चला गया रंगमंच का प्रबंधक और दूरदर्शी योद्धा

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शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। रंगमंच के एक समर्पित प्रबंधक और दूरदर्शी रंग-योद्धा डॉ. संजय लघाटे का ग्वालियर में निधन हो गया। वे ग्वालियर के दाल बाज़ार में मौजूद मध्य भारत की आठ दशक पुरानी नाट्य संस्था आर्टिस्ट कंबाइन के सचिव थे। उनके निधन की ख़बर मिलते ही नगर के रंगकर्मियों में शोक की लहर दौड़ गई। रंगकर्मी और निर्देशक आकाश दीक्षित के निधन के बाद ग्वालियर रंगमंच की यह एक और बड़ी क्षति है। कैंसर से पीड़ित डॉ. लघाटे 56 वर्ष के थे, उनका बीते एक साल से इलाज चल रहा था। थियेटर मैनेजमेंट रही बड़ी ख़ूबी:  डॉ. संजय लघाटे की बड़ी खूबी उनका थियेटर मैंनेजमेंट रही। मैं यहां पर सिक्किम  एनएसडी स्कूल के केंद्र निदेशक श्री सौती चक्रवर्ती का ज़िक्र करना चाहूँगा। उन्होंने हाल ही मुझसे कहा- ‘थियेटर मैनेजमेंट अपने आप में एक ज़रूरी पहलू और गंभीर विषय है, परंतु इसके बारे में कोई बात तक नहीं करना चाहता। एक अच्छे प्रबंधक को अपने मंच के रंगकर्म को आगे बढ़ाने के साथ लगातार नई दृष्टि से काम करना पड़ता है। उसके लिये संघर्ष करना पड़ता है’। इस दृष्टि से स्व. डॉ. लघाटे भी रंगमंच के प्रबंधन से एक बड़े व्यक्तित्व थे। मैनेजमेंट गुरू थे।  कलाकर्म के साथ ही अपने इस विशिष्ट गुण के साथ वे आर्टिस्ट कंबाइन को एक नया विज़न और विस्तार देने का कोशिश कर रहे थे। उन्हें कंबाइन की गतिविधियों को नये आयाम देने के प्रयासों के लिये हमेशा याद किया जायेगा। उनका आर्टिस्ट कंबाइन से 35 सालों का नाता था। वे संस्था से 1987 से जुड़े थे। संजय जी ने बहुत से नाटकों में अभिनय के साथ कुछ का निर्देशन भी किया था। कुछ नाटकों का हिन्दी से मराठी या मराठी से हिन्दी में अनुवाद किया था। मिलता रहा आर्टिस्ट कंबाइन का समर्थन: आर्टिस्ट कंबाइन के संस्थागत चुनाव हर तीन साल होते हैं, परंतु अपने श्रमशील और दूरदर्शी व्यक्तित्व के कारण ही संजय लघाटे वर्षों से संस्था में सचिव के पद पर निर्बाध रूप से बने रहे। अपना कार्य संभालते रहे। उन्हें संस्था का समर्थन मिलता रहा। ऐसा होने की वजह यही थी कि वे प्रतिबद्ध रूप से अपना काम निरंतर कर रहे थे। डॉ. लघाटे पेशे से टीचर थे, परंतु हर शाम वे कंबाइन की रिहर्सल या गतिविधियों के प्रबंधन के लिये नियमित रूप से जाते थे। उन्होंने कंबाइन की गतिविधियों का एक ऐसा कैलेंडर तैयार कर लिया था कि कंबाइन के ऑडिटोरियम में वर्ष भर रंगकर्म की गतिविधियां चलती ही रहती थीं। आर्टिस्ट कंबाइन के नये विस्तार के रूप में इसके नाट्य प्रशिक्षण इंस्टीट्यूट (Artist combine Institute of Performing arts) की स्थापना भी उनके ही प्रयासों का नतीजा रही। प्रार्चाय के रूप में इंस्टीट्यूट का कार्यभार पिछले 7 सालों से संभाल रहे थे। साथ ही इसकी गतिविधियों को संचालित कर रहे थे। रंगकर्म की नई पौध को सींच रहे थे, इसे व्याहारिक पाठ्यक्रम का हिस्सा बना रहे थे। कमोवेश मुझे यहां विद्यार्थियों के साथ रंगकर्म पर चर्चा का अवसर मिला। उम्मीद थी जल्द स्वस्थ हो जाएंगे: कुछ दिन पहले उनसे बात हुई थी। महसूस हुआ था कि वे जल्द स्वस्थ होकर कंबाइन से जुड़ी गतिविधियों में सक्रिय हो जायेंगे। परंतु ऐसा हो न सका। वे लंबे समय से कैंसर से लड़ रहे थे। कैंसर की वजह से उनकी सोशल मीडिया से जुड़ी गतिविधियां भी काफी समय से रूक गई थी अन्यथा वे आर्टिस्ट कंबाइन की सूचनाएं लगातार दे रहे थे। आज जब यह ख़बर आर्टिस्ट कंबाइन के साथ ही उनसे जुड़े रहे वरिष्ठ लेखक और रंगकर्मी एमजी सचिन दी, मैं स्तब्ध रह गया। ग्वालियर में रंगकर्म से जुड़े होने के नाते संजय लघाटे जी से वर्षों पुराना संबंध रहा। संजय जी से लगातार बातें होती रहीं। कला गतिविधियों पर मेरी रिपोर्ट्स और मेरे नाटकों को लेकर भी वे हमेशा अपनी दिलचस्पी दिखाते रहे। ‘मोनिया दि ग्रेट’ नाटक के मंचन के बाद से वे मेरे दो और नाटकों के मंचन के बारे में विचार जताते रहे। उनसे बातचीत पर लिखता रहा लेख: आर्टिस्ट कंबाइन की गतिवधियों को लेकर मैं लिखता रहा हूँ। इस विषय में संजय जी से बातचीत या ई मेल पर सवाल-जवाबों का आदान-प्रदान भी होता रहा। मेरे उन साक्षात्कारों से रंगकर्म को लेकर उनके विचारों और उनके काम का अंदाज़ा मिलता है। वे आर्टिस्ट कंबाइन को मराठी के साथ ही हिन्दी रंगमंच से भी जोड़े रखने की समान कोशिशें करते रहे। उन्होंने बीते सालों में कई संस्थाओं को नाटक मंचित करने या कलाकारों को प्रशिक्षित करने के लिये आमंत्रित किया था। कंबाइन के अमृत महोत्सव को भी उनके ही प्रबंधन में बेहतर तरीके से किया जा सका था। मगर अब रंगमंच को प्रबंधित कर, नाट्य कर्म को आगे बढ़ाने वाला यह योद्धा चला गया है। यह सिर्फ आर्टिस्ट कंबाइन की ही नहीं बल्कि ग्वालियर रंगकर्म की भी बड़ी क्षति है। उन्हें विनम्र भावाजंलि।  आगे पढ़िये –

स्व.वाय सदाशिव भागवत की स्मृति में नाटकों का अमृत महोत्सव

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