भारतीय रंगमंच के इतिहास-पुरुष हबीब तनवीर केवल एक महान निर्देशक या नाटककार नहीं थे, बल्कि वे एक संपूर्ण रंग-संस्कृति थे। उनके साथ काम करना, उनके सान्निध्य में सीखना और जीवन के उतार–चढ़ाव के बीच उनके रंग-दर्शन को आत्मसात करना—यह किसी भी रंगकर्मी के लिए सौभाग्य की बात रही है। इस आलेख में अभिनेता–निर्देशक आलोक शुक्ला ने अपनी रंगयात्रा के साथ इसी सार को प्रस्तुत किया है। उनकी इन शब्द स्मृतियों के साथ उनके कुछ प्रमुख नाटकों की तस्वीरें भी हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। – संपादक, इंदौर स्टूडियो।
रीवा से रंगकर्म की शुरुआत: मेरा रंगकर्म 1986 में रीवा से शुरू हुआ। तब मैं छात्र था और जीवन की दिशा तलाश रहा था। सैयद अहमद ज़ैदी के निर्देशन में नाटक ‘आह’ में एक छोटी-सी भूमिका ने मुझे पहली बार मंच का स्वाद दिया। यही वह क्षण था, जिसने मुझे भीतर से बदल दिया।
समर्पित रंगकर्मियों के साथ लगातार काम: 1986 से 1992 तक रीवा में मैंने मोहम्मद अनवर सिद्दीक़ी, अनवर देशमुख, योगेश त्रिपाठी, राजकिशोर दुबे और राजेंद्र सक्सेना जैसे समर्पित रंगकर्मियों के साथ लगातार काम किया। ‘समरथ को नहीं दोष गुसाईं’, ‘होरी’, ‘पागलख़ाना’, ‘जुलूस’, ‘एक था गधा’ जैसे नाटकों से मेरी पहचान बनी। लेकिन इसी दौरान मेरे भीतर यह बेचैनी भी बढ़ती गई कि कहीं मेरी यह रंगयात्रा सीमित दायरे में सिमट कर न रह जाए।
हबीब तनवीर से पहली मुलाक़ात: अगस्त 1992 में अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा में हबीब तनवीर द्वारा संचालित लंबी रंग कार्यशाला मेरे जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुई। यह मेरी पहली विधिवत थिएटर ट्रेनिंग थी। हबीब साहब की संवाद शैली, उनकी आवाज़ का उतार–चढ़ाव, ‘चुनांचे’ और ‘गोया कि’ जैसे शब्दों के साथ उनका कथन—सब कुछ मुझे सम्मोहित करता था। वे हमें पढ़ाते नहीं थे, बल्कि देखना, महसूस करना और करना सिखाते थे। उनके साथ रहकर यह समझ आया कि रंगमंच केवल संवाद बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को देखने की एक नई दृष्टि है।
गुरु की दृष्टि और रंग-अनुशासन: रिहर्सल के दौरान हबीब तनवीर का ऑब्ज़र्वेशन असाधारण था। कौन कब आया, कहाँ बैठा, किससे क्या चूका—सब उनकी निगाह में रहता था। मंच पर कलाकार की सही एंट्री–एग्ज़िट, हर संवाद का भाव और गीत–संगीत की नाटकीय ज़रूरत को लेकर वे बेहद सख़्त थे। उनका साफ़ मत था कि गीत कभी ‘पैच’ नहीं होने चाहिए, बल्कि कथ्य को आगे बढ़ाने का माध्यम होने चाहिए। लोक कलाकारों से सहज अभिनय करवाकर उन्होंने यह साबित किया कि अभिनय किताबों से नहीं, बल्कि अभ्यास और जीवन-अनुभव से आता है।
मंच पर पहचान और आत्मविश्वास: इस कार्यशाला के दौरान मुझे मोहन राकेश के नाटकों ‘बहुत बड़ा सवाल’ और ‘सिपाही की माँ’ में भूमिकाएँ मिलीं। प्रयोग के तौर पर तैयार ‘सिपाही की माँ’ को दर्शकों ने अपेक्षाकृत अधिक सराहा। यहीं मैंने आवाज़ की टोन, संयम और मंचीय संतुलन का महत्व समझा—एक ऐसा सबक, जो जीवन भर मेरे साथ रहा और जिसने मेरे अभिनेता के रूप को भीतर से गढ़ा।
मुंबई, संघर्ष और ‘आगरा बाज़ार’: 1996 के बाद मेरा जीवन मुंबई के संघर्षों से भर गया—टीवी, फ़िल्म, थिएटर और पत्रकारिता के बीच संतुलन साधते हुए। लेकिन रंगकर्म को वास्तविक स्थायित्व मिला हबीब तनवीर के कालजयी नाटक ‘आगरा बाज़ार’ से। 2004 से 2009 तक मैं नियमित रूप से ‘नया थिएटर’ के साथ जुड़ा रहा। दिल्ली, मुंबई, भोपाल, बेंगलुरु, गोहाटी और जर्मनी तक हुए मंचनों ने मुझे एक व्यापक और अंतरराष्ट्रीय रंग-अनुभव दिया। जर्मनी के बॉन बिएनाले में मिले स्टैंडिंग ओवेशन की स्मृति आज भी मेरे भीतर जीवित है।
गुरु का स्नेह, अनुशासन और विरासत: हबीब तनवीर अपने कलाकारों से गहरा स्नेह रखते थे, लेकिन मंच पर अनुशासन से कभी समझौता नहीं करते थे। वे सुधार के लिए कठोर भी होते थे, पर उस कठोरता में भी एक शिक्षक की करुणा छिपी रहती थी। उनकी यही दृष्टि ‘आगरा बाज़ार’ को आधे घंटे के एक प्रयोग से ढाई घंटे का कालजयी नाटक बनाती है। 2009 में उनके निधन के बाद रंगकर्म में एक गहरा सन्नाटा महसूस हुआ, लेकिन उनकी विरासत और सीख आज भी ‘नया थिएटर’ और उसके कलाकारों में जीवित है।
मेरे लिये रंगकर्म एक सतत यात्रा : मेरे लिए हबीब तनवीर केवल गुरु नहीं, बल्कि रंगकर्म के नैतिक और मानवीय मानक हैं। उनकी संगत ने मुझे यह सिखाया कि रंगमंच केवल अभिनय नहीं, बल्कि सामूहिक संवेदना, अनुशासन और ईमानदारी का उत्सव है। यह यात्रा आज भी जारी है—कभी मंच पर, कभी स्मृतियों में और कभी उस साहस में, जो हर नए नाटक के साथ जन्म लेता है। आगे पढ़िये – प्रेम प्रेम सब कहें, मरम न जाने कोय – https://indorestudio.com/rang-radheshyam-book-review/











