हेमंत पाल, इंदौर स्टूडियो। हिंदी सिनेमा में नायक हमेशा केंद्र में रहा है, लेकिन जब खलनायक दमदार हो तो कहानी की चमक कई गुना बढ़ जाती है। यही वजह है कि आज अक्षय खन्ना और बॉबी देओल जैसे कलाकार, जिन्होंने कभी रोमांटिक हीरो की छवि अपनाई थी, अब खलनायकी के नए प्रतीक बनकर दर्शकों को रोमांचित कर रहे हैं। उनकी निगेटिव भूमिकाएँ सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि कहानी का इंजन और दर्शकों की जिज्ञासा का केंद्र बन चुकी हैं।
स्टार बेटों की छवि का उलटफेर: अक्षय खन्ना और बॉबी देओल दोनों ही अपने ज़माने के सफल हीरो के बेटे हैं। पिता की तरह हीरो की छवि अपनाने के बावजूद वे उतनी पहचान नहीं बना सके। लेकिन हालात बदले और उन्होंने हीरो का मुखौटा उतारकर खलनायक की भूमिका स्वीकार की। ‘छावा’, ‘धुरंधर’, ‘आश्रम’ और ‘एनिमल’ जैसी परियोजनाओं ने उन्हें नई ऊंचाई दी।
खलनायक का बदलता चेहरा: आज हिंदी सिनेमा में खलनायक सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट नैतिक विभाजन नहीं, बल्कि एंटी-हीरो और ग्रे-जोन का प्रतीक है। ‘केजीएफ’, ‘पुष्पा’, ‘मिर्ज़ापुर’, ‘छावा’ और ‘एनिमल’ जैसी कहानियाँ हिंसक और संदिग्ध किरदारों के नज़रिए से कही जा रही हैं। दर्शक इस अंधेरे में रोमांच और रिलेटेबिलिटी दोनों खोज रहे हैं।
स्टार विलेन का नया मॉडल: अक्षय और बॉबी ने साबित किया कि निगेटिव रोल करियर रिवाइवल का साधन भी हो सकता है। अक्षय खन्ना का अभिनय संवेदनशीलता और ठंडे करिश्मे का संगम है। ‘रेस’, ‘इत्तेफाक’ और ‘धुरंधर’ में उन्होंने दिखाया कि खलनायक बौद्धिक रूप से भी खतरनाक हो सकता है। वहीं बॉबी देओल ने ‘आश्रम’ और ‘एनिमल’ में मौन के आतंक को साकार किया।
अक्षय खन्ना: मनोवैज्ञानिक खलनायक: ‘हमराज़’ और ‘रेस’ से शुरू होकर ‘छावा’ के औरंगजेब और ‘धुरंधर’ के रहमान डकैत तक, अक्षय ने निगेटिव किरदारों को परतदार और जटिल बनाया। उनकी धीमी लेकिन भय पैदा करने वाली बॉडी लैंग्वेज और ठंडी आंखें उन्हें 70-80 के दशक के विलेन से अलग करती हैं।
बॉबी देओल: मौन का आतंक: ‘आश्रम’ में बाबा निराला और ‘एनिमल’ में अबरार हक जैसे किरदारों ने बॉबी को फिर से चर्चा में ला खड़ा किया। बिना संवाद वाले किरदार में भी उन्होंने शरीर और आंखों से भय पैदा किया। इंडस्ट्री अब उन्हें नए दौर के विलेन के रूप में देख रही है।
खलनायकी की परंपरा: 1930 के दशक से लेकर आज तक, खलनायक हर युग का भावात्मक आईना रहा है। केएन सिंह ने सोचने-वाले अपराधी की छवि बनाई, प्राण ने करिश्माई अंदाज़ से खलनायकी को प्रतिष्ठा दी, अजीत ने स्टाइल जोड़ा, अमजद खान ने गब्बर सिंह से आतंक को अमर किया और अमरीश पुरी ने मोगैंबो से खलनायक को ऑरा दिया।
नफ़रत और करुणा का संगम: हर दौर के खलनायक ने दिखाया कि अभिनय की असली गहराई बुराई को विश्वसनीय और करिश्माई बनाने में है। अक्षय खन्ना की बुद्धिमत्ता और बॉबी देओल की भावनात्मक ठंडक इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। आज भी दर्शक खलनायक की तलाश करता है, क्योंकि वही कहानी को गहराई देता है। आगे पढ़िये – रंग-राख में मंच पर बच्चों का बॉलीवुड https://indorestudio.com/rang-rakh-nsd-children-drama-festival-2026/











