क्या एक अभिनेता को विपश्यना या विपासना जैसी योग साधना करना चाहिये? क्या अभिनय में इस योग साधना का लाभ मिल सकता है ? भावों की अभिव्यक्ति में यह किस तरह से काम कर सकती है? एक एक्टर के लिये यह किस तरह से विचार का विषय है और क्या यह ज़रूरी है? इस सम्बंध में हमने युवा अभिनेता और निर्देशक तपन शर्मा से उनके विचार जानने की कोशिश की। हाल ही में उन्होंने मौन और ध्यान की इस साधना का अनुभव लिया है। यहाँ पढ़िये उनके अनुभव, उनके ही शब्दों में। – संपादक, इंदौर स्टूडियो।
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विपश्यना का मेरा पहला अनुभव: मैं एक रंगमंच का अभिनेता हूँ। करीब 7 सालों से निरंतर रंगकर्म कर रहा हूँ। मैं इंदौर में अपनी नाट्य संस्था ‘सहस्रार’ भी चलाता हूँ। इस रंग समूह के माध्यम से नाटकों का मंचन कर रहा हूँ। हाल ही में मैं कानपुर के ‘धम्म कल्याण विपासना मेडिटेशन सेंटर’ में इस साधना का अनुभव लिया। मैं दस दिनों तक इस ध्यान केंद्र में ही रहा। मैं जब इस साधना के लिये पहुँचा, तब मेरे भीतर कई तरह के सवाल थे, कई जिज्ञासाएं थीं।
सुखद अनुभव वाली साधना: सच कहूँ तो मेरा अनुभव बेहद सुखद रहा और मुझे लगा कि इस साधना के लिये 10 या 11 दिन बहुत कम है। इस दौरान ही मुझे बहुत कुछ सीखने और समझने को मिला। यद्यपि यह मेरे लिये इतना आसान नहीं था। मैं एक कलाकार हूँ। सामान्य मनुष्य की तरह मेरे अंदर भी सैकड़ों विचारों के आने और जाने का सिलसिला चलता रहता है। परंतु एक रचनाधर्मी होने के नाते इन विचारों के प्रवाह एक अलग ही स्तर पर चलता रहता है। ऐसे में उन गतिशील विचारों को नियंत्रित कर पाना कई बार ज़रा मुश्किल होता है।
खुद को असहाय पा रहा था: ज़ाहिर है कि शुरू-शुरू में मुझे ख़ासी परेशानी हुई। अपने विचार भावों को नियंत्रित कर पाने में ख़ुदको असहाय पा रहा था। कहने को ऊपर से ख़ामोश था, मगर मेरे अंदर का कलाकार विचारों में मग्न था। एक कलाकार के रूप में हमारी काल्पनिक क्षमता ही, हमारी रचनात्मकता का मूल आधार भी है। कई दफा आंख बंद करते ही मै विपश्यना पर ही नाटक डिज़ाइन करने लग जाता, किरदार तय कर लेता, लाइट्स डिज़ाइन करने लगता। तभी स्मरण होता – अरे अभी का यथार्थ मेरी सांस है, सांस पर ध्यान ही साधना है। कभी आश्रम के दूसरे मौन साथियों की बॉडी लैंग्वेज का अवलोकन करने लगता तो कभी उनके हाव-भाव से, उनके अंदर चल रही बातों पर विचार पढ़ने लगता। कभी 89 बरस की आयु वाले तंदरुस्त, निरोगी, सकारात्मक और मुझसे भी ज्यादा ऊर्जावान आचार्य की आवाज़ की गहराइयों को पर ध्यान चला जाता कि ये आवाज़ किस सुर और पिच में है और कहाँ से अनुनादित हो रही है।
धीरे-धीरे हुआ सबकुछ शांत: मगर धीरे-धीरे यह संतुलन बना और मैं संयत होने लगा। आसपास के हर उम्र के लोगों के साथ ही ओजस्वी आचार्य की धीर-गंभीर बातों का मुझ पर असर होने लगा। मैं भी विपश्यना का हिस्सा बनता चला गया। धीरे-धीरे सब शांत, स्थिर होने लगा। कई तरह से मन, विचार, देह की यहाँ पर शुद्धि हो रही थी। बिना बोले, ख़ुद के साथ जीकर। चूँकि विपश्यना एक तरह से ख़ुदको जानने और समझने की एक प्रक्रिया भी है, इसलिये मुझे अनुभव हुआ कि एक अभिनेता के लिये भी यह एक अच्छी साधना प्रक्रिया है। बतौर अभिनेता मैं अपने विचार रखूँ , उससे पहले हमें यह जानना भी ज़रूरी है कि असल में विपश्यना है क्या?
विपश्यना या विपासना है क्या: विपश्यना या विपासना का मतलब है कि जो वस्तु सचमुच जैसी हो, उसे उसी प्रकार जान लेना। यह मन की गहराई में जाकर आत्म-निरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि की साधना है। मन की एकाग्रता के लिये यह अपनी श्वास केंद्रित करने से प्रारंभ होती है। यह भगवान गौतम बुद्ध द्वारा बनाई गई ध्यान साधना है। साधना के तीन मार्ग माने जाते हैं। पहला विपश्यना, दूसरा भावातीत ध्यान और तीसरा हठयोग। भगवान बुदध ने विपश्यना साधना से ही बुद्धत्व को प्राप्त किया था। महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं में से एक विपश्यना भी है। इसका अर्थ है – विशेष प्रकार से देखना (वि + पश्य + ना)। यह योग साधना का ही एक मार्ग है।
सत्य की उपासना, जीने का अभ्यास: यह वास्तव में सत्य की उपासना है। सत्य या वस्तु स्थिति में जीने का अभ्यास है। विपश्यना इसी क्षण में यानी तत्काल में जीने की कला है। भूत की चिंता और भविष्य की आशंकाओं में जीने की जगह भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को आज के बारे में सोचने के लिए कहा। विपश्यना सम्यक् ज्ञान है। जो जैसा है, उसे ठीक वैसा ही देख-समझकर आचरण करें। वही सही और कल्याणकारी सम्यक आचरण होगा। विपश्यना जीवन की सच्चाई से भागने की शिक्षा नहीं देता, बल्कि यह जीवन को उसके वास्तविक रूप में स्वीकारने की प्रेरणा देता है।
भारत की एक पुरातन विद्या: माना जाता है कि यह पुरातन विद्य़ा भारत में बीते 2500 साल से विद्यमान है और यह दस दिन के न्यूनतम कोर्स से शुरू होती है। इसमें आश्रम के आचार्य और नियम के अनुसार मौन धारण करना पड़ता है। आप किसी से बात नहीं कर सकते, इशारों मे भी नहीं। अगर कुछ कठिनाई या समस्या हो तो आप आचार्य या धम सेवक से मशवरा कर सकते है। यहाँ सुबह 4 बजे से रात 9.30 बजे तक स्थापित नियमों का पालन करना पड़ता है। किसी भी तरह के संपर्क, नशे या सामिष भोजन से दूर रहना पड़ता है। ख़ास बात यह भी है कि यह साधना किसी जाति, धर्म समुदाय से विमुक्त है। हर कोई इसे कर सकता है। इसका ख़ुद पर असर देख सकता है।
एक अभिनेता के लिये क्यों लाभकारी: जैसा कि हम जानते हैं, किसी भी मनुष्य के लिये सभी कार्य करने का माध्यम शरीर ही होता है। इस दृष्टि से एक अभिनेता का शरीर तो और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। अभिनेता को अभिनय के लिये अपनी देह या शरीर का तरह-तरह से इस्तेमाल करते आना चाहिये। उससे भी पहले कार्य करने की क्रिया अथवा प्रतिक्रिया, दु:ख-दर्द, ख़ुशी, घृणा, प्रेम जैसे भावों के बारे में उसे पता होना चाहिये। यह भी पता होना चाहिये कि विचार कैसे और क्यों आते हैं अथवा किस विचार या भाव के आने पर सांस कैसी और क्यों चलती है।
गाड़ी चलाना सीखने जैसी प्रक्रिया: अगर इन बातों का पता हो, तब मेरे विचार में अभिनय करना और सहज,सरल और बेहतर हो सकता है। यह बिलकुल गाड़ी को चलाने के बारे में जानने और सीखने जैसा है। जब हम कोई गाड़ी चलाना सीखते है, तब उस मशीन की ज्यादा जानकारी और अनुभव ना होने के कारण, उसे चलाना कठिन और जटिल हो जाता है। हमारा शरीर भी इस ब्रह्मांड की एक पेचीदा मशीन मानी जाती है और जितना ज़्यादा हम इस मशीन (शरीर) को बारीकी से समझने की कोशिश करेंगे, उतना ही बेहतर ढंग से हम, इस मशीन (शरीर) का इस्तेमाल कर पाएंगे। बेहतर अभिनय कर पाएंगे, संवेदनाओं को बेहतर तरीके से समझकर अभिव्यक्त कर पाएंगे। विपासना इस शरीर को बेहतर तरीके से समझने और आंतरिक रूप से कब, कहाँ, क्यों, कैसे को जानने की एक प्रक्रिया है। मुझे ऐसा लगता है कि यह एक अभिनेता के लिये भी काफ़ी लाभदायक हो सकती है। मेरे विचार में एक बार इसका अनुभव ज़रूर लेना चाहिये। मैं चाहूँगा, अगर एक सफल अभिनेता बनने को लेकर अगर आपके पास भी इस तरह के कुछ विचार हों, तो अपनी टिप्पणी या विचार अवश्य ही साझा करें। आगे पढ़िये –
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