com के संस्थापक संपादक हैं। 8 नाटकों का लेखन किया है। दो नाटक एनएसडी, दिल्ली मंचित हुए हैं। 6 दैनिक समाचार पत्रों में सेवाएं दे चुके शकील अख़्तर, भारत के न्यूज़ चैनल इंडिया टीवी के सीनियर एडिटर रहे।) आगे पढ़िये – दिल्ली के मंच पर के.एल.सहगल और मीना कुमारी https://indorestudio.com/delhi-manch-kl-sehgal-meena-kumari/

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