Wednesday, April 15, 2026
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हर परफॉरमेंस में साथ होती है मेरी गुरू माँ!

नृत्य के हर परफॉरमेंस में मेरे साथ मेरी गुरू माँ यानी ‘आई’ होती हैं। पुणे में नये कलाकारों को प्रशिक्षण देते समय भी, मां की सीख मेरे काम आती है। सच यही है कि आज मैं जो कुछ हूँ, आई की वजह से हूँ’। कथक नृत्यांगना सविता  गोडबोले के बारे मे यह बात, उनकी सुपुत्री आस्था गोडबोले कार्लेकर ने कही। एक साल पहले 67 बरस की उम्र में सविता गोडबोले का निधन हो गया था। इंदौर में उन्हें सभी सविता ताई के नाम से सम्बोधित करते थे। उनकी बेटी आस्था अब उन्हीं के पद चिन्हों पर चलते हुए कथक की कला को आगे बढ़ा रही हैं। वे पुणे में रहती हैं, वहीं रहकर बच्चों को कथक की तालीम दे रही हैं। उनके पति मंदार अनिल कार्लेकर एक इंजीनियर हैं, परंतु वे पारिवारिक विरासत के अनुरूप आर्युवैदिक पद्धति से उपचार और विरली वनस्पतियों को लेकर काम भी कर रहे हैं। जबकि दोनों बेटे नागार्जुन और मल्लिकार्जुन भी नृत्य की शिक्षा ले रहे हैं। नार्गाजुन को संस्कृति मंत्रालय ने लेखन के लिये छात्र वृत्ति भी प्रदान की है। आस्था गोडबोले इस लेख के माध्यम से अपनी ‘गुरू माँ’ को याद कर रही हैं। बता रही हैं कि किस तरह से उनका जीवन नृत्य कला के प्रति समर्पित रहा। – संपादक, इंदौर स्टूडियो। अद्भुत प्रतिभा की धनी थी मेरी माँ: मेरी माँ एक उम्दा नृत्य कलाकार, बेहद सर्जनशील और अद्भुत प्रतिभा की धनी थी। माँ ने मुझे बताया था, जब वे सिर्फ चार साल की थीं, तब उनके हम उम्र बच्चे तो खिलौनों से खेलते थे लेकिन वे लोगों की गतिविधियों को देखकर वैसी ही भाव-भंगिमाएं या मुद्राएं बनाने का खेल खेलती थीं। वे पानी भरकर लाने, कपड़े धोने, चूल्हा जलाने, चक्की चलाने जैसे क्रिया कलापों को नृत्य की नज़रिये से देखा करती थीं। जल्द ही उन्हें महसूस हुआ कि उनके अंदर नृत्य को सोचने-समझने के गुण है और उन्हें भगवान ने एक नृत्य कलाकार बनने के लिये ही भेजा है। यहीं से उनके पैरों ने थिरकना शुरू कर दिया। पाँच साल की उम्र में ही लखनऊ में उनकी कथक की शिक्षा शुरू हो गई। उनके पहले गुरू केडी श्रीवास्तव रहे। मगर बाद में आई ने प्रख्यात आचार्य लच्छू महाराज, फिर उस्ताद वाजिद खाँ और उस्ताद आफ़ाक हुसैन खाँ साहब से प्रशिक्षण लिया। इन दोनों के माध्यम से आई ने तबला अंग के माध्यम से विशिष्ट शैली का विकास भी किया। एक और बात ये भी है कि आचार्य लच्छू महाराज के जन्म शताब्दी पर उनका डाक टिकट निकाले जाने को लेकर आई ने ख़ासी कोशिशें की थीं।आड़ा बाज़ार में लगती थी क्लास: मैंने जब इस दुनिया में होश संभाला, तब अपनी मां यानी आई को एक सफल नृत्यांगना के रूप में ही देखा। एक ऐसी कलाकार जिसके शोज़ होते रहते थे। वे नृत्य में दिलचस्पी रखने वाली छात्राओं को भी बड़े शौक से नृत्य सिखाती थी। हर चीज़ को रोज़ के क्रिया कलापों से जोड़कर देखती थीं। तब हमारा घर आड़ा बाज़ार, इंदौर में वहाँ मौजूद पाठक के बाड़े में हुआ करता था। पाठक परिवार मेरे डॉक्टर पिता के पास चिकित्सा के लिये आते थे। तब परिवारों के अपने फेमिली डॉक्टर्स हुआ करते थे। उस बाड़े में हमारे घर तक आने के लिये एक लकड़ी वाला चढ़ाव था। वहाँ पर ताल,लय और घुंघरूओं की थिरकन गूँजती रहती थी। आज मैं नृत्य करती हूँ तो मुझमें जैसे वो ताल और लय देती हैं। मेरे कार्यक्रमों की तैयारी में उनकी तालीम की प्रतिगूँज सुनाई देती है।बेटी नहीं गुरू माँ की शिष्या: आड़ा बाज़ार वाली नृत्य की क्लास में दूसरी लड़कियों की तरह मैं भी अपनी गुरू माँ की एक शिष्या थी। तब मेरे साथ अर्चना अर्जुन, शुभदा नातू, रोहिनी दीदी भी नृत्य की तालीम ले रही थीं। जब मेरे छोटे भाई का जन्म हुआ, उसके बाद माँ ने पलसीकर कॉलोनी में नृत्य की क्लासेस शुरू की। वहाँ पर जबाला दी, चेतना दी, और माणिक दीदी ने भी नृत्य सीखना शुरु किया था। आई ब्रह्म मुहूर्त में ही उठ जाती थीं। सुबह उठकर घर के सारे काम निपटाती। काम निपटाकर वे नियम से रियाज़ करतीं। मुझे याद है, राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त तबला वादक शरद खरगोनकर जी से के साथ वे रियाज़ किया करती थीं। शरद खरगोनकर लखनऊ घराने के तबला वदक उस्ताद जहाँगीर ख़ान साहब के शिष्य थे। आई जो भी नई बंदिश सीखती, उसे मुझे भी बताती। मैं उन्हें याद करती।कृष्ण मंदिर में हुआ था पहला प्रोग्राम: इंदौर में ही हमारे घर के सामने त्रिवेदी जी का कृष्ण मंदिर था। कुछ लोग उसे काला मंदिर कहते थे। आई का पहला प्रोग्राम उसी मंदिर में जन्ममाष्टमी को हुआ था। खरगोनकर काका के साथ ही आशा कुमार त्रिवेदी जी ने मुझे यह बताया था। आई ने कृष्ण जन्म से लेकर गीता उपदेश तक की कथा प्रस्तुत किया था। तब संगत शरद काका ने की थी और प्रख्यात सारंगी वादक मोइनुद्दीन खान ने साथ दिया था। काका ने बताया था, वह प्रस्तुति इतनी प्रभावशाली थी कि देखने वालों ने यह कहा, आज हमने कृष्ण भगवान का दर्शन किया। कलाकारों का घर आना-जाना रहा: आई की वजह से हमारे घर पर बहुत से कलाकारों का आना-जाना रहा। इसमें सिर्फ नृत्य और संगीत के ही कलाकार नहीं थे। हर विधा से जुड़े कलाकार उनके पास आया-जाया करते थे। इनमें बंडू भैया चौगुले, दीपक गरुड, पवार बंधु, मोइनुद्दीन खान, कमल कामले, विलास सप्रे, जीके पंडित, गुरुजी विष्णु चिंचालकर, बापूराव अग्निहोत्री, शशिकांत तांबे, जयश्री तांबे, अरविंद अग्निहोत्री, लोकेन्द्र त्रिवेदी, शरद शबल, रंजना ठाकुर,  विभा मिश्रा, उर्मिल कुमार थपडियाल राजेंद्र खेर, प्रदीप कणिक, पेंटर वर्मा, भालू मोंढे, सूर्यकांत भोजने, दिलीप लोकरे, ओपी सोनी आदि शामिल रहे। इसी तरह स्व. प्रभाकर माचवे, प्रभु जोशी, शाहिद मिर्जा, आदिल कुरैशी, राकेश श्रीमाल जैसे साहित्यकार और पत्रकारों का आना-जाना रहा। अलकनंदा साने, शकील अख्तर,आदित्य अरुण, रूख़साना मिर्ज़ा, परशुराम तिवारी जैसे रचनाकार पत्रकार भी आई से पारिवारिक तौर पर जुड़े थे। शुरूआती दौर में राकेश श्रीमाल काका को आई और बाबा ने अपने छोटे भाई की तरह सहयोग किया था। रंगों और रंगमंच की दी शिक्षा:  मुझे याद है, आई के साथ मैं अक्सर देवलालीकर कला वीथिका जाया करती थी। वहाँ भी आई, चित्रकला प्रदर्शनी में नृत्य ढूंढने को कहती। कभी नाटक देखने ले जाती तो कहती देखो स्टेज का कैसे उपयोग हो रहा है। वे कला के हर आयाम को जीवन से जोड़तीं। उन्हें किताबें पढ़ने का भी बहुत शौक था। मज़े की बात ये है कि आई का, मेरे पिता पर ऐसा असर हुआ कि वे अपने विज्ञान विषय में भी कला को ढूंढने लगे थे। बाबा और खरगोनकर काका आई के पीछे पड़े थे कि वे नृत्य में एमए कर लें। परंतु आई उन दोनों की ही बात को टाल देती थीं। मां हमारी पढ़ाई को लेकर चिंतित थीं: असल में वे हमारी पढ़ाई को लेकर चिंतित थी। इसकी एक बड़ी वजह पिता के पेशे की अनिश्चित आय भी थी। आख़िर बाबा उन्हें मनाने में कामयाब हो गए। उन्होंने हम बच्चों को संभालने से लेकर बर्तन माँजने तक की ज़िम्मेदारी संभाल ली। वे बार-बार आई से कहते, ‘तुम पढ़ो। सिर्फ पढ़ाई में ध्यान लगाओ। बाकी मुझ पर छोड़ दो’। आख़िर सपना साकार हुआ और आई कथक में एमए हो गई। उन्हें गोल्ड मेडल मिला । (तस्वीर में पुणे में कथक गुरू आस्था गोडबोले के साथ उनसे नृत्य की तालीम लेने वाले शिष्य)पाँच साल की उम्र से सीखा नृत्य: मैंने 5 साल की उम्र में ही माँ से नृत्य सीखना शुरू कर दिया था। आठ बरस की आयु में गणेशोत्सव में पहला कार्यक्रम प्रस्तुत किया। मैं स्कूल से पंत वैद्य कॉलोनी में शरद काका के घर रियाज़ के लिये जाती। फिर गर आती। घर में भी मां रियाज़ कराती। रियाज़ के साथ मुरब्बा खिलातीं। शरद काका ने ही शुरूआती कार्यक्रमों की तैयारियां करवाईं थीं। वो प्रोग्राम झांसी,कानपुर,लखनऊ में हुए थे। ग़लती होने पर माँ की पिटाई लगती। तब काका बचाते, कहते। मेरे सामने मम्मू जान थिरकवा को मत मारो। काका के देहावसान से माँ और मुझे गहरा आघात लगा था। आई कहती, मेरा बड़ा भाई चला गया। एक मस्त मौला इंसान। जो तकलीफ़ों को मज़े से जीना जानता था। ये शरद काका ही थे, जिनकी वजह से कई कलाकारों से परिचय का दायरा बढ़ा था। संजय आगले दादा जैसे पखावज वादक परिवार से जुड़े थे। उनके साथ रहकर बहुत कुछ सीखा था। संयम से जीवन जीना सिखाया: आई ने मुझे दुख और सुख दोनों में ही संतुलन बनाकर रखना सिखाया था। उन्होंने अपने जीवन में संघर्ष और अभाव को बहुत करीब से देखा था। हर परिस्थिति में वह हँसकर जीना सिखाती थी। उनकी तरह बाबा ने भी एक बात हमेशा सिखाई, जब तक मंज़िल न मिले, रूकना नहीं हैं। आई ने मुझे दुनिया की सबसे बडी पूँजी मुझे नृत्य विद्या के रूप में दी है। इसके बलबूते आज मेरा अस्तित्व है। आई ने ही रिश्तों को सम्हालना और लोगों को जोड़ना सिखाया। आई ने नि:स्वार्थ भावना से मदद करना सिखाया। आई घर आने वालों को भोजन कराये बिना नहीं भेजतीं। वे हमेशा कहती, किसी को भोजन कराने से अन्न में कोई कमी नहीं आती। आई हमेशा काम करने वाली बाई, सब्ज़ी वाले, दूधवालों को भी भोजन कराकर बड़ी ख़ुश होतीं।लयशाला की स्थापना और रचनाधर्मिता: आई ने ही कला के क्षेत्र में विशिष्ट रचनात्मक कार्यक्रमों के लिये ‘लयशाला’ नाम की संस्था की, 1 सितंबर 1980 को स्थापना की थी। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने शहर के साथ मध्यप्रदेश में कई तरह के कार्यक्रम किये। इनमें नृत्य से लेकर चित्रकला,कला मेलों और रंगमंच जैसे आयोजन रहे। जब तक आई सक्रिय रहीं उन्होंने इसके माध्यम से कार्यक्रमों का सिलसिला जारी रखा। इसमें विभिन्न विधाओं से जुड़े कई कलाकार और कला रसिकों ने अपना-अपना योगदान दिया। उनकी सक्रियता और रचनाधर्मिता हमारी प्रेरणा बनी। आज भी मैं आई को अपने अंदर महसूस करती हूँ। मेरे हर कार्यक्रम में उनकी दी शिक्षा और संस्कार काम करते हैं। उन्हीं की प्रेरणा से आज मैं उनकी नृत्य शिक्षा को आगे बढ़ा रही हूँ।  आगे पढ़िये – 

वीर सावरकर पर मैंने क्यों खेला नाटक ‘मी तात्याराव बोलतो’- योग मिश्र

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1 COMMENT

  1. सौभाग्य है की एक बडे संस्था से हम जूट रहे है । हम आपकी मासे हमने ऐसा भी सिख लिये की तपस्या से यश कीर्ती बढती है । जीवन मे उच्च शिखर पर पाने के लिए तपस्या ही और कष्ट ही एक प्रति मार्ग आहे । आपके भविष्य के जीवन मे बहुत बडी कामयाबीन है उसे हसील करना आपके लिए आपको लक्ष लक्ष बधाई हो ।
    आपकी संस्था के कौन कौन से पुरस्कार होते है उसका क्या क्या पर्याय है ? इसके बारे मे हम जानकारी चाहते है कृपा करके भेज दे ।
    मै साहित्य संगीत योग व्याख्यान धार्मिक कार्य इस कार्य मेने मेरी जिंदगी बिदाई है । आपके स्वतः का पुरस्कार प्राप्त पाना चाहता हु ।
    धन्यवाद!

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