अमूल गर्ल के जन्मदाता सिल्वेस्टर दाकुन्हा का 80 साल की उम्र में निधन होगा। उनके निधन के बाद सोशल मीडिया पर ‘अमूर्ल गर्ल’ का रोता हुआ वह चित्र भी वायरल हो गया, जो लड़कियों के खिलाफ़ होने वाली हिंसा को लेकर बनाया गया था। कहा जाने लगा, ‘अमूल गर्ल’ अपने सृजनकार के निधन पर आँसू बहा रही है। सैकड़ों विज्ञापनों के जन्मदाता सिलवेस्टर वाकई अद्भुत प्रतिभा के धनी थे। परंतु अमूल गर्ल वाले शुभंकर से जुड़ी उनकी कहानी यादगार है। उन्हें ‘फादर ऑफ अमूल गर्ल’ कहा जाता था। पढ़िये इस एड गुरू की अमूल गर्ल वाले इस शुभंकर के जन्म से जुड़ी पूरी कहानी। – इंदौर स्टूडियो डेस्क।
1966 में बना था यह शुभंकर: 1966-67 में उन्होंने अमूल के प्रचार के लिये इस कार्टून वाले शुभंकर का निर्माण किया था। उन्होंने एक ऐसी मासूम लड़की का कैरिकैचर तैयार किया जो डाटेड फ्रॉक पहने हुए है, जिसके बाल नीले हैं और जिसकी हाफ पोनी बंधी हुई है। 1967 की गर्मियों में पहली बार मुंबई की सड़कों पर उसका होर्डिंग नज़र आया था। जल्द ही यह अमूल कन्या लोगों को ज़हनो दिल में उतर गई।
अमूल गर्ल से मिली पहचान: एड गुरू कहलाने वाले सिल्वेस्टर दाकुन्हा ने वैसे तो बहुत से विज्ञापन रचे, लेकिन उन्हें अमूल गर्ल से ही पहचान मिली। असल में अमूल गर्ल को अमूल के प्रतिद्वंद्वी ब्रांड पोलसन की बटर-गर्ल की प्रतिक्रिया में बनाया गया था। उस समय पोलसन बटर गर्ल का विज्ञापन ख़ासा मशहूर था। धीरे-धीरे अमूल गर्ल को सामयिक मुद्दों के साथ जोड़ा गया। अब उसकी चुटीली बातों का लोग मज़ा लेने लगे। कई बार उसकी टिप्पणियों को लेकर विवाद भी खड़े होने लगे। मगर अमूल गर्ल की चमक कभी फीकी नहीं पड़ी।
कैसे जागी अमूल गर्ल की कल्पना: पोलसन बटर गर्ल कुछ मोटी और बड़ी थी। उसकी तुलना में अमूल गर्ल ज़्यादा प्यारी और मासूम थी। इसकी कल्पना तब काग़ज़ पर उतरी जब सिल्वेस्टर दाकुन्हा और उनके आर्ट डायरेक्टर यूस्टेस फर्नांडीस की एंजेसी ‘एडवरटाइजिंग एंड सेल्स प्रमोशन’ को यह काम मिला। दोनों अमूल के पक्ष में नये तरीके से प्रचार के बारे में सोचने और तरह-तरह से काम करने लगे। अनुबंध के बाद दोनों डॉ.वर्गीस कुरियन से भी बड़े काम के सुझाव मिले। डॉ.वर्गीस उस समय, गुजरात कोऑपरटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड के अध्यक्ष थे। उन्होंने कहा, चित्र कल्पना ऐसी हो जो गृहणियों को आकर्षित कर सके और उसे बनाना भी आसान हो। असल में तब आउटडोर प्रचार का ही ज़माना था। तब होर्डिंग या पैनल पर पोस्टरों के माध्यम से ही प्रचार अभियान चलाया जाता था। तब बार-बार नये पोस्टर्स और पैनल बनाने का काम मुश्किल भरा भी होता था।
और बना चुलबुली लड़की वाला शुभकंर: अमल के काबिल इन सुझावों के बाद सिलवेस्टर ने अमूल गर्ल की कल्पना की। उसे अपनी तरह से मूर्त रूप दे दिया। इसे स्वीकृति मिली और जल्द ही यह विज्ञापन की दुनिया में नई इबारत लिखने वाली तस्वीर बन गई। अटरली बटरली डिलिशियस जैसे इसके स्लोगन आम लोगों की जुबान पर चढ़ गये और फिर ऐसा वक्त आ गया जब अमूल गर्ल के नये पोस्टर का लोगों को इंतज़ार रहने लगा। ख़ासकर उसकी प्रासंगिक टिप्पणियों को लेकर। 2016 में अमूल गर्ल के इस विज्ञापन ने मैराथन 50 साल पूरे किये और यह सिलसिला उतनी ही दिलचस्पी से जारी है। अमूल कंपनी ने इस एक कैम्पेन की बदौलत अपने कस्टमर्स के दिलो में बड़ी जगह बनाई और कंपनी का कारोबार नई ऊंचाइयों पर भी पहुँचा। बहरहाल अमूल गर्ल के रचनाकार सिलवेस्टर दाकुन्हा तो नहीं रहे। परंतु उनकी इस विरासत और काम अब उनके बेटे राहुल दाकुन्हा अपने स्तर पर आगे बढ़ा रहे हैं।
दा कुन्हा और उनके परिवार की कहानी: सिलवेस्टर दा कुन्हा का जन्म पुर्तगाली मूल के बॉम्बे गोवा परिवार में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से उत्तरी गोवा के बर्देज़ तालुका से था और बाद में बॉम्बे (अब मुंबई) के मझगांव इलाके में पहुँचा, जहां उनका पालन-पोषण हुआ। उनके भाई गर्सन दा कुन्हा एक विज्ञापन पेशेवर थे। उनके चाचा जोस गर्सन दा कुन्हा, चिकित्सक और इतिहासकार, ने बॉम्बे की उत्पत्ति का दस्तावेजीकरण करने का काम ‘द ओरिजिन्स ऑफ बॉम्बे’ के नाम से किया था। दा कुन्हा सीनियर आगा खान के पारिवारिक चिकित्सक भी थे।
जॉन कुरियन ने दी एड एंजेसी में नौकरी: सिलवेस्टर दा कुन्हा ने अपने विज्ञापन करियर की शुरुआत ब्रिटिश विज्ञापन एजेंसी एल. ए. स्ट्रोनैच एडवरटाइजिंग से की। भारत वापस लौटने से पहले उन्होंने तीन साल तक लंदन में काम किया। वापसी यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात बिड़ला समूह के विज्ञापन और बिक्री प्रचार (एएसपी) के प्रबंधक जॉन कुरियन से हुई, जिन्होंने दा कुन्हा को एजेंसी में नौकरी की पेशकश की। एएसपी में, दा कुन्हा ने जीवन बीमा निगम, ग्लैक्सो और लैक्मे सहित खातों को संभालने से पहले शुरुआत में बिड़ला समूह के कुछ इनहाउस ब्रांडों जैसे हिंदुस्तान मोटर्स और सेंचुरी रेयॉन को संभाला। मगर उनकी बड़ी पहचान अमूल गर्ल से ही बनी। आगे पढ़िये –
‘फादर ऑफ़ अमूल गर्ल’ सिलवेस्टर दा कुन्हा की यादगार है कहानी
RELATED ARTICLES

