शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो।
घर की छत पर थियेटर! क्या देखा ऐसा नाट्य गृह? इसे किसने बनाया ? इसका निर्माता-निर्देशक कौन है? पढ़िये चेतना थियेटर के बारे में यह रिपोर्ट।… हाल ही में चेतना सांस्कृतिक एवं जन कल्याण समिति का चार दिवसीय नाट्य समारोह संपन्न हुआ। समारोह ने एक बार दर्शकों का ध्यान चेतना के अपने टेरस थिटेयर की तरफ़ खींचा। नीलबड़ के हरि नगर में अपने घर की छत पर यह थियेटर चेतना संस्था के प्रमुख आशीष श्रीवास्तव ने बनाया है। वे वरिष्ठ रंगकर्मी, लेखक और निर्देशक हैं। हमने उनसे इसी खुले मंच के बारे में जानने की कोशिश की। उन्होंने कहा, ‘नाटकों को दर्शकों तक ले जाने की कोशिश का नाम है, चेतना टेरस थियेटर। पढ़िये उनसे बातचीत पर आधारित यह रिपोर्ट।
आशीष ने बातचीत की शुरूआत में कहा, ‘मेरा मानना है कि दर्शकों को नाटक तक लाने की जगह हमें नाटक को दर्शकों तक ले जाने की ज़रूरत है। जब हम ऐसा करेंगे तब हम दर्शकों से और भी ज़्यादा जुड़ सकेंगे। मैंने यहाँ पर ऐसे बहुत से दर्शक देखे हैं जिन्होंने 70 साल की उम्र तक कभी कोई नाटक नहीं देखा। परंतु चेतना टेरस थियेटर पर हमारे काम करने का नतीजा है कि अब हरि नगर के करीब दो सौ दर्शक हमसे जुड़ चुके हैं। वे हमारे नाटकों इंतज़ार करते हैं। इनमें कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने पहली बार यहीं पर आकर नाटकों को देखना शुरू किया है’।
6 साल पहले टेरस थियेटर का शुरू हुआ काम: आशीष श्रीवास्तव बताते हैं, ‘करीब छह साल पहले मैंने अपने घर की छत पर टेरस थियेटर की कल्पना की थी। हरि नगर में मेरा घर 30X50 के प्लॉट (1500 वर्ग मीटर) पर बना है। यह बहुत बड़ा नहीं है लेकिन अपने इसी मकान की छत पर मैंने अपना छोटा सा मुक्ताकाशी मंच बनाना शुरु किया। पहली बार 2016 में टेरस के इस थियेटर में नाटकों के प्रदर्शन शुरू हुआ। टेरस थियेटर पर मंच बनाने के लिये मैंने बैकग्राउंड में ब्लैक कर्टेन का उपयोग किया। साइड में विंग्स तैयार कर लगा दिये। लाइट्स को बांसों पर लटकाया दिया गया। कूलर के रेग्यूलेटर्स का इस्तेमाल करके लाइट्स का कंट्रोल पैनल बना। इस तरह बुनियादी जरूरतों को पूरा करता मंच तैयार हो गया। मुक्ताकाश में हमने करीब 200 दर्शकों की क्षमता के लिये दो तरह की बैठक व्यवस्था की है। यहां एक तरफ दर्शक जहाँ बिछात पर भारतीय पद्धति में बैठकर नाटक का आनंद ले सकते हैं, वहीं करीब 80 कुर्सियों पर बैठकर भी दर्शक नाटक देख सकते हैं।
बच्चों के साथ रंगकर्म के सार्थक परिणाम: आशीष श्रीवास्तव हरिनगर में स्थानीय बच्चों को बीते 5-6 सालों से रंगकर्म का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। वे बताते हैं, यहाँ के बच्चों के साथ काम करने की वजह से अब 30 के करीब बाल कलाकार भी तैयार हो गये हैं। अब वे हमारे काम का हिस्सा बन गये हैं। वे न सिर्फ नाटकों में परफॉर्म करते हैं, बल्कि नाटकों के प्रदर्शन के दौरान नेपथ्य में रहकर एक सहयोगी कलाकार की सजग भूमिका भी निभाते हैं। ये बाल कलाकार ही कॉलोनी के घरों में जाकर हमारे आयोजनों की सूचना देते हैं। 6 साल की उम्र से लेकर 18 साल तक के बच्चे हमारे साथ हैं। नाटकों में काम करते हुये उनके व्यक्तित्व में भी बड़ा बदलाव आया है। नया मनोबल और आत्मविश्वास जागा है’।
प्रेक्षागृह की कमी का तोड़, चेतन टेरस थियेटर: भोपाल में करीब 30-35 रंगमंडलियां हैं। लगभग हर दिन किसी न किसी नाटक मंडली का नाटक शहर में होता है। सीमित संसाधनों से नाटक तैयार करने वाली संस्थाओं के लिए भारत भवन और रवींद्र भवन जैसे ऑडिटोरियम पहुंच से बाहर होते हैं। ले-देकर शहीद भवन प्रेक्षागृह ही बचता है जो सारे नाटकों की प्रस्तुति का भार उठाता है। चुनांचे शहीद भवन प्राय: बुक रहता है। लम्बी वेटिंग रहती है। तैयार नाटकों के प्रदर्शन के लिए संस्थाओं को महीनों इंतजार करना पड़ता है। इस समस्या का तोड़ चेतना टेरेस थियेटर के रूप में निकाला है। यह बेहद सराहनीय बात है। आशीष का यह प्रयास दूसरी मंडलियों को भी आज प्रेरित कर रहा है।
अब तक नाटकों के सात बड़े आयोजन: आशीष के अनुसार, वे बीते पांच वर्षों में वे अपने टेरस थियेटर में 7 बड़े आयोजन कर चुके हैं। इस बार हुये आयोजन में तीन फुल लेंथ नाटक क्रमश: “शादी का प्रस्ताव” (निर्देशक-राजीव अयाची), “हसीना मान जाएगी” (निर्देशक-संजय मेहता), “बेटर हाफ” (निर्देशक-आशीष श्रीवास्तव) और अंतिम दिन लघुनाटक “बड़ी बहनजी” के साथ ही “मेरी मातृभूमि” (निर्देशक-अशोक बुलानी) और नृत्य नाटिका “शिव शक्ति” (निर्देशक-मनीषा हुरैया) का मंचन भी हुआ। यह समारोह संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से आयोजित किया गया। (इनपुट: सुनील सक्सेना, भोपाल।)
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घर की छत पर थियेटर! क्या देखा ऐसा नाट्य गृह? इसे किसने बनाया?
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