मोहन राकेश के नाट्य आयाम पर उज्जैन में सार्थक परिसंवाद

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कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। उज्जैन की क्लब फ़नकार आर्ट गैलरी में 18 जनवरी 2026 को ‘अभिनव रंग मंडल’ के तत्वावधान में संवाद श्रृंखला का आयोजन हुआ। विषय था— “हिंदी रंगमंच और मोहन राकेश के नाट्य आयाम”। इस अवसर पर रंग जगत की त्रिवेणी- प्रवीण शेखर (प्रयागराज), रणधीर कुमार (पटना) और संगम पांडे (दिल्ली) वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने मोहन राकेश (8 जनवरी 1925 – 3 दिसम्बर, 1972) के योगदान को याद किया। आप जानते ही हैं आधे-अधूरे के साथ ही मोहन राकेश  रचित ‘लहरों के राजहंस‘ और ‘आषाढ़ का एक दिन‘ बेहद चर्चित नाटक रहे हैं। अनुभूतियों से भरी उनकी डायरी को हिंदी में सर्वाधिक मान्य कृतियों में से एक माना जाता है। पढ़िये परिसंवाद की रिपोर्ट- साथ में देखिये मोहन राकेश के सर्वाधिक चर्चित नाटक ‘आधे-अधूरे’ के मंचनों से जुड़े संदर्भ चित्र।

दिवंगत साहित्यकारों को श्रद्धांजलि: कार्यक्रम की शुरुआत हिंदी साहित्य जगत के दिवंगत साहित्यकारों क्रमश: विनोद कुमार शुक्ल, ज्ञान रंजन, प्रो. राजेन्द्र कुमार और आलोचक वीरेंद्र यादव को श्रद्धांजलि अर्पित कर दो मिनट के मौन से हुई। इसके बाद वक्ताओं ने हिंदी रंगमंच की दशा-दिशा और मोहन राकेश के नाट्य कृतित्व पर सारगर्भित विचार रखे।मोहन राकेश का योगदान अभूतपूर्व: रंग निर्देशक प्रवीण शेखर ने धर्मवीर भारती की कविता से वक्तव्य की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि हिंदी नाटक में भाषा और संवाद के क्षेत्र में मोहन राकेश का योगदान अभूतपूर्व है। मिथ, इतिहास और मध्यवर्गीय जीवन का चित्रण उनके नाटकों में गहराई से मिलता है। शेखर ने अपने वक्तव्य का समापन शमशेर बहादुर सिंह की कविता से किया। तस्वीर में भारत रंग महोत्सव में स्व. त्रिपुरारी शर्मा निर्देशित ‘आधे-अधूरे’ में प्रतिमा काज़मी के साथ रवि खानविलकर।    रोज़मर्रा की जिंदगी के नाटक: पटना के रंग निर्देशक रणधीर कुमार ने कहा कि राकेश के नाटक हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी के नाटक हैं। उन्होंने हिंदी रंगमंच में यथार्थवादिता को सशक्त रूप से समाविष्ट किया। उनके नाटक ऐतिहासिकता के कलेवर में शहरी मध्य वर्ग का जीवंत अंकन हैं। मोहन राकेश की डायरी नाट्य विद्यालय में अनिवार्य पठनीय रही है।तस्वीर में मोहन अगाशे और लिलेट भारत भवन भोपाल में नाटक ‘आधे-अधूरे’ के एक दृश्य में। राकेश का जीवन खुली किताब था: दिल्ली के रंग समीक्षक संगम पांडे ने बताया कि मोहन राकेश का जीवन खुली किताब था। विचारधारा के आग्रह से मुक्त रहते हुए उन्होंने नौकरी और संपादन में स्थिरता नहीं अपनाई। ‘सारिका’ पत्रिका का संपादन भी उन्होंने छोड़ दिया। संगम ने कहा कि उनके नाटकों में घटनाएं बिना स्थगन के घटित होती हैं और संवाद छोटे होते हैं। उन्होंने बादल सरकार और विजय तेंदुलकर से तुलना करते हुए राकेश को श्रेष्ठ नाटककार बताया। तस्वीर में नार्थ कैरोलिना में आधे-अधूरे के एक दृश्य में कविता भदोला और निलीना पाणी दाश।  मोहन राकेश की तुलना अप्रासंगिक: वरिष्ठ साहित्यकार अरुण वर्मा ने कहा कि मोहन राकेश की तुलना अन्य नाटककारों से करना अप्रासंगिक है। हिंदी नाटक की अपनी परंपरा है जो भारतेंदु हरिश्चंद्र से शुरू होती है। सामाजिक हस्तक्षेप और सुधार हिंदी नाटक की खासियत रही है।अतिथि वक्ताओं का आभार: अभिनव रंग मंडल के निदेशक शरद शर्मा ने अतिथि वक्ताओं का आभार व्यक्त किया और कहा कि मोहन राकेश के नाटकों के स्त्री पात्र अत्यंत सशक्त हैं। संवाद का संचालन शशिभूषण ने किया। इस अवसर पर पिलकेन्द्र अरोरा, प्रकाश देशमुख, पाँखुरी वक़्त, कविता जड़िया सहित उज्जैन के कई रंगकर्मी उपस्थित रहे। अंत में तीनों वक्ताओं को रूपांकन इंदौर द्वारा तैयार कैलेंडर स्मृति चिन्ह के रूप में भेंट किया गया। आगे पढ़िये – रंग-राख में मंच पर बच्चों का बॉलीवुड – https://indorestudio.com/rang-rakh-nsd-children-drama-festival-2026/

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