हिन्दी दिवस पर विशेष: विनय उपाध्याय (इंदौर स्टू़डियो)। मैं सदियों का आवाहन हूँ, वर्तमान की पाती हूँ / मैं हिन्दी हूँ, हिन्दुस्तान की थाती हूँ। ….’दिवस’ के बहाने हिन्दी की महिमा को गाना, पोथियों के पन्ने पलटना, क़लम के किरदारों को याद करना और किसी कविता की ज़मीन से उठती मनुष्यता की पवित्र गंध को महसूस करना सुख देता है। निगाह सरहद पार के मुल्कों पर जाती है तो हिन्दी के प्रति वहाँ जिज्ञासा, प्रेम और अध्ययन की बढ़ती रुचियों को देखकर सुखद विस्मय होता है। गर्व और विश्वास गहरा होता है कि सदियों में फली-फूली हिन्दी की ध्वजा सारी दुनिया की हवाओं में लहरा रही है। यूँ हिन्दी की भाषायी समृद्धि और उसके वजूद पर स्वाभिमान छलकता है लेकिन अफ़सोस इस बात का भी होता है कि विश्वमंच पर हिन्दी की हुँकार भरने वाला हिन्दुस्तान ‘हिंग्लिश’ के सामने नतमस्तक क्यों है? हालांकि हिन्दी तो सदा हमजोली को तैयार है।
हर सीने में धड़कता हिन्दी का संसार: इस विसंगति से परे हिन्दी के संसार को देखें तो लगता है कि भाषा का भी एक देहराग होता है। उसकी भी भंगिमा होती है। हाव-भाव होते हैं। उसकी भी आवाज़ें हैं। हमारी सभ्यता ने अपनी लंबी यात्रा में इसकी परवरिश की। भाषा को पत्थर की मूरत नहीं, बल्कि अष्टधातु की प्रतिमा के रुप में गढ़ा। वह हर युग में गलती-ढलती और पिघलती रही। मानों अपना दामन पसारकर कहती हो- “मैं ज्ञानियों की भी हूँ। पोथियों से दूर कबीरों की भी हूँ। मेरा मरकज़ महल भी है और झोपड़ी भी मेरा बसेरा है। मैं हर सीने में धडक़ सकती हूँ। अपना हृदय खोलिए, फैलाइए अपनी बाहें….। भाषा में आदमी की तमीज़ को तौलती हिन्दी के बेमिसाल कवि धूमिल की कविता से गुज़रते हुए भाषा के रिश्ते पर सोच के नए कपाट खुलते हैं- “कविता क्या है? क्या यह व्यक्तित्व बनाने की / चरित्र चमकाने की / खाने-कमाने की चीज़ है। ना भाई ना / कविता भाषा में आदमी होने की तमीज़ है”।
संस्कारों की मिट्टी, आत्मीयता का आँचल: अपने वजूद और स्वाभिमान का उद्घोष करती एक भाषा अपनी यात्रा में जब दूर तक निकल जाती है तो सरहदों के दायरे सिमट जाते हैं। हिन्दी की हुंकार भी तो कुछ ऐसी ही है तभी तो उसका विश्व लगातार फैलता रहा है। भारत की मिट्टी का संस्कार पाकर इस भाषा ने अपनी आत्मीयता का आँचल कुछ इस तरह पसारा कि हर युग की नई आहटें इसमें पनाह पाती रहीं। जाति, वर्ग, वर्ण, विषय, भाषा और तकनीक की तमाम विविधताओं के बीच हिन्दी का आचरण ऐसा उदार और समावेशी रहा कि रचनात्मकता की नई संभावनाएँ हमेशा नए आकार लेती रहीं। अभिव्यक्ति का दायरा बढ़ा। सम्प्रेषण की नई दिशाएँ खुलीं। कौशल का विकास हुआ। ज्ञान और सूचना ने नए पंख फैलाए। यूँ हिन्दी की महिमा का गान साहित्य के परिसरों तक सीमित न रहकर नए इलाकों में भी गूँजता-गमकता रहा।
हिन्दी के सम्मान में मध्यप्रदेश ने रखी मिसाल: इस पृष्ठभूमि के साथ हिन्दी की मौजूदा दिशा और दशा पर जब निगाह रूकती है तो प्रयोग, नवाचार और उपलब्धियों का एक सतरंगी आसमान खुलता दिखाई देता है। ये वो फ़लक है जहाँ हिन्दी के नए हस्ताक्षर नुमाया होते है। दिलचस्प यह कि नए क्षेत्रों में हिन्दी को लेकर जो नया महत्वपूर्ण और विपुल सृजन हो रहा है उसे पूरा मान, महत्व और प्रोत्साहन मिल रहा है। इसकी बड़ी मिसाल इधर मध्यप्रदेश ने पेश की है। संभवत: यह पहला राज्य है जहाँ की सरकार ने हिन्दी के विकास में अमूल्य योगदान के लिए संस्था और व्यक्तियों को सम्मानित करने विभिन्न श्रेणियों में पाँच महत्वपूर्ण पुरस्कारों की स्थापना की है। गौरतलब है कि कोई दस बरस पहले मध्यप्रदेश के संस्कृति महकमे द्वारा हिन्दी दिवस (14 सितंबर) पर आयोजित एक समारोह में मुख्यमंत्री ने इन सम्मानों की स्थापना की घोषणा की थी। सुखद संयोग कि हिन्दी अनुरागी तत्कालीन प्रमुख सचिव संस्कृति मनोज श्रीवास्तव ने देर न करते हुए शासकीय स्तर पर इन सम्मानों की कार्यवाही को अंजाम दिया।
मध्यप्रदेश देता है हिन्दी के लिये पाँच विशिष्ट सम्मान: पहला सम्मान सूचना प्रौद्यागिकी में हिन्दी पर केन्द्रित है जिसके दायरे में हिन्दी सॉफ्टवेअर, सर्च इंजिन, वेब डिज़ाइनिंग, डिजिटल भाषा, प्रयोगशाला, प्रोग्रामिंग, सोशल मीडिया, डिजिटल ऑडियो, विजुअल एडीटिंग आदि कार्य आते हैं। दूसरा सम्मान विश्व प्रसिद्ध हिन्दी कथाकार और चिंतक निर्मल वर्मा की स्मृति में स्थापित है जो भारतीय अप्रवासी के विदेश में हिन्दी के विकास में अमूल्य योगदान के लिए दिया जाता है। तीसरी कोटि का सम्मान इस मायने में प्रेरक और उल्लेखनीय है कि यह हिन्दी को अगाध प्रेम करने वाले विदेशी फादर कामिल बुल्के के भाषायी पुरूषार्थ की याद को समर्पित है। इस सम्मान के दायरे में विदेशी मूल के लोगों का हिन्दी भाषा एवं उसकी बोलियों के विकास में उत्कृष्ट योगदान है। एक अन्य सम्मान हिन्दी में वैज्ञानिक और तकनीकी लेखन एवं पाढ्य पुस्तकों के निर्माण को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से स्थापित है जो मूर्धन्य वैज्ञानिक लेखक गुणाकार मुले के नाम से रचा गया है। पाँचवी श्रेणी में हिन्दी सेवा सम्मान है। इसके पीछे दृष्टि अहिन्दी भाषी उन लेखकों के सृजन को चिन्हित करने की है जिन्होंने अपने कृती-व्यक्तित्व से हिन्दी के संसार को समृद्ध किया है। इस प्रवाह में यह जानते चलें कि इन सभी सम्मानों के अंतर्गत एक लाख रूपए की आयकर मुक्त राशि, प्रशस्ति पट्टिका, शॉल और श्रीफल प्रदान किया जाता है। सम्मानों का चयन मध्यप्रदेश शासन द्वारा मनोनीत विशेषज्ञों की निर्णायक समिति स्वविवेक के आधार पर करती है।
नई आवाज़ों को जज़्ब करने की ताकत: विजेताओं को लक्ष्य करें तो इनमें गूगल और माईक्रोसॉफ्ट कार्पोरेशन प्राइवेट लिमिटेड के अलावा गुडग़ाँव के बालेन्द्र शर्मा दाधीच, आगरा के हरिमोहन, ईटानगर के प्रो. ओकेन लेगो, विशाखापट्टनम् के प्रो. एस. शेषारत्नम्, सागर के छबिल कुमार मेहेर तथा भोपाल पुरूषोत्तम चक्रवर्ती, कर्पूरमल जैन, संतोष चौबे, पद्माकर सराफ, सुधीर मोता और अनुराग सीठा शामिल हैं। ये सम्मान इस बात की ताईद करते हैं कि हिन्दी में नई आवाज़ों को जज़्ब करने की ताकत रही है। वह ज्ञान और सूचनाओं का बेहतर ज़रिया है। यह भी कि वह पाषाण की प्रतिमा न होकर अष्टधातु की मूरत में ढलने का माद्दा रखती है। धारणा साफ़ होती है कि हिन्दी की संपदा को महज़ साहित्य के आसपास ठहरकर आँकना उसका सही मूल्यांकन नहीं। उसके समग्र विकास को समेटने के लिए उसकी आधुनिक आभा से आँख मिलाने की भी दरकार है जो विज्ञान, तकनीक और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे नए पायदानों पर खड़ी होकर अपनी कीर्ति का परचम फहरा रही है।
‘विश्वरंग’ में चौंकाने वाली वैश्विक उपस्थिति: सन् 2019 में जब रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय ने भोपाल में साहित्य और कलाओं का अंतरराष्ट्रीय समारोह ‘विश्वरंग’ आयोजित किया तो दुनिया के तीस देशों के प्रतिनिधियों की चौंकाने वाली शिरकत रही। विश्वरंग के आंगन में हिन्दी की चहक-महक से भरे परदेसी पाहुनों की दस्तक इस अर्थ में निराली थी कि उनके होंठों पर कबीर, तुलसी, टैगोर और निराला से लेकर नीरज तक ऐसे अनेक शब्द-शिल्पियों का जि़क्र तैर रहा था जिन्हें हमने अपनी थाती मानकर पीढिय़ों का साहित्यिक संस्कार किया। रशिया की इगोर सीड, इज़राइल के गेनाद्य श्लोम्पर, साउथ अफ्रीका की लेबो मशीले और तिब्बत के तेंजिम तसन्डू जैसे दो दर्जन से भी अधिक लेखक-शोधार्थी इस प्रसंग पर प्रसन्न थे कि हिन्दी और भारतीय भाषाओं को केन्द्र में रखकर दुनिया का सबसे बड़ा उत्सव रचा जा रहा है और इस बहाने एक बार फिर इंसानी आपसदारी का एक वैश्विक मंच तैयार हो रहा है।
भोपाल के दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन की याद: याद आता है भोपाल में पाँच बरस पूर्व हुआ दसवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन। मध्यप्रदेश उसका मेज़बान था। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने उसे संयोजित किया था। राजनीति और संस्कृति की प्रखर-मुखर प्रवक्ता विदुषी सुषमा स्वराज ने इस अंतरराष्ट्रीय समागम की कमान अपने हाथों में सम्हाल रखी थी। इस विश्वमंच का उद्घोषक होने के नाते मैं पूरे विहंगम का निकट साक्षी रहा। संचार माध्यमों से संवाद के दौरान सुषमा स्वराज ने यह धारणा साफ़ कर दी कि यह हिन्दी के नाम पर सिर्फ़ साहित्यकारों का कुंभ नहीं है। यह गतिविधि हिन्दी के नए संसार और उसके तकनीकी विस्तार को देखने-समझने का ऐतिहासिक अवसर है। भोपाल के लाल परेड मैदान पर बने विशाल पांडाल के भीतर बने अलग-अलग डोम हिन्दी की गति और उसके नए गंतव्यों की गवाही दे रहे थे। …दरअसल इस वक़्त सारी चुनौती नई तकनीक की है जिसके सहारे नई राहों पर चलना अपरिहार्य है। संवादों के नए संसार में भाषा को भला हाशिये पर कैसे छोड़ा जा सकता है। हिन्दी हमजोली के लिए सदा तैयार है।
इन आवाज़ों से गुज़रते हुए हिन्दी के कवि केदारनाथ सिंह को याद करना मौजूँ लगता है- “जब चुप रहते-रहते अकड़ जाती है मेरी जीभ /दुखने लगती है मेरी आत्मा /ओ मेरी भाषा / मैं लौटता हूँ तुममें”। हिन्दी का दिवस या उत्सव मनाते हुए उसके आसपास लौटने और शब्द की अंर्तध्वनियों में मनुष्य के होने की कामना बची रहेगी।
(विनय उपाध्याय वरिष्ठ पत्रकार, कला समीक्षक और उदघोषक हैं। कला, साहित्य और सांस्कृतिक आयोजनों पर निरंतर अपने लेखन और रिपोर्ट्स के लिये पहचाने जाते हैं।)
हिन्दी दिवस पर विशेष : सदा हमजोली को तैयार है हिन्दी
RELATED ARTICLES

