Sunday, October 18, 2026
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अब नाटक में भी ‘वास्तेगुनाहुइयां’

रवीन्द्र त्रिपाठी, इंदौर स्टूडियो। वैसे तो राजनीति को आम तौर पर राष्ट्रीय या स्थानीय दायरे में देखा और समझा जाता है। लेकिन ये सब राजनीति को देखने का एक सीमित पहलू भी है। वास्तविकता ये है कि पिछले लगभग दो सौ साल से राजनीति अब अंतरराष्ट्रीय भी हो गई है। जबसे साम्राज्यवाद और नवसाम्राज्यवाद का उदय हुआ तब से दुनिया के सभी देश किसी न किसी तरह के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों के दुष्चक्र में पड़े हुए हैं। उनके प्राकृतिक संसाधनों पर साम्राज्यवादी देशों औऱ वित्तीय ताकतों की निगाह लगी रहती है। भानु भारती का नाटक `फंदा नाच’ इसी अंतरराष्ट्रीय दुष्चक्र को सामने लाता है। लेकिन फंतासी की शैली मैं।  नाटक 'फंदा नाच' का एक दृश्यफंदा नाच’ पिछले दिनों जबलपुर के शहीद स्मारक प्रेक्षागृह में भानु भारती के निर्देशन में ही खेला गया। ये नाटक एक कार्यशाला में तैयार हुआ जिसका आयोजन जबलपुर की रंगसंस्था समागम रंगमंडल’ ने किया था। आशीष पाठक औऱ स्वाति दूबे द्वारा संचालित`समागम रंगमंडल’ वैसे तो जबलपुर केंद्रित संस्था है लेकिन इसकी प्रतिष्ठा देश भर में है और अलग अलग राज्यों औऱ शहरों से युवा रंगकर्मी यहां प्रशिक्षण के लिए आते हैं। इस नाटक में भी कई अभिनेता चंडीगढ़, समस्तीपुर और आजमगढ़ जैसे शहरों से आए थे।  नाटक 'फंदा नाच' का एक दृश्यनाटक की मूल कथा तो एक सिकोरिटी गार्ड के इंर्दगिर्द घूमती है। ये गार्ड कोटर नाम के एक देश के सुऱक्षाबल में एक अदना सा सुरक्षाकर्मी है। इस देश में एक दसरे देश कंटिका के राजप्रमुख का आगमन होता है। उसे राजकीय सलामी दी जा रही होती है कि ये गार्ड उसी समय कंटिकाधीश को टंगड़ी मार देता है। स्वाभाविक है पूरे कोटर राज्य में अफरातफरी मच जाती है। सुरक्षागार्ड को गिरफ्तार कर लिया जाता है। जांच पड़ताल शुरू होती है।  नाटक 'फंदा नाच' का एक दृश्यपूछताछ के दौरान गार्ड यही बतलाता है कि उसके अंदर एक चिड़िया फड़फड़ाई थी और उसके बाद उसने ऐसा कर दिया। पर ये तर्क किसी को विश्वसनीय नहीं लगता। राजसत्ता से जुडे लोगों को ही नहीं बल्कि गार्ड की प्रेमिका को भी। पर तमाम सवाल-जवाबों की बीच गार्ड अपनी इसी बात पर अड़ा रहता है।  नाटक 'फंदा नाच' का एक दृश्यविदेशी मनोवैज्ञानिक भी बुलाए जाते हैं। सबके सांमने गार्ड अपनी बात दुहराता रहता है। बीच में वो चिड़िया से बतियाता भी रहता है। धीरे-धीरे ये बात खुलती जाती है कि कोटर के प्राकृतिक संसाधनों पर कंटिका की निगाह लगी हुई है। कंटिका कोटर के जंगल औऱ दूसरे प्राकृतिक संसाधनों को हथियाना चाहता है। वहां खनन कराना चाहता है। लेकिन वहां की पक्षियों को ये बात मंजूर नहीं। वो एक तरह से खुला विद्रोह कर देती हैं। चिड़ियों का विद्रोह किस लिए है? राज्य को बचाने के लिए, राज्य के प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए, जंगलों को बचाने के लिए। नाटक 'फंदा नाच' का एक दृश्यकई व्याख्याएं हो सकती हैं। विभिन्न प्रकार से इस नाटक के मंतव्य को समझा जा सकता है। लेकिन मूल में एक बात है और वो कि कोई भी राज्य सत्ता, चाहे वो किसी देश की हो या अंतरराष्ट्रीय हो – दूसरों पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं कर सकती है। कोई न कोई किसी संपूर्णसत्तावाद को चुनौती देता ही है। किसी ने किसी के भीतर कोई चिड़िया फड़फड़ाती ही है और बगावत की आंधी उठने लगती है। सिर्फ लोगों के बीच ही नहीं बल्कि प्रकृति के बीच भी। पशु पक्षियों के बीच भी।नाटक के लेखक और निर्देशक भानु भारतीय कलाकारों से चर्चारत भानु भारती ने इस नाटक में मुखौटों का भी इस्तेमाल किया है। कोटर राज्य के राजा और उसके सलाहकार भी मुखौटों में हैं औऱ विदेशी मनोवैज्ञानिक भी। गार्ड की निगरानी में तैनात को कोटर राज्य के दूसरे कर्मचारी भी मुखौटों में हैं। पर मुखौटों का प्रयोग सिर्फ नाटकीय युक्ति नहीं है ये दिखाने के लिए भी है चाहे कोई भी राज्य हो, उसके कर्मचारी हों- अपने असली चेहरे आम लोगों के बीच आने नहीं देते। उनके वास्तविक मंतव्य छिपे रहते हैं। अपने लोगों के बीच भी, दूसरों के सामने भी। उनके शब्द कुछ और होते हैं और निहितार्थ कुछ औऱ। नाटक 'फंदा नाच'वैसे नाटक के मुखौटे प्रयोगात्मक भी हैं। हर मुखौटा अपनी खास पहचान लिए हुए है। राजा की अपनी चालाकी है, सलाहकार की अपनी और विदेशियों की अपनी। सब एक दूसरे से भी चालाकी बरत रहे हैं और अपने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति में लगे हैं। लेकिन विद्रोही गार्ड, जिसकी भूमिका कार्तिक ने निभाई है, किसी मुखौटे में नहीं। इसलिए कि उसका कोई निजी स्वार्थ नहीं है। वो मासूम है और इसी मासूमियत की वजह से कंटिकाधीश को टंगड़ी मार देता है। मुखौटाकार चैतन्य सोनी ने जो चरित्रों को अपनी तरह की निजी भंगिमाएं दीं। नाटक 'फंदा नाच' का एक दृश्यनाटक में वैसे तो सार्वकालिक राजनीति है पर साथ ही एक तरह की समकालीन भी है। आज के भारत की राष्ट्रीय राजनीति को निर्धारित करनेवाला एक तत्व जेनजी है। यानी आज की युवा पीढी। अब तो जेन अल्फा भी आ गया है (पर वो अलग कहानी है)। दिल्ली और देश के दूसरे शहरों में हालिया हुए जेनजी के आंदोलन के पहलू भी इस नाटक में समाहित हो गए हैं। वैसे जेनजी का आंदोलन भी अकस्मात पैदा हुआ हालांकि उसकी पृष्ठभूमि पहले से तैयार हो रही थी। कई बार सत्ता में बैठे लोगों को ये एहसास नहीं होता कि जनता के अंदर किस तरह का गुस्सा फैल रहा है। जब उनको लगता है कि सब कुछ ठीक ठाक चल रहा होता है तभी वास्तेगुनाहुइयां’ हो जाता है।  नाटक 'फंदा नाच' का एक दृश्ययूँ ‘वास्तेगुनाहुइयां’ का वास्तविक अर्थ नहीं है। ये एक स्लैंग है और इस बार के जेनजी के आंदोलन में दिल्ली में काफी लोकप्रिय हुआ। पर इसका एक राजनैतिक अर्थ ये है कि कोई भी व्यक्ति या बच्चा भी किसी अधिकारी या सत्ताधारी को वास्तेगुनाहुइआं’ कह के चिढ़ा सकता है या किसी जन रोष को अभिव्यक्त कर सकता है। नाटक में कोरियोग्राफी के दौरान पक्षियों का समूह वास्तेगुनाहुइयां’ करता है जो इस आंदोलन की याद दिला देता है।  नाटक 'फंदा नाच' का एक दृश्यनाटक में संगीत और प्रकाश योजना भी सुव्यवस्थित थी। प्रकाश परिकल्पक शरद कुलश्रेष्ठ ने नाटक के मूल अर्थ को प्रकाश योजना के ऐसा विन्यस्त किया कि नाटकीय प्रभाव बहुलार्थी हो गया। रेखा सिसोदिया और नकुल का संगीत भी नाटक के भीतर निहित कई ध्वनियों को सामने लाने वाला थी। नाटक 'फंदा नाच' का एक दृश्यइस नाटक का विचार भानु भारती के मन में तिरेपन साल पहले आया था जब इन्होंने एक सपना देखा था। नाटक समाप्त होने के बाद उन्होंने बताया कि स्पप्न में देखा गया विचार उनके भीतर पकता रहा और अब जाकर ये पूरा हुआ। कभी कभी कुछ विचार एक पूरी तरह प्रस्फुटित होने में कई दशकों का समय़ लेते हैं। आगे पढ़िये – कैसी रही चंडीगढ़ में आयोजित स्स्टेनेबल कला प्रदर्शनी – https://indorestudio.com/sustainable-art-exhibition-chandigarh/

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