Wednesday, April 15, 2026
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गुरु-शिष्य परंपरा योजना के नए नियमों से कला जगत में खलबली

शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। गुरु-शिष्य परंपरा योजना के नए नियमों से कला जगत में खलबली मच गई है।  देश की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने वाली नाट्य और कला संस्थाएं इन दिनों एक अभूतपूर्व संकट से जूझ रही हैं। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा ‘गुरु-शिष्य परंपरा (रेपर्टरी अनुदान)‘ योजना के नियमों में किए गए हालिया संशोधनों ने देश भर के कलाकारों के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है। फिलहाल, कला संस्थाएं प्रधानमंत्री से इस संवेदनशील मामले में त्वरित हस्तक्षेप की उम्मीद कर रही हैं। वहीं संस्कृति मंत्रालय के सामने भी संशोधनों पर विचार के लिये आग्रह जारी है। संस्थाओं द्वारा ज्ञापन भेजे जा रहे हैं। इस बीच अनुकृति रंगमंडल, कानपुर के संस्थापक सचिव डॉ. ओमेन्द्र कुमार ने कहा- उनकी इस विषय में संस्कार भारती, नई दिल्ली के संगठन मंत्री अभिजीत गोखले से बात हुई है। उन्होंने आश्वस्त करते हुए कहा है कि ‘कलाकार चिंता न करें, इस समस्या का सम्मानजनक हल निकाला जायेगा’। Report on the recent amendments made by the Ministry of Culture, Government of India, to the rules of the 'Guru-Shishya Parampara (Repertory Grant)' scheme. Representative Image. Natsamrat.यह विवाद किस वजह से सामने आया? – यह विवाद 23 मार्च 2026 को जारी, मूल्यांकन समिति के कार्य वृत्त (Minutes) के बाद से गहरा गया है। इसमें नए नियमों को ‘पूर्व व्यापी प्रभाव’ (Retrospective Effect) से लागू किया जा रहा है। इससे प्रभावित संस्थाएं बेहद चिंतित हैं। मंत्रालय को इस विषय में विचार के लिये ज्ञापन भेजे जा रहे हैं, बैठकें जारी हैं। विरोध प्रदर्शन भी हो रहा है। आइये समझते हैं, वो कौन से नये नियम हैं, जिन्हें लागू किये जाने के बाद देश की कला संस्थाओं में रोष है। Report on the recent amendments made by the Ministry of Culture, Government of India, to the rules of the 'Guru-Shishya Parampara (Repertory Grant)' scheme. Representative Image.मुख्य रूप से तीन बातों पर चिंता: मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक दस्तावेजों के विश्लेषण से तीन प्रमुख समस्याएं उभर कर सामने आई हैं। इन तीन संशोधित नियमों पर कला संस्थाएं चिंतित हैं। इसके अनुसार –
(1) पूर्व व्यापी नियम:
23 मार्च 2026 को जारी नियम उन गतिविधियों पर लागू किए जा रहे हैं जो संस्थाएं 2024-25 और 2025-26 में पहले ही कर चुकी हैं। कला संस्थाओं या रंगमंडल प्रमुखों का तर्क है कि कार्य पूर्ण होने के बाद माप दंड बदलना प्रशासनिक विसंगति है। ‘विवेचना’ जबलपुर के हिमांशु राय ने कहा, यह संशोधित व्यवस्था ठीक नहीं है।
(2)
‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ की मार: नए प्रावधानों के अनुसार, जिन संस्थाओं ने लगातार 5 साल तक अनुदान प्राप्त किया है, उन्हें अब 2 साल का ‘अनिवार्य ब्रेक’ लेना होगा। यह उन पेशेवर समूहों के लिए अस्तित्व का संकट है जो पूरी तरह इसी सहायता से कलाकारों का मान देय और प्रशिक्षण का खर्च वहन करते हैं। उन्होंने कहा, दो वर्ष की ग्रांट रोक दिए जाने के संशोधन ने यह समस्या जटिल बना दी है। संकट उनके लिये भी है जिन्होंने अपना काम जारी रखा है। कार्यक्रमों के लिये खर्च किया है। उसका ब्यौरा भी प्रस्तुत किया है। 
(3) तकनीकी अस्वीकृति:
कुछ स्थापित संस्थाओं का कहना है कि ‘भारत रंग महोत्सव’ जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर सक्रिय भागीदारी के बावजूद उनके आवेदनों को वीडियो साक्ष्य या मामूली तकनीकी कारणों से ‘नॉट रिकमेंडेड’ श्रेणी में डाल दिया गया है। यह भी ठीक नहीं है। इस पर भी संवेदनशीलता से ध्यान दिया जाना चाहिये।Report on the recent amendments made by the Ministry of Culture, Government of India, to the rules of the 'Guru-Shishya Parampara (Repertory Grant)' scheme. Representative Image.(4) ‘एक्सेल शीट’ हटाने और भुगतान प्रक्रिया पर सवाल: ‘अभिनव रंगमंडल’, उज्जैन के प्रमुख शरद शर्मा ने एक और विसंगति की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने कहा, नई प्रक्रिया ने संस्थाओं के सामने एक और तकनीकी और व्यावहारिक संकट खड़ा कर दिया है। पहले मंत्रालय भुगतान के लिए संस्थाओं से ‘एक्सेल शीट’ मांगता था, जिससे यह स्पष्ट रहता था कि किस कलाकार को कितने महीने का (6, 8 या 12 महीने) मान देय दिया जाना है। अब बिना एक्सेल शीट के कलाकारों को सीधे भुगतान किए जाने से संस्थाओं के पास यह निश्चित करने का अधिकार नहीं बचा है कि किस कलाकार को उसकी कार्य अवधि के अनुसार भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
कलाकारों के बीच असमानता: शरद शर्मा ने कहा, अधिकांश संस्थाओं को केवल 3 या 4 कलाकारों का अनुदान मिलता है, जबकि एक नाटक की प्रस्तुति में कम से कम 10-12 कलाकारों की आवश्यकता होती है। अब तक संस्थाएं मिले हुए अनुदान को सभी कलाकारों में न्यायोचित तरीके से विभाजित कर देती थीं ताकि पूरी टीम का निर्वाह हो सके। मंत्रालय के वर्तमान निर्णय से यह व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी, जिससे उन कलाकारों के सामने संकट खड़ा हो जाएगा जिनका नाम अनुदान सूची में नहीं है लेकिन वे प्रस्तुतियों का अभिन्न हिस्सा हैं।Report on the recent amendments made by the Ministry of Culture, Government of India, to the rules of the 'Guru-Shishya Parampara (Repertory Grant)' scheme. Representative Image.सांस्कृतिक केंद्रों से उठने लगे एकजुटता के स्वर: इस प्रशासनिक फेरबदल के खिलाफ देश के विभिन्न सांस्कृतिक केंद्रों से एकजुटता के स्वर उठने लगे हैं। कोलकाता से लेकर दिल्ली और मुंबई तक, वरिष्ठ रंगकर्मियों, संगीतकारों और नर्तकों ने शांतिपूर्ण सभाओं के माध्यम से अपनी बात सरकार तक पहुँचाने का प्रयास किया है। कलाकारों का कहना है कि यह केवल आर्थिक सहायता का विषय नहीं, बल्कि सदियों पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा की निरंतरता का प्रश्न है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश के कलाकारों ने भी इस विषय में अपने-अपने स्तर पर चिंता ज़ाहिर की है।Report on the recent amendments made by the Ministry of Culture, Government of India, to the rules of the 'Guru-Shishya Parampara (Repertory Grant)' scheme. Representative Image.हाल ही में हुई नागरिक सभाओं में पद्म पुरस्कारों और संगीत नाटक अकादमी से सम्मानित गुरुओं ने भी चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार, यदि दो साल का ‘कूलिंग-ऑफ’ लागू हुआ, तो प्रशिक्षित शिष्यों का पलायन दूसरे क्षेत्रों में हो जाएगा, जिससे कला की गुणवत्ता और परंपरा का संरक्षण असंभव होगा। कलाकारों ने मंत्रालय से संवाद की अपील की है ताकि कला की गरिमा बनी रहे।Report on the recent amendments made by the Ministry of Culture, Government of India, to the rules of the 'Guru-Shishya Parampara (Repertory Grant)' scheme. Representative Image.कैसे निकलेगा समाधान का रास्ता? – स्थिति की गंभीरता और बढ़ती चिंता को देखते हुए, विशेषज्ञों और कला प्रतिनिधियों ने सरकार के सामने समझौते के लिए कुछ व्यवहारिक सुझाव रखे हैं। आइये इन पर भी नज़र डालते हैं। यह एक तरह से सरकार और कला संस्थाओं के बीच स्थिति को संभालने के लिये, बीच का रास्ता है।
चरणबद्ध कार्यान्वयन: नए कड़े नियमों को भविष्य की तारीख (जैसे वित्त वर्ष 2026-27) से लागू किया जाए, ताकि संस्थाएं मानसिक और आर्थिक रूप से तैयार हो सकें।
ग्रेस पीरियड और आंशिक कटौती: 5 साल पूरे कर चुकी संस्थाओं को अचानक बंद करने के बजाय, उनके अनुदान में चरणबद्ध कटौती की जाए ताकि वे धीरे-धीरे आत्मनिर्भर बन सकें।
पारदर्शी पुनर्मूल्यांकन: जिन संस्थाओं के आवेदन तकनीकी आधार पर खारिज हुए हैं, उन्हें एक बार स्पष्टीकरण या ‘अपील’ का अवसर भी दिया जाना चाहिए।Report on the recent amendments made by the Ministry of Culture, Government of India, to the rules of the 'Guru-Shishya Parampara (Repertory Grant)' scheme. Representative Image. समन्वय समिति का गठन: मंत्रालय और कला संगठनों के बीच एक स्थायी समन्वय समिति का बनाया जाना भी ज़रूरी लगता है। ताकि नीति निर्धारण से पहले ज़मीनी वास्तविकताओं पर चर्चा हो। वर्तमान गतिरोध को समाप्त करने के लिए सरकार और कला जगत के बीच एक सार्थक संवाद की आवश्यकता है। यदि इन संशोधनों पर पुनर्विचार किया जाता है, तो गुरु-शिष्य परंपरा को बिना किसी प्रशासनिक बाधा के और अधिक सशक्त बनाया जा सकता है। आगे पढ़िये – ‘सीता बनवास’ में पारसी थियेटर का कैसे जगमाया जादू? इस लिंक को क्लिक कीजिये। https://indorestudio.com/parsi-theatre-sita-banwas-play-review-jabalpur-rangabharana/

 

 

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