Wednesday, May 13, 2026
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गांधी को समग्रता में आत्मसात करने की ज़रूरत

इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। भोपाल। महात्मा गांधी ने अपना पूरा जीवन व्यवहारिक दृष्टि से जिया। उन्होंने जब स्वतंत्रता आंदोलन में अहिंसा को अपनाया तो इसके पीछे 1857 की क्रांति की विफलता के निष्कर्ष समाहित थे। गांधी जी का स्पष्ट मानना था कि अंग्रेजों के पास जो सैनिक, व हथियार है उनसे सशस्त्र संघर्ष करके जीत पाना मुश्किल है। ऐसे में यदि एक बार फिर स्वंतत्रता आंदोलन को अंग्रेज दबा देते है तो यह देश व जनता के हित में नहीं है। गांधी जी के राष्ट्रवाद में कोई दूसरा पक्ष नहीं है उनका राष्ट्रवाद सबके लिए है। उक्ताशय की बात गांधी भवन में आयोजित ‘हिंसक समय में गांधी’ विषय पर एक व्याख्यान में बोलते हुए ख्यातिलब्ध साहित्यकार राजेश जोशी ने कही।

सत्य ही ईश्वर : उन्होंने कहा कि गांधी ने हमेशा अपने आपको बेहतर बनाते हुए और तर्क को प्राथमिकता देते हुए आंदोलन का नेतृत्व किया। वह गांधी ही थे जो पहले ईश्वर ही सत्य है कहते है लेकिन बाद में सत्य को ही ईश्वर मान लेते है। गांधी की अहिंसा को समझने के लिए उनके पूरे जीवन और सिद्धांतों को समझना होगा। उन्होंने एक बार कहा था कि यदि मुझे कायरता और हिंसा में से किसी एक को चुनना है, तो मैं बेशक हिंसा को ही चुनूंगा।

साम्प्रदायिकता के विरोधी रहे गांधी : श्री जोशी ने कहा कि गांधी जी पक्के धर्मनिरपेक्ष थे लेकिन उनकी जुबान पर हमेशा राम रहता था। उनके धर्म से किसी को काई परेशान नहीं होती थी। वे जीवन भर साम्प्रदायिकता के विरोधी रहे। गांधी जी एक काशी विश्वनाथ मंदिर को छोड़ कर कभी मंदिर नहीं गए, किसी धार्मिक कर्मकांड में नहीं पड़े। गांधी जी ने एक ऐसी राज्य सत्ता का मुकाबला अहिंसक तरीके से किया जिसके राज्य में सूरज अस्त नहीं होता था। गांधी मानते थे कि पूंजीवाद के पास बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं है। वे कहते थे कि ऐसे भी अवसर आए है जब पूंजीवाद ने बेरोज़गारी की समस्या को भयावह बना दिया।

बुरे लोग सत्ता में आ ही जाते हैं : राजेश जोशी ने कहा कि गांधी जी ने चोरी चौरा की घटना के बाद अपना आंदोलन वापस ले लिया था लेकिन जब करो या मरो आंदोलन के समय हिंसा हुई तो उन्होंने कहा कि यह हिंसा राज्य की तरफ से है, जनता की तरफ से नहीं। उन्होंने इसके लिए पेरू में हुई क्रांति का उदाहरण दिया जहां हिंसा राज्य के द्वारा की जा रही थी। राजेश जोशी जी न कहा कि वे अपनी मृत्यु से पूर्व साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों से बात करना चाहते थे, उनका मानना था कि संविधान कितना भी अच्छा बन जाए लेकिन यदि बुरे लोग सत्ता में आ जाते हैं तब साहित्यकार व संस्कृतिकर्मी ही आगे आकर उनका प्रतिरोध करें, इसलिए वे मानते थे कि इन लोगों को सीधी राजनीति में हिस्सा नहीं लेना चाहिए। समाज को दिशा देने का काम इन्हीं लोगों का है। उन्होंने प्रेमचंद, निराला सहित अन्य लोगों द्वारा गांधी जी पर की गई टिप्पणी को भी उद्धृत करते हुए कहा कि गांधी जी को समग्रता में आत्मसात करने की ज़रूरत है।

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