इंदौर स्टूडियो। पत्रिका पहल के संपादक और प्रतिष्ठित कहानीकार ज्ञानरंजन का 7 जनवरी 2026 को जबलपुर में 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थे और तीन बार एंजियोप्लास्टी हो चुकी थी। उनके निधन से हिंदी साहित्य जगत में गहरा शोक व्याप्त है। 
जबलपुर में बिताया रचनात्मक जीवन: महाराष्ट्र के अकोला में 21 नवंबर 1936 को जन्मे ज्ञानरंजन ने अपना रचनात्मक जीवन जबलपुर में बिताया। वे जीएस कॉलेज में हिंदी के प्राध्यापक रहे और 1996 में सेवानिवृत्त हुए। शिक्षण के साथ-साथ उन्होंने निरंतर लेखन और संपादन से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। ज्ञानरंजन को साठोत्तरी कहानी का सशक्त हस्ताक्षर माना जाता है। उनकी कहानियों में यथार्थवाद, विद्रोह, मोहभंग और सामाजिक विसंगतियों के साथ-साथ मनुष्य के भीतर चलने वाले मौन और असहमति को गहन संवेदना के साथ प्रस्तुत किया गया। उनके कहानी संग्रहों का अनुवाद अंग्रेजी, जापानी, रूसी और पोलिश सहित कई भाषाओं में हुआ और उन्हें यूरोप के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया।
प्रतिष्ठित पुरस्कारों से हुए सम्मानित: उन्हें सोवियत लैंड पुरस्कार, साहित्य भूषण सम्मान, मध्यप्रदेश सरकार का शिखर सम्मान, भारतीय ज्ञानपीठ का गरिमा सम्मान सहित अनेक पुरस्कार मिले। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय ने उन्हें डी-लिट की उपाधि प्रदान की। ज्ञानरंजन ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वे किसी विचारधारा से नहीं जुड़े और पहल में सभी धाराओं के साहित्यकारों को स्थान दिया। उनकी तटस्थता के कारण पहल पत्रिका आपातकाल के दौर में भी प्रकाशित होती रही। वे हरिशंकर परसाई के परम मित्र थे और उनकी मित्रता लगभग 50 वर्षों तक रही।

