फरहान हनीफ, इंदौर स्टूडियो। कहते हैं सीखने की कोई उम्र नहीं होती, बस सीखने का जज़्बा होना चाहिए। इस बात को सच कर दिखाया है मुंबई की 75 वर्षीय गायत्री सिंघानिया ने। गायत्री जी न केवल उम्र के इस पड़ाव पर नई चीज़ें सीख रही हैं, बल्कि वे कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ते हुए अपनी ऊर्जा और हौसले से सबको हैरत में डाल रही हैं। इन दिनों वे उर्दू ज़बान की बारीकियों को अपना बना रही हैं। हिंदी के रास्ते उर्दू का सफ़र: गायत्री जी इन दिनों सेंट ज़ेवियर मुंबई के शिक्षक मुख़्तार खान से ऑनलाइन उर्दू सीख रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि वे उर्दू की लिपि नहीं, बल्कि हिंदी के माध्यम से उर्दू के शब्दों और जुमलों (वाक्यों) पर महारत हासिल कर रही हैं। उनके लिखे हुए वाक्य देखकर कोई भी दंग रह सकता है। वे बताती हैं, “इस उम्र में लिपि सीखना मुमकिन नहीं था, लेकिन उर्दू की मिठास मुझे हमेशा से खींचती थी, इसलिए मैंने हिंदी के ज़रिए इसे सीखने का फैसला किया।”
विरासत में मिला किताबों का शौक: कोलकाता में जन्मी गायत्री जी को पढ़ने का शौक अपने पिता से विरासत में मिला। उनके पिता की लाइब्रेरी में विनोबा भावे, रामायण, महाभारत और ‘कल्याण’ जैसी पत्रिकाएं थीं। शादी के बाद मुंबई आने पर उनके पति बाबूलाल सिंघानिया (80) ने उनके इस शौक को और परवान चढ़ाया। गायत्री जी कहती हैं, “उर्दू एक बेहद नफीस ज़बान है। मुझे ग़ालिब की ग़ज़लें और मंटो की कहानियों की हक़ीक़त पसंद है, हालांकि मंटो की कहानियों की कड़वी सच्चाई कभी-कभी बर्दाश्त करना मुश्किल होता है।” शब्दों से जुमले बनाने का हुनर: उनके शिक्षक मुख़्तार खान उन्हें उर्दू का एक शब्द देते हैं और गायत्री जी उस पर खूबसूरत वाक्य बनाती हैं। जैसे— ‘दरयाफ़्त’ शब्द पर वे लिखती हैं, “आजकल पुलिस महकमे वाले घर-घर जाकर दरयाफ़्त कर रहे हैं।” या ‘मुब्तला’ शब्द पर उनका जुमला है, “हम जितना सोचते हैं, उतना ही अपनी उलझनों में मुब्तला हो जाते हैं।”
लाइब्रेरी की ज़ीनत और बहुमुखी प्रतिभा: गायत्री जी की लाइब्रेरी में कृष्ण चंदर, जावेद अख्तर और निदा फ़ाज़ली से लेकर दुनिया की तमाम बड़ी बायोग्राफी मौजूद हैं। वे सिर्फ पढ़ती नहीं हैं, बल्कि किताब खत्म करने के बाद लेखक से संपर्क कर उस पर चर्चा भी करती हैं। किताबों के अलावा वे स्वेटर बुनना, कैलीग्राफी, मोतियों की माला बनाना और सिंथेसाइज़र बजाना भी सीख चुकी हैं। उनके आईपैड में 60 हज़ार से ज़्यादा तस्वीरों का संग्रह है। कैंसर से जंग और सकारात्मक सोच: 2021 में कैंसर का पता चलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। वे मानती हैं कि किताबें इंसान को जहालत के अंधेरे से रोशनी की तरफ ले जाती हैं। गायत्री सिंघानिया उन सभी लोगों के लिए एक बड़ी प्रेरणा हैं जो बीमारी या उम्र की वजह से ज़िंदगी से मायूस हो चुके हैं। फ़िलिस्तीन: ध्वंस से उपजी कला का आख़्यान https://indorestudio.com/palestine-art-from-debris-pankaj-nigam/

