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अशोक राही, इंदौर स्टूडियो। गफ़रुद्दीन मेरा चालीस बरस पुराना भायला है। हम दोनों मेवाती हैं अलवरवासी । गफ़रुद्दीन पडूंन का कड़ा गाता है यानी लोक महाभारत। जैसे छत्तीसगढ़ मालवा में पंडवानी गायी जाती है वैसे ही मेवात में पडूंन का कड़ा। पंडून का कड़ा सरीखे महान एपिक को गाने वाले अपने भारत देश में अब 5-7 लोग ही बचे हैं। इनमें एक गफ़रुद्दीन है। बेहद खुशी की बात है कि रविंद्र मंच जयपुर के हीरक जयंती समारोह में भाई गफरुद्दीन मेवाती को बुलाया गया। गफूर ने अपने दल के साथ पूरे दिल से पडूंन का कड़ा सुनाया। लाक्षागृह के दहन और कीचक वध का जोरदार प्रसंग। यूं तो पडूंन का कड़ा कई-कई रात गाया जाता है और इसे बेहद दिलचस्प तरीके से मेवाती जोगी और मिरासी गाते हैं।
श्रीमती सोविला और उनकी टीम को बधाई: इस शानदार आयोजन के लिए रविंद्र मंच की मैनेजर श्रीमती सोविला माथुर जो खु़द एक संवेदनशील चित्रकार हैं और उनकी टीम को बहुत-बहुत बधाई और साधुवाद। पडूंन का कड़ा लोक महाकाव्य को 18वीं शताब्दी में सादुल्लाह नामक मेव ने रचा था । कहते हैं – जहां तक वेद कुरान है वहां तक सादुल्ला / आगे अगम अथाह है, मेरो जाने हैं अल्ला। एक बात और …भाई गफ़रुद्दीन को हाल ही केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी अवार्ड माननीय राष्ट्रपति महोदया ने प्रदान किया है। बधाई भाई गफ़रुद्दीन…. खूब फलो- फूलो। (लेखक जयपुर के प्रतिष्ठित लेखक और रंग निर्देशक हैं। आपको हाल ही में प्रतिष्ठित देवेंद्र तिरखा अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है।)

