शकील अख़्तर,इंदौर स्टुडियो। ‘कला और संस्कृति के संवर्धन के लिये हमें कल्चरल साइंटिस्ट, कल्चरल लैब्स और कल्चरल सर्विसेस की जरूरत है। ऐसी लैब्स जहां पर हमारे संस्कृति वैज्ञानिक, हमारी कला-परंपराओं के ख़ज़ाने को न सिर्फ संरक्षित करने का काम कर सकें बल्कि उसके सदुपयोग से इस क्षेत्र को सकारात्मक रूप से आगे बढ़ाने में हमारी मदद कर सकें’। यह बात संगीत नाटक अकादमी में ड्रामा विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी और कथक केंद्र के डायरेक्टर सुमन कुमार ने कही। वे कला संस्कृति के ताज़ा परिदृश्य पर चर्चा कर रहे थे।
सुमन कुमार कला-प्रबंधन के साथ ही कला के संरक्षण और विस्तार का दीर्घ अनुभव रखते हैं। उन्हें संगीत नाटक अकादमी के माध्यम से कई विशिष्ट और महत्वपूर्ण कला आयोजनों के लिये जाना जाता है। हाल ही में आप संगीत नाटक अकादमी के आज़ादी अमृत महोत्सव के अवसर पर आयोजित ऑनलाइन कार्यक्रमों के प्रंबंधन और संचालन में व्यस्त रहे।
(चित्र: कथक केंद्र द्वारा आयोजित ‘राम चरित मानस’ की प्रस्तुति )
हर प्रांत में हो आर्ट और कल्चर लैब्स :
सुमन कुमार ने कल्चरल साइंटिस्ट, कल्चरल लैब्स और कल्चरल सर्विसेस की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘आपको यह संकल्पना भले कुछ अलग लगे, परंतु अपने अनुभव से मैं समझता हूं इस दिशा में हमें आगे बढ़ने की ज़रूरत है। मेरे विचार में आर्ट एंड कल्चर की लैब्स हर प्रांत में होना चाहिये। ताकि वहां के कल्चरल हेरिटेज का सही आकलन और उसके संरक्षण का काम जारी रहे। सुमन कुमार ने कहा, ‘एक और अहम बात, मैं समझता हूं कि हमारे यहां प्रशासकीय सेवाओं के लिये जिस तरह आईएएस,आईपीएस,आईएफस होते हैं। उसी तरह आईसीएस यानी इंडियन कल्चरल सर्विसेस भी होना चाहिये। ऐसा होने पर हमारे संस्कृति मंत्रालयों और विभागों का भला होगा। कला और संस्कृति से जुड़ी योजनाओं का बेहतर प्रबंधन और काम हो सकेगा। कलाकारों के हित में नई नीतियां बन सकेंगी। उन्होंने यह भी कहा, ‘जो लोग कला के क्षेत्र में समर्पित काम कर रहे हैं, उनका महत्व किसी प्रोफ़ेसर,चिकित्सक,वैज्ञानिक से कम नहीं। उन्हें भी समाज में उचित मान-सम्मान मिलना ही चाहिये। यह हमारे समाज और देश के हित में हैं’।
(चित्र: कला क्षेत्र फाउंडेशन तमिलनाडु की प्रस्तुति)
ख़त्म होती कलाओं को बचाना ज़रूरी:
सुमन कुमार ने कहा-‘ लुप्त होती कला-परंपराओं के लिये हमें लगातार काम करते रहने की ज़रूरत है। यह उन लोक पंरपराओं और कलाओं के संदर्भ में बहुत ज़रूरी है,जो बदलते समय के साथ दम तोड़ रही हैं। उन्होंने कहा, परंपरा को आगे बढ़ाने के लिये हमें नये कलाकारों को तैयार करते रहना होगा। परंतु नये कलाकारों का शिक्षित होना भी ज़रूरी है, ताकि जहां एक तरफ वे कला विशेष को आगे बढ़ाने का काम करते रहें,वहीं वे जीविका से जुड़ी चुनौतियों का सामना भी कर सकें। जबकि स्थानीय कलाओं को बचाने के लिये राज्यों को दीर्घकालीन योजनाओं पर काम करते रहने की ज़रूरत है। ऐसी कला विधाओं की पहचान कर उनके लिये निवेश करते रहना ज़रूरी है।
(चित्र: हरेंद्रनाथ कुमार ,तागाराम बामनिया मोती साराऔर किशन परिहार प्रस्तुत राजस्थानी लोकसंगीत )
कला सिर्फ बाज़ार का प्रॉडक्ट नहीं:
सुमन कुमार ने कहा, हमें कला को सिर्फ इंटरटेनमेंट के लिये तैयार किसी चमकदार प्रॉड्कट के रूप में ही नहीं देखना चाहिये। ऐसा करने से कला विधायें बाज़ार के हाथों की वस्तु भर बनकर रह जायेंगी। बाज़ार का दबाव जब कलाओं पर काम करने लगता है, तब इसके मूल स्वरूप के ख़त्म होने का ही ख़तरा बढ़ने लगता है। उन्होंने कहा, ‘असल में हमें यह समझने की ज़रूरत है कि कलायें एक आदमी को आदमी बनाती हैं। बाहर से भले यह दिखता नहीं है लेकिन कला विधायें यह काम निरंतर करती रहती हैं। यहां यह कहना भी ज़रूरी है कि कला के बिना आदमी ख़ुद में एक अधूरापन सा महसूस करता है। कलाओं से ज्ञान और संस्कार का काम तो स्कूल से ही शुरू हो जाना चाहिये; जिन स्कूलों की शैक्षणिक गतिविधियों में कलाओं का स्थान नहीं हैं, वहां के छात्र शिक्षित तो हो जाते हैं, पर उनमें वे गुण विकसित नहीं हो पाते उनके आगे के जीवन के लिये बेहद ज़रूरी है। हर बच्चे की अपनी विशेषता होती है, कला उन्हें उनकी उन ख़ूबियों को खोज निकालने में मदद करती है। रंगमंच जैसी कला की विशेषता यहां तक है कि इससे दिव्यांग बच्चों को भी सक्षम बनाने में बड़ी सहायता मिलती है।
(चित्र: नागा लोक संगीत की प्रस्तुति )
कला से स्त्री सशक्तिकरण,कथक एक मिसाल:
कथक कला केंद्र के इस डायरेक्टर ने कला से सक्षम होने से जुड़ी एक और बात कही-‘ कथक ने एक स्त्री के सशक्तिकरण में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। यह बात पिछले दिनों एक आयोजन में कथक पर चर्चा के दौरान सामने आई। आज भारत में कथक या शास्त्रीय नृत्यकलाओं से जुड़ी कई बड़ी और सम्मानित महिला कलाकार हैं। उन्हें समाज में अब अपेक्षित मान मिलता है। पहले इस कला क्षेत्र में पुरूषों की अधिकता थी। मगर अब ऐसा नहीं है। आज महिलाएं इस विधा में बहुत अच्छा का काम कर रही हैं। कथक या नृत्य कलायें महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में भी काफी बड़ी भूमिका निभा रही हैं। नृत्य कलाकार अपना प्रशिक्षण केंद्र खोलकर अपना जीवन स्वतंत्र रूप से चला पाती हैं। सुमन कुमार ने कहा, यहां पर जाकर एक बात और समझ में आती है। हमारे संविधान की तरह ही कला का सम-विधान है जिस तरह हमारा संविधान सबके लिये समान अवसर और न्याय की बात करता है। कला में भी लय का सम है, सबके लिये समान अवसर का विधान है’।
लॉकडाउन में भी ख़ुदको लॉक नहीं किया :
यह पूछे जाने पर कि वे चुनौतियों के बीच अकादमी में कैसे अपने काम को लेकर आगे बढ़ते हैं। सुमन कुमार ने कहा, ‘एक कलाकार को ज़्यादा से ज़्यादा मौका और काम मिल सके। उसे उसका उचित मान मिल सके, हम यही करते आये हैं। यह सच है कि चुनौतियां सभी के साथ है। परंतु उनके बीच में ही हमें कला और कलाकारों के हित में काम करते रहना है। यही वजह रही कि हमने एक समय सीमा के बाद लॉक डाउन में भी खुदको लॉक नहीं किया। हम ख़ुद को अपनी कला की तरह ही चुनौती के वक्त भी अनलॉक कर आगे काम करने की कोशिश करते रहे’।
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