Wednesday, May 20, 2026
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‘ग़ालिब इन न्यू डेल्ही’ का 550 वाँ शो, नये शिखर पर डॉ.आलम

शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘ग़ालिब इन न्यू डेल्ही’ का 550 वाँ शो!..क्या कहा..अविश्वसनीय? मगर यह सच है। 19 मार्च 2023 को, गुड़गांव के सेक्टर 44 में मौजूद एपिसेंटर में इस बहुप्रशंसित नाटक का शो 50 वाँ शो हुआ। डॉ.सईद आलम लिखित-निर्देशित इस कॉमेडी नाटक की 25 साल पहले शुरूआत हुई थी। तब से अब तक यह शो जारी है। इसके देश ही नहीं विदेशो में भी शो हुए हैं। श्रीराम सेंटर में हुआ था पहला शो: इस नाटक की यात्रा के बारे में पूछने पर डॉ.सईद आलम ने कहा – ‘इस कॉमेडी नाटक का पहला शो, दिल्ली के श्रीराम सेंटर के बेसमेंट में हुआ था। यह 1997 की बात है। यानी अब इस नाटक को 25 साल हो गये हैं। इतने ही साल हमारे ग्रुप ‘पिय्रोट्स ट्रूप’ को भी। दिलचस्प बात ये भी है कि इस नाटक में मिर्ज़ा ग़ालिब की मुख्य भूमिका अब तक, चार अभिनेता निभा चुके हैं। सबसे पहले दिगम्बर प्रसाद जी ने यह किरदार निभाया। उसके बाद आये विष्णु शर्मा। उनके बाद जय बंसल और सबसे आख़िर में यह रोल मेरे नसीब में आ गया’।400 बार बन चुका हूँ ग़ालिब: डॉ. आलम ने कहा – ‘मैं इस नाटक में 2008 से अब तक करीब 400 बार ग़ालिब बन चुका हूँ’। उन्होंने बताया, इस नाटक के दुबई में सबसे ज़्यादा शोज़ हुए, इसके साथ ही कुवैत और पाकिस्तान में भी मंचन हुए। अपने देश में, नार्थ-ईस्ट को छोड़कर, बहुत से राज्यों में यह शो हुआ। उन्होंने कहा, ‘गुड़गाँव के शो में हमारे सहयोगी कलाकारों में निकहत सिराज, यश मल्होत्रा, प्रिंस कुमार, रोहित सोनी, बंटी शर्मा, सुरभि कनौजिया, शरीक अजीज़ शामिल होंगे। इनमें भी ऐसे कुछ कलाकार हैं जो काफी समय से इसमें काम करते रहे हैं’।ग़ालिब जम्प कट लगाकर पहुंचे दिल्ली: डॉ.आलम ने बताया- ‘यह नाटक यक़ीनन उन्हीं आगरा और दिल्ली वाले मिर्ज़ा ग़ालिब का ही है जिनका पूरा नाम था – असदुल्लाह बेग ख़ान ग़ालिब। वो शायर जो उर्दू और फ़ारसी में दक्ष थे जिनकी कालजयी रचनाओं में से आज भी बहुत सी ग़ज़लें मकबूल हैं। मगर हमारे नाटक की कहानी में, ये शायर साहब, 19 वीं सदी से ‘जम्प कट’ लगाकर सीधे 21 वीं सदी में आ जाते हैं। एक बार फिर अपनी उसी राजधानी दिल्ली में, जिससे उनका गहरा रिश्ता रहा। ज़ाहिर है कि इस नाटक के लिये कॉमेडी का पूरा प्लॉट तैयार हैं। मगर अच्छा हास्य वही है कि जब आप हँसते हैं, तब आपको उस हक़ीक़त और दर्द का भी एहसास होता है, जिसके लिये आपको उस सिचुएशन में हँसी आ गई है। हँसने के अगले ही पल आपको हालत की विंडबना अहसास होता है। दिल्ली में पुराने ग़ालिब का नया सफ़र: नाटक में बुज़ुर्गवार मिर्ज़ा ग़ालिब,आईएसबीटी के बस अड्डे से लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक स्टूडेंट के साथ अपने रहने का ठिकाना ढूंढने का सफ़र तय करते हैं। इस सफ़र में उन्हें उर्दू की शीरीं ज़ुबां से जुदा,नई दिल्ली के ऐसे शहरी मिलते हैं, जिन्हें ना तो ग़ालिब से कोई लेना-देना है, ना ही उस उर्दू जुबाँ से जिसके लिये ये महान् शायर मशहूर रहे हैं। ज़ाहिर है कि ऐसे लोगों के माध्यम से, ग़ालिब की, आज की ज़िदंगी, मानसिकता और तहज़ीब से मुठभेड़ होती है।गाँधी बाबा कौन, ये कोई शायर हैं?: मिसाल के लिये पान बेचने वाली एक बुज़ुर्ग महिला उन्हें नोट देते हुए कहती है, लो गाँधी बाबा!..तब गालिब नोट को बड़ी हैरानी से अलट-पलट के देखते हैं और पूछते हैं, ये गाँधी बाबा कौन हैं, क्या ये कोई शायर हैं ? वही महिला बार-बार फ़िल्मी गीत -’ मैं 16 बरस की’ गाती है।.. रास्ते में एक रिश्वतखोर पुलिस वाला, एंट्री का परमिट देने के लिये, जेब गरम करने की माँग करता है। ..इसी तरह पटना का एक स्टूडेंट शेक्सपियर को सेक्सपियर उच्चारित करता है। इन सारी परिस्थतियों और लोगों के व्यवहार से ग़ालिब बेहद परेशान हो जाते हैं। वे दिल्ली में अलग-अलग राज्यों से आकर बसे लोगों की ज़ुबान, सोच और सुलूक की तुलना, अपने पुराने दौर से करते हैं। बहुतों को सीख देने की कोशिश करते हैं, मगर हालात के बीच वे ख़ुद ही एक मज़ाक बनकर रह जाते हैं।ज़िदंगी में शर्मीले, मंच पर कमाल: डॉ.सईद से आम तौर पर अपनी ज़िदंगी में बेहद सभ्रांत और शर्मीले हैं। मगर इसके ठीक विपरीत, मंच के वे बेहद ज़हीन, बोल्ड और सजग एक्टर हैं। ‘ग़ालिब इन न्यू डेल्ही’ ही नहीं, डॉ.सईद ने मंच पर अभी तक जितने भी किरदार निभाये हैं, दर्शकों के दिलो-दिमाग पर उनकी एक अमिट छाप छोड़ी है। वे हिन्दुस्तान में उर्दू रंगमंच के उन चंद हुनरमंद अभिनेताओं में से एक हैं, जिनके हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान से बाहर, अपने दर्शक हैं। ऐसे चाहने वाले, जो उनके शो की ख़बर मिलते ही, नाटक देखने चले आते हैं। शो के बाद उनके अभिनय से ख़ुश हुये दर्शक अ्क्सर उन्हें घेर लेते हैं। वे डॉ.सईद का कोई दूसरा शो याद करते हैं, या फिर देखे गये शो को एक बार फिर देखने की ख़्वाहिश करने लगते हैं या फिर उन्हें अपने घर बुलाकर उनकी मेहमानवाज़ी करना चाहते हैं। इस मक़सद से कि वे उनके पास कुछ पल बैठकर, उनके बारे में और भी ज़्यादा जान सकें।डॉ.आलम एक बड़ी स्कॉलर हस्ती: एक बात और मैं यहाँ जोड़ दूँ। डॉ.आलम हिन्दुस्तान में रंगमंच के सबसे विद्वान अभिनेताओं में से एक हैं। उनका जीवन वृत, इंटरनेशनल पॉलिटिक्स पर डॉक्टरेट की उपाधि पाने से लेकर, प्रोफ़ेसर बनने, पत्रकारिता, टीवी और फ़िल्म के कार्यक्रमों से लेकर, रंगमंच तक फैला है। 1996 से वे ‘प्रोफेशनल थियेटर’ की दुनिया में हैं। उन्होंने 40 से अधिक नाटक लिखे हैं जिनके 2 हज़ार से ज़्यादा शोज़ हो चुके हैं। वे एक ऐसी कलाकार हैं, जिनका साल भर के शोज़ का बिज़ी कैलेन्डर होता है। कोई ऐसा हफ़्ता नहीं गुज़रता, जिसमें उनके शोज़ कहीं न कहीं न चल रहे हों। वे एक ऐसे प्रोफेशनल ग्रुप के कलाकार भी हैं, जिनके टिकिट्स दर्शक अग्रिम रूप से ख़रीदकर देखना पसंद करते हैं। उनके ‘पिय्रोट्स ट्रूप’ के टिकिट्स ‘बुक माई शो’ पर उपलब्ध होते हैं।कई बेहतरीन नाटकों के फ़नकार: लेखक, निर्देशक और अभिनेता के रूप में मंच पर उनकी कई प्रमुख कृतियां हैं, कुछ नाम आप यहाँ पर देखिये – नई दिल्ली में गालिब (कॉमेडी), मौलाना आजाद, के एल सहगल (संगीत), गालिब, कट…कट…कट (कॉमेडी), बिग बी (कॉमेडी) गालिब के ख़त, लाल क़िले का आख़िरी मुशायरा, सर इक़बाल, शाहजहाँ-ओ-मुमताज़, सन्स ऑफ़ बाबर, तुमको चाहून, प्रदूषण हाज़िर हो (कॉमेडी), मॉडर्न आर्ट, राजा नाहर सिंह, पाकिस्तान और अल्ज़ाइमर, ताज की कहानी, बेग़म अख़्तर (म्युज़िकल), कल तुम्हारी बारी है, “1857”, चाचा चचकन इन एक्शन (कॉमेडी), “टू गांधी जी विथ स्पेलिंग मिस्टेक्स”(कॉमेडी), मौलाना आज़ाद की क़लम से, मोहन से महात्मा, दाग़ देहलवी, द टेल ऑफ़ क्वार्ल्स, अकबर द ग्रेट नहीं रहे (कॉमेडी), फ़ैमिली+ एडमिशन प्लानिंग (कॉमेडी), ग़ालिब और कलकत्ता मुशायरा।दुनिया के कई देशों में हुए शोज़: डॉ. सईद आलम ‘हिस्ट्रियोनिक्स’ यानी इतिहास के साथ आज के संदर्भ के हास्य के लिये जाने जाते हैं। मंच पर इस तरह के प्रहसन और व्यंग्य के वे अपने क़िस्म के दिग्गज फ़नकार हैं। आपने उनके जिन नाटकों के नाम ऊपर पढ़े हैं, उन सभी के कई देशों में मंचन हो चुके हैं। वे बताते हैं –‘हमारे तमाम शोज़, यूके, यूएसए, कनाडा, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब सहित, ओमान और पाकिस्तान जैसे मुल्कों में हो चुके हैं’। इतना ही नहीं, डॉ.सईद आलम ने बहुत से टीवी धारावाहिकों, वृत्तचित्रों और फ़िल्मों का लेखन और निर्देशन भी किया है। इसमें शक नहीं कि डॉ.आलम ने भारतीय रंगमंच की कला को दुनिया तक पहुंचाने और उर्दू रंगमंच को एक नई बुलंदी पर ले जाने का बेमिसाल काम किया है। उन्होंने अपनी ज़िदंगी को पूरी तरह से रंगमंच के प्रति समर्पित कर दिया है। 550 की संख्या तक पहुँचा उनका शो ‘ग़ालिब इन न्यू डेल्ही’ भी उनके इसी समर्पण की तस्दीक कर रहा है। आगे पढ़िये –
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