‘फोर डॉटर्स’ में ISIS का सच, बेस्ट डॉक्युमेंट्री फ़िल्म का मिला पुरस्कार

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जेद्दा (सऊदी अरब) से अजित राय की विशेष रिपोर्ट। तीसरे रेड सी अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल (RSIFF) में फिल्म ‘फोर डॉटर्स’ (Four Daughters) को बेस्ट डॉक्यूमेंट्री के पुरस्कार से नवाज़ा गया है। यह डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म इस्लामिक स्टेट (ISIS) की हक़ीक़त का पर्दाफ़ाश करती है। अरबी भाषा की यह फ़िल्म को फेस्टिवल के मुख्य प्रतियोगिता खंड में दिखाई गई। इसका निमार्ण ट्यूनीशिया की महिला फिल्मकार कौथर बेन हनिया (Kauther Ben Hania) ने किया है। भारत के सुदीप्तो सेन की फिल्म ‘केरल स्टोरी’ के ठीक उलट, यह फिल्म वाकई सच्ची घटना पर बनी है। एक सशक्त सिनेमाई प्रतिरोध: ‘फोर डॉटर्स’ अतिवादी संगठन इस्लामिक स्टेट के खिलाफ एक सशक्त सिनेमाई प्रतिरोध है। यह एक साहसिक डॉक्यूमेंट्री है जो बताती हैं कि इस्लामिक स्टेट से सबसे ज्यादा नुकसान इस्लाम और मुसलमानों, ख़ासकर मुस्लिम औरतों का हुआ है। उनकी क्रूरता, यौन शोषण और हिंसा की शिकार दुनिया भर की मुस्लिम औरतें ही रहीं। ऐसी औरतों को एक ओर जहां दिल दहलाने वाले शोषण से गुज़रना पड़ता है, वहीं इस्लामिक स्टेट से किसी तरह आज़ाद होने या अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा छुड़ाए जाने पर बाक़ी ज़िंदगी जेलों में काटनी पड़ती है। इसकी बड़ी वजह यह है कि दुनिया भर में आतंकवादी संगठनों को लेकर ऐसे ही कानून (जीरो टालरेंस) बनाए गये हैं।ओल्फा ने सरकार पर लगाया था आरोप: ट्यूनीशिया के समुद्री शहर सौशे की एक तलाक़शुदा औरत, ओल्फा हमरानी ने अप्रैल 2016 में सरकार पर आरोप लगाया था। ओल्फा ने मीडिया में यह कहकर तहलका मचा दिया था कि उसकी चार में से दो बेटियां गायब है और उन्हें ढूंढने में सरकार मदद नहीं कर रही है। उसने यह भी कहा था कि अरब स्प्रिंग (2010) के बाद मुस्लिम देशों में राजनेताओं द्वारा जिहादी मौलवियों-इमामों के प्रति नरमी बरते जाने से इस्लामिक स्टेट को मदद मिली है। बाद में पता चला कि ओल्फा हमरानी की दोनों बड़ी बेटियां रहमा और गुफरान ‘लव जिहाद’ का शिकार होकर सीरिया और लीबिया में इस्लामिक स्टेट के लिए लड़ने चली गई हैं।हिजाब और बुर्का पहनने का दबाव: इस्लामी क्रान्ति के बाद मुस्लिम लड़कियों पर हिजाब और बुर्का पहनने का दबाव बढ़ा। एक दिन शहर के चौराहे पर रहमा और गुफरान पर कुछ जिहादी लड़के हिजाब फेंकते हैं और यहीं से रेडिकलाइजेशन बुनियाद पड़ती है। ओल्फा की हंसती-खेलती लड़कियां कहती हैं कि हिजाब और बुर्का सारी सुंदरता को ढक देता है। दिसंबर 2021 में इन दोनों को लीबिया की फौजों ने मुक्त तो कराया पर फरवरी 2023 में गुफरान को 16 साल जेल की सजा हुई और रहमा की इस बीच मौत हो गई। ओल्फा हमरानी अपनी दो बची हुई बेटियों-ईया और तायसीर के साथ लीबिया की जेल में बंद अपनी बेटी गुफरान से मिलने की अनुमति के इंतजार में हैं।एक नये तरह के सिनेमा का सच: कौथर बेन हनिया ने ‘फोर डॉटर्स’ में एक नये तरह का सिनेमा रचा है। उन्होंने वास्तविक चरित्रों के साथ अभिनेताओं से काम कराया है। हम देखते हैं कि ट्यूनीशिया का समाज इतना आधुनिक और खुले विचारों वाला है। ओल्फा की चारों बेटियों की दिनचर्या में वास्तविक सुंदरता और आज़ादी है। इस्लामी रेडिकलाइजेशन के बाद सबकुछ बदल जाता है। हिजाब बुर्का के पहले और बाद के जीवन को इन लड़कियों की निगाह से देखते हुए हम कई बार भावुक हो उठते हैं। भावनात्मक रिश्तों की सिम्फ़नी: रहमा और गुफरान की भूमिकाएं इचराक मतार और नूर करोई ने निभाई है जबकि बाकी दो बेटियां ईया और तायसीर ने अपनी अपनी भूमिकाएं खुद निभाई है। ओल्फा की भूमिका हेंद साबरी ने और खुद ओल्फा ने की है। कई दृश्यों में यह देखना मजेदार है कि ओल्फा अपनी भूमिका निभा रही हेंद साबरी की गलतियों को ठीक करती चलती है। चार बहनों और उनकी मां के बीच के भावनात्मक रिश्तों की सिम्फनी में पूरी फिल्म हमारे समय का एक अनदेखा कोलाज रचती है। इसमें कलाकार और वास्तविक चरित्र सच्ची कहानी को दोबारा अभिनीत करते हैं।मानवीय दु:खों में हालात का सच: फिल्म में अलग से कोई राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, पर इन पांच औरतों के मानवीय दुःखों के माध्यम से निर्देशक ने वह सबकुछ कह दिया है जिसे स्वीकार करने से मुस्लिम देशों के राजनेता और शासक बचते नजर आ रहे हैं। इसके बावजूद कि इस्लामी आतंकवाद सबसे पहले उन्हें ही खत्म करेगा। यहां हम बेल्जियम के आदिल अल अरबी और बिलाल फल्लाह की सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्म ‘ रेबेल।’ को याद कर सकते हैं। यह एक हृदयविदारक साहसिक फिल्म है जो आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट के पूरे प्रपंच को परत दर परत बेपर्दा करती है। फिल्म यह भी बताती है कि औरतें प्रेम करती है और मर्द अक्सर धोखा देते हैं। (अजित राय प्रख्यात कला और फिल्म समीक्षक हैं। दुनिया के प्रमुख फिल्म उत्सवों की हिन्दी में रिपोर्ट्स के वे अग्रणी पत्रकार हैं।)  आगे पढ़िये –

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