अरविन्द शर्मा, इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। ‘प्रथा’, एक ऐसा नाटक जो भावनाओं के उच्च शिखर को छूता है। नाटक का
मूल बिन्दु यही है कि ऐसी प्रथा जो सुख के बदले किसी निरीह पशु की बलि मांगे, सर्वथा अनुचित है। इसी मूल बिन्दु को अत्याधिक मार्मिक बनाता है, विशुद्ध प्रेम, फिर वह प्रेम चाहे इंसान से हो या जानवर से। इस आधुनिक युग में भी अंधविश्वास को जड़ मूल से समाप्त कर पाना कठिन सा लगता है। इन्हीं कुछ बातों को समेटे हुए प्रथा नाटक का निर्देशन श्री केजी त्रिवेदी ने किया है। आपके निर्देशन की सबसे बड़ी विशेषता मुझे यही दिखाई देती है कि नाटक चाहे बच्चों का हो या बड़ों का, उसे भारी-भरकम नहीं बनाया जाता। यही कारण है कि आम दर्शक उनके द्वारा निर्देशित नाटकों से खुद को जोड़ पाता है।

नाटक में जब मंच पर आया नन्हा बकरा : यह नाटक जवाहर बाल भवन के नाट्य प्रभाग के बच्चों द्वारा मंचित किया गया। बच्चों ने इतनी सहजता से अपनी प्रस्तुति दी कि ऐसा लगा ही नहीं यह प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे बच्चे हैं। उनके अभिनय की परिपक्वता उनकी आयु के हिसाब से प्रशंसनीय है। इस नाटक का सबसे अद्भुत अनुभव रहा मंच पर छोटे से बकरे का वास्तविक रूप में प्रयोग। चूंकि वह तो जानवर था, उसे सिखाया नहीं जा सकता था लेकिन बच्चों ने अपने किरदार निभाते हुए उसकी उछलकूद को अपने नाटक का हिस्सा बनाये रखा जो काबिले तारीफ है।

28 मिनिट के इस नाटक में रिकार्ड किये हुए संगीत की भूमिका भी बहुत अच्छी रही। वेशभूषा ने ग्रामीण परिदृश्य को उभारा है। नाटक समग्र रूप से शिक्षाप्रद एवं भावनाप्रधान रहा। केजी त्रिवेदी जी के निर्देशन में इस प्रकार के और भी सामाजिक समस्यापरक नाटकों के मंचन देखने की अभिलाषा लिए मैं पूरी टीम को बधाई देता हूँ।
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