होमबाउंड: दलितों, अल्पसंख्यकों और कोरोना पीड़ितों का दस्तावेज़

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फिल्म समीक्षा, डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी। फ़िल्में दो तरह की होती हैं—एक तो वो जो केवल पैसा कमाने के लिए बनाई जाती हैं, और दूसरी वो जो समाज को झकझोरने के लिए बनाई जाती हैं। नीरज घायवान निर्देशित फ़िल्म ‘होमबाउंड’ दूसरी श्रेणी की फ़िल्म है—एक ऐसी कृति जो अवॉर्ड्स की चमक के पीछे नहीं, बल्कि दर्शकों की अंतरात्मा तक पहुंचने की कोशिश करती है। बचपन के दो दोस्तों की कहानी: उत्तर भारत के एक गांव में दो बचपन के दोस्त—शोएब (ईशान खट्टर) और चंदन कुमार वाल्मीकि (विशाल जेठवा)—पुलिस भर्ती की तैयारी कर रहे हैं। एक दलित है, दूसरा अल्पसंख्यक। चंदन अपने सरनेम को छुपाता है, कभी ‘कुमार’ बनता है, कभी ‘कायस्थ’। वर्दी पाने की चाह उन्हें इज्जत और पहचान दिलाने की उम्मीद देती है, लेकिन बेरोजगारी और जातिगत भेदभाव की दीवारें ऊंची हैं—पद हैं केवल 3,500, और आवेदक 25 लाख!अन्याय की परतें खोलती फ़िल्म: इंटरवल तक फ़िल्म सामाजिक अन्याय की परतें खोलती है, और उसके बाद कोविड महामारी के दौरान सूरत में फंसे इन्हीं दो युवाओं की त्रासदी को दर्शाती है। लॉकडाउन में जब शहरों के दरवाज़े बंद हुए, तो सबसे कमज़ोर लोग सड़कों पर थे—नंगे पांव, भूखे, बेघर। एक संवाद दिल को चीरता है: “लॉकडाउन ने सबको घर भेजा, पर हमारा घर तो कहीं है ही नहीं।”दिल में उतरने वाले मार्मिक संवाद: फ़िल्म के संवाद सीधे दिल में उतरते हैं- “लोग सरनेम पूछते हैं। बताते हैं तो लोग दूर हो जाते हैं, नहीं बताते हैं तो अपने आप से दूर हो जाते हैं।”/ “जात नहीं छोड़ती, भाई। तू कितना भी भाग ले, वो पीछे-पीछे आती है।”/ “हमारे जैसे लोग सड़क पर चलते हैं, मगर दुनिया की नजर में हम सड़क ही हैं।”/ “तुम तो घर की मुंडेर पर रखे गमले को देखते हुए भी फोन कर सकती हो। मेरे पास कहाँ घर और मुंडेर पर गमला?”कलाकारों का सच्चा अभिनय फिल्म की जान: ईशान खट्टर और विशाल जेठवा की जोड़ी इतनी सच्ची लगती है कि वे असल ज़िंदगी के दोस्त लगते हैं। विशेष रूप से चंदन का किरदार—उसकी आंखों में संघर्ष और पीड़ा की झलक दर्शकों को भीतर तक हिला देती है। जाह्नवी कपूर का छोटा लेकिन प्रभावशाली रोल है। सुदीप्ता भट्टाचार्य और हर्षिका परमार ने भी अपने किरदारों को जीवंत बनाया है।तकनीकी रूप से भी प्रभावशाली फ़िल्म: नीरज घायवान निर्देशित इस फिल्म के सभी पक्ष उत्कृष्ट हैं। सिनेमैटोग्राफर प्रतीक शाह ने ग्रामीण भारत की सच्चाई को बारिश, कीचड़ और खाली सड़कों के माध्यम से बखूबी कैद किया है। चंदन की मां के पैरों की फटी बिवाइयां एक अलग ही कहानी कहती हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक और एडिटिंग भी प्रभावशाली हैं।‘होमबाउंड’ एक रियलिस्टिक ड्रामा: ‘होमबाउंड’ एक रियलिस्टिक ड्रामा है जो दोस्ती, जातिवाद, धार्मिक उन्माद, गरीबी और सम्मान की तलाश को संवेदनशीलता से प्रस्तुत करता है। यह फ़िल्म देखने के लिए साहस चाहिए—सच्चाई को सहने का साहस। चेतावनी: अगर आप में सच्चाई देखने का साहस है, तो ही जाएं। मेरे विचार फिल्म देखने के काबिल है। यह फिल्म अगले ऑस्कर में भारत की ऑफिशियल एंट्री के रूप में भी चुनी गई है। आगे पढ़िये- दिल्ली में रचा गया कहानियों के रंगमंच का इतिहास https://indorestudio.com/delhi-me-22-natak

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