इंदौर स्टूडियो डॉट कॉम। छत्तीसगढ़ फिल्म एंड विजुअल आर्ट सोसायटी द्वारा 14 दिसंबर से 18 दिसंबर तक आयोजित की जा रही हबीब तनवीर नाट्य स्पर्धा में छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य नाचा गम्मत शैली में अलकरहा समय की प्रस्तुति परमेश्वर बर्रा के निर्देशन में जनमंच में की गई। अलकरहा समय के जरिए इस प्रस्तुति में किसान की समस्या, उसकी आत्महत्या के कारण और उसके शोषण को दिखाया गया। गांव के दाऊ द्वारा कर्ज में फंसे गरीब किसान की पत्नी से जोरजबरदस्ती और चालाक मुनीम द्वारा परलोक की चिंता में फंसे किसान की मदद के लिए कर्ज से दो माह की मोहलत दिलाना और बाद में किसान को कर्ज से मुक्ति दिलाकर, पलायन और आत्महत्या से रोकने की कथा है अकलहरा समय।
दर्शकों को कराया सच्चाई से रूबरू : गंवईहा लोक नाट्य संस्था मोदही जिला राजनांदगांव की इस प्रस्तुति में दर्शकों ने छत्तीसगढ़ के लोक नाटक जिसमें कि इंप्रोवाइजेशन के माध्यम से लोक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति से दर्शकों को उन सच्चाईयों से रूबरू कराया जिसे सामान्यत: हम देखते हैं, और जब उसे देखते हैं तो खिसियानी हंसी नहीं हंसने को मजबूर होते हैं।
अलकरहा समय के मंच पर जोक्कड़ के रुप में 1-रोशन लाल विश्वकर्मा, जोक्कड़ 2-परमेश्वर बर्रा, जनाना परी- धर्मेंद, गिरधारी-रोशन लाल विश्वकर्मा, शांति-कामिनी मंडावी, दाऊ- लिकेश्वर साहू, चैतू-परमेश्वर बर्रा है। वहीं संगीत पक्ष में गायन-डाकेश्वर रजक, बेन्जो-जितेन्द्र साहू, तबला- रुपेन्द्र साहू, नाल- धर्मेंद्र साहू,घूंघरू- कोमल साहू ने सहज अभिनय किया जिसे दर्शकों ने खूब सराहा।
नाचा का आधार भी संगीत नृत्य : पद्मभूषण हबीब तनवीर द्वारा लोक नाट्य की शैली को आधुनिक नाट्य शैली के साथ जोड़कर पूरी दुनिया में छत्तीसगढ़ का जो परचम फहराया गया वह आज अलकरहा समय के माध्यम से देखने को मिला। ग्रामीण परिवेश में जीवन-यापन कर रहे लोगों के लिए नाचा एकमात्र मनोरंजन का साधन रहा है। नाचा में लोक हंसता है और रोता है, अठखेलियां करता है। नाचा में गीत-संगीत अनूठे संवाद और नृत्य का संयोजन देखने को मिली है। नाचा की उत्पत्ति पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि अन्य लोकनाट्यों की ही तरह नाचा का आधार भी संगीत नृत्य ही है। संगीत और नृत्य के साथ, संवाद के प्रयोग से नाचा का जन्म हुआ।
नाचा छत्तीसगढ़ अंचल की सशक्त नाट्य विधा : ग्रामीण परिवेश में जीवन यापन कर रहे बुजुर्ग और लोकनाट्य के कलाकार मानते हैं कि नाचा का प्रारंभ खड़े साज से हुआ है। नाचा की शुरुआत कमर में तबला बांधे और हाथ में चिकारा लिए खड़े साज के साजिन्दों से हुई होगी। लोकनाट्य के कलाकार समसामयिक घटनाओं को आधार बनाकर नाचा की प्रस्तुति करते हैं। नाचा में अधिक पात्रों की आवश्यकता नहीं होती। यह लोकनाट्य रात-रात भर चलने वाली छत्तीसगढ़ अंचल की सशक्त नाट्य विधा है। दो विदूषकों की हास्य प्रधान बातचीत से शुरू हुई लोकनाट्य नाचा की प्रस्तुति करते हैं। अलकरहा समय की प्रस्तुति में यह सारे तत्व देखने को मिले।
12 टीमें ले रही भाग : छत्तीसगढ़ फिल्म एंड विजुअल आर्ट सोसायटी द्वारा आयोजित हबीब तनवीर नाट्य स्पर्धा की जानकारी देते हुए सोसायटी के अध्यक्ष सुभाष मिश्र ने बताया कि इस पांच दिवसीय नाट्य स्पर्धा में छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश की 12 टीमें भाग ले रही हैं। जिसमें अव्यवसायिक नाट्य समूह से 6, महाविद्यालयों से 5 टीमें शामिल हैं। समिति की ओर से स्पर्धा में शामिल पुस्कृत होने वाली टीमें के लिए अलग-अलग पुरस्कार रखे गए हैं। नाट्य स्पर्धा के निर्णायक मंडल में संतोष जैन, योग मिश्रा, अख्तर अली, अजीज कदीर एवं श्रीमती रचना मिश्रा हैं।
कल की प्रस्तुतियां : इसी तरह जनमंच में 15 दिसम्बर रविवार को दोपहर 2 बजे से डॉ. राधाबाई शासकीय नवीन कन्या महाविद्यालय की छात्राओं द्वारा विष्णु प्रभाकर की रचना पर आधारित सांप और सीढ़ी नाटक का मंचन किया गया। इसका निर्देशन डॉ. गौरी अग्रवाल ने किया है। दोपहर 3.30 बजे धमतरी पीजी कॉलेज द्वारा अंत हाजिर हो निर्देशक आशीष साहू की प्रस्तुति की तथा शाम 5 बजे महाविद्यालयीन स्पर्धा के अंतर्गत आईआईटी भिलाई की टीम जंग नाटक की प्रस्तुति। शाम 6.30 बजे से शौकिया नाट्य समूह स्पर्धा में शमिल रंग दक्ष सांस्कृतिक मंच रायपुर द्वारा शाम को भटकते सिपाही का मंचन किशोर वैभव अजय के निर्देशन में किया गया।

