एक भूली हुई तहज़ीब का सफ़र थी फ़िल्म ‘उमराव जान’-मुज़फ़्फर अली

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सिने प्रतिनिधि, इंदौर स्टू़डियो। ‘उमराव जान’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, यह एक भूली हुई तहज़ीब का सफर था। दिग्गज फिल्मकार मुज़फ़्फर अली ने यह बात इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI 2025) में कही। वे अपने निर्देशक बेटे शाद अली के साथ बातचीत कर रहे थे। विषय था- ‘सपनों की उड़ान, खोज का सफर और विरासत की दास्तान: मुज़फ़्फ़र अली और शाद अली- सिनेमा के दो खूबसूरत दौर पर विचार-विमर्श’। गोवा में जारी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया के ‘इन कनवरसेशन सेशन’ में दो पीढ़ियों का मिलन हुआ।
बचपन से लेकर कला के सफ़र तक: बातचीत के इस सेशन में शाद ने अपने वालिद मुज़फ़्फर अली से कला, संगीत, कविता, और सिनेमा की विरासत पर बात की। शाद ने अपने पिता से उनके बचपन से जुड़ी यादों के ज़िक्र को छेड़ा। कोलकाता में उनके कला को लेकर हुए तजुरबों की बात की। मुज़फ़्फ़र अली ने कहा- ‘फ़िल्में उन्हें अपनी कल्पनाओं से मुक्त होने का आकाश देती हैं, गहरे जज़्बातों से बाहर आने में मदद करती हैं। उन्होंने बताया, उनकी पहली फ़िल्म ‘गमन’ (1978) विस्थापन के दर्द से उपजी थी। उन्होंने कलकत्ता में काम करने के बाद, एयर इंडिया में काम करते हुए इस फिल्म की योजना बनाई थी।  ‘उमराव जान’ की धुनों का ज़िक्र: बातचीत में ‘उमराव जान’ की धुनों का ज़िक्र हुआ, जिन्हें उन्होंने शायरी और फिलॉसफ़ी से जन्मा बताया। फिल्म के गीतों जैसे ‘इन आंखों की मस्ती’, ‘जुस्तजू जिसकी थी’ की चर्चा पर उन्होंने कहा, ये गीत फ़िल्म में उमराव के किरदार के उतार-चढ़ाव और भावनाओं के ग्राफ को दिखाते हैं। उन्होंने कहा, पोएट्री सपने दिखाती है और एक शायर या कवि को सपने देखना चाहिए। यह फिल्म 19 वीं सदी के लखनऊ की एक तवायफ की मार्मिक कहानी है, जो अपने संगीत, कला निर्देशन और रेखा के अभिनय के लिए आज भी जानी जाती है।भूली हुई तहज़ीब का सफर: मुज़फ़्फर अली ने कहा कि उमराव जान‘ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, यह एक भूली हुई तहज़ीब का सफर था। उन्होंने “गंगा जमुनी तहज़ीब” के बारे में बात की और इसे बचाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने बताया, ‘उमराव जान’ को बनाते वक्त कपड़े, संगीत या कोई भी चीज़ बनाने में कलाकार पूरी तरह डूब जाते थे, जो आज कम देखने को मिलता है। रेखा मेरे साथ देख रहीं थीं सपने: मुज़फ़्फर अली ने अभिनेत्री रेखा की तारीफ की। उन्होंने कहा, वे भी उनके साथ सपने देख रही थीं। उनके बिना ‘उमराव’ की रूह परदे पर जीवंत नहीं हो पाती। फिल्म को 4K रिस्टोर्ड वर्ज़न में फिर से रिलीज का काम, नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया और नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने पूरा किया है।

कई सपनों से परे एक सपना: मुज़फ़्फर अली ने ‘ज़ूनी’ को “कई सपनों से परे एक सपना” बताया। इसका निर्माण उनके लिए एक चुनौती बन गया था। उन्होंने कहा, कश्मीर में द्विभाषी फिल्म बनाने में लॉजिस्टिक, कल्चरल और सीज़नल रुकावटें आईं, जिससे यह फ़िल्म अधूरी रह गई। उन्होंने इस सपने के टूटने को बेहद दर्दनाक बताया। साथ ही कहा कि यह बनी नहीं लेकिन अधूरे काम में इसकी आत्मा बाक़ी रही। बातचीत में कश्मीर की सच्ची संस्कृति को दर्शाने वाली फ़िल्मों पर चर्चा हुई। मुज़फ़्फ़र अली ने कहा, ‘कश्मीर में सब कुछ है, प्रतिभा को वहीं विकसित करना चाहिए’।सिनेमा की विरासत की झलक: इस बातचीत का सार सिनेमा में कलात्मक ईमानदारी (Artistic Integrity) और विरासत (Legacy) को बनाए रखने पर रहा। यह पीढ़ी दर पीढ़ी कला के प्रति समर्पण, अपनी जड़ों और संस्कृति को सिनेमा के माध्यम से संरक्षित करने की एक मार्मिक कहानी थी, जिसे मुजफ्फर अली ने अपने अनुभव और शाद अली ने अपनी क्रियेटिव जर्नी के माध्यम से व्यक्त किया। मुज़फ़्फर अली-भारतीय सिनेमा के एक विशिष्ट स्तंभ: फिल्मकार और शायर मुज़फ़्फ़र अली भारतीय सिनेमा के एक विशिष्ट स्तंभ हैं। उनकी रचनात्मक यात्रा अवध की समृद्ध गंगा-जमुनी तहज़ीब और सूफीवाद से प्रेरित है। पद्म श्री (2005) से सम्मानित अली का सिनेमाई सफर 1978 में सामाजिक-यथार्थवादी फिल्म ‘गमन’ से शुरू हुआ। हालांकि, उन्हें वैश्विक पहचान उनकी 1981 की क्लासिक फिल्म ‘उमराव जान’ से ही मिली। उनकी अन्य महत्वपूर्ण फिल्मों में ‘आगमन’ और 2015 में रिलीज़ हुई ‘जानिसार’ शामिल हैं।शाद अली-आधुनिक सिनेमा में अलग पहचान: मुज़फ़्फर अली के बेटे शाद अली ने आधुनिक हिंदी सिनेमा में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत दिग्गज निर्देशक मणिरत्नम के सहायक के रूप में की। शाद अली की फिल्में मुख्य रूप से युवा प्रेम, शहरी रिश्तों और उच्च ऊर्जा वाले संगीत पर केंद्रित होती हैं। उनके निर्देशन की पहली फिल्म ‘साथिया’ (2002) एक सफल रोमांटिक ड्रामा थी। उनकी सबसे कामयाब फ़िल्म ‘बंटी और बबली’ (2005) थी, जो एक कॉमेडी क्राइम फिल्म थी, यह ब्लॉकबस्टर साबित हुई। उनकी दूसरी कुछ फिल्मों में ‘ओके जानू’ (2017) और हॉकी खिलाड़ी संदीप सिंह के जीवन पर बायोपिक फिल्म ‘सूरमा’ (2018) शामिल हैं। इनपुट और तस्वीरें पीआईबी गोवा। आगे पढ़िये – गोवा बना वंडरलैंड, सड़कों पर संस्कृति का उत्सव https://indorestudio.com/iffi-2025-goa-creative-capital/

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