(भोपाल से विनय उपाध्याय की रिपोर्ट)
इंदौर स्टुडियो। 12 जनवरी की शाम भोपाल के रवींद्र भवन में उर्दू नाटक ‘इमाम-ए-राम, नाज़-ए-हिंद राम’ का प्रदर्शन हुआ। आलोक वाजपेयी लिखित,निर्देशित यह इंदौर के कलाकारों का पहला उर्दू ड्रामा रहा जिसे उर्दू अकादमी की जानिब से ‘उर्दू ड्रामा फेस्टिवल’ में पेश किया गया। नाटक की ख़ास बात यह भी रही कि इसमें इंदौर रंगमंच के कुछ पुराने कलाकार भी अरसे बाद नज़र आये। नाटक एक ख़ूबसूरत पैग़ाम भी दे गया। इसे ड्रामे ने समझाया, सियासी रंगमंच पर राम की इबारत के तमाम अलहदा मतलब ज़रूर खोजे जा सकते हैं लेकिन कला की ज़मीन पर राम का कि़रदार और उनकी कथा तमाम फ़ासलों को पूरते हुये इंसानियत पर मुहर लगाते हैं।
राम के बेशुमार रंग-रूप : हिन्दी और उर्दू ज़ुबानों की जुगलबंदी में राम के बेशुमार रंग-रूपों, छवियों, अर्थ और आशयों को समता, ममता और एकता के आसपास देखने-महसूसने के ये नायाब लम्हे थे। मशहूर शायर शम्सी मीनाई ने आवाज़ लगाई- “एक तर्ज़ एक बात है, हर ख़ास-ओ-आम से/ मिलते हैं कैसे-कैसे सबक हमको राम से”। फिर इसी सिलसिले में जुड़ा रहबर जौनपुरी का मकबूल शेर- “क़दमों से राम के ये ज़मीं सरफ़राज है/हिन्दोस्तां को उन की शुजामत पे नाज़ है”। कबीर की निर्गुण पुकार भी जीवन के सच का उजाला बिखेरती रही “ज़रा धीरे-धीरे गाड़ी हाँको, मेरे राम गाड़ी वाले”।
रचा गया राम का नया रूपक: इन तमाम संदर्भों का ताना-बाना जोड़कर इंदौर के संस्कृतिकर्मी आलोक वाजपेयी ने राम का एक नया रूपक रचा। अयोध्या के राम की व्यापक स्वीकृति का आग्रह लेकर वे रंगमंच की चौखट पर नमूदार हुए हैं। यहाँ राम की गाथा केवल घटनाओं और कुछ प्रसंगों का कोरा बखान नहीं है बल्कि एक व्यक्ति से परे गुणों की खान हैं। उनका चरित्र संतों-महंतों, फकीरों से लेकर एक आम आदमी को अपनी तरह से भीतर तक छूता है, लुभाता है। वे इस देश की संस्कृति के रग-रग में उतर जाते हैं। वे गांधी के लिए आचरण बन जाते हैं। ए.बी.जे. अब्दुल कलाम रामेश्वरम् के तट पर इबादत के पाक रंगों का पैगाम देने वाले अपने पिता जैनुल से राम की धर्म निरपेक्षता का सबक लेते हैं। शब्द, रंग, दृश्य और ध्वनियों के संसार में राम जन-जन के हो जाते हैं।
मुख़्तलिफ़ ज़बानों में राम का एहतेराम: ग़ौर करने वाली बात ये कि संस्कृत और अवधी की हदों से बाहर फारसी-उर्दू सहित मुख्तलिफ़ जुबानों के अदब ने राम का एहतेराम किया है। आलेख और विषय वस्तु से परे जब रंगमंच की कसौटी पर इस नाटक को देखें तो निर्देशक से अपेक्षाएँ बाकी भी रह जाती हैं। संवाद और अभिनय में नाटकीयता की बहुत गुंजाइश स्क्रिप्ट में नहीं थी लिहाज़ा बहुत सारा सतह पर तैरता रहा। मुमकिन है कि जल्दबाज़ी में नाटक को शक्ल दे दी गयी। वो एनर्जी जो खेले जा रहे नाटक के भीतर से दर्शकों के लिए फोर्स पैदा करती है, शिद्दत से उभर न पायी। अलबत्ता जावेद अहमद शाह के गीत याद रहते हैं। खुद आलोक गीतों को गाते-गुनगुनाते रहे लेकिन तेज़ साउंड और बेसुरापन मौसिक़ी का ज़ायका बिगाड़ता रहा। अभ्युदय सांस्कृतिक मंच-इंदौर की टीम के लिए निश्चय ही यह नया रंग अनुभव रहा। लीलाओं के मंचन की ऐतिहासिक परंपरा से हटकर प्रयोग की नई ज़मीन पर रमते राम प्रेम और करूणा का उजाला बिखेरते रहे, दुनिया को जिसकी आज सबसे ज्यादा दरकार है।
इंदौर के कलाकारों का पहला प्रयास: इंदौर के कलाकारों का यह पहला उर्दू ड्रामा रहा जो प्रतिष्ठित उर्दू ड्रामा फ़ेस्टिवल में मंचित हुआ। इंदौर में समृद्ध रंगमंच परम्परा के बावजूद उर्दू नाटक की दिशा में शून्य व्याप्त था। इस दृष्टि से यह प्रस्तुति बड़ी बात है। नाटक राष्ट्रीय एकता और आपसी भाईचारे के संदेश को उर्दू अदब में राम पर लिखी गईं किताबों और नज़्मों के साथ पिरोकर लिखा गया है। नाटक से वरिष्ठ रंगकर्मी और टीवी कलाकार सुशील जौहरी और उर्दू अदब और नाट्य जगत के बद्र वास्ति का जुड़ना भी ख़ास बात रही। इसके अलावा शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी श्री प्रांजल क्षोत्रिय, रवि वर्मा, गुलरेज़ खान, शेखर पाठक, तनवीर फारूकी, डॉ. जावेद अहमद शाह अल – हिन्दी आदि इसमें महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नज़र आये। वहीं नई पीढ़ी के कलाकारों में श्री दिग्दीप सिंह, जय गिरवाल, अक्षय गाठिया, यश रोकड़े, हर्ष मेहता, उज्जवल परसाई ने भी इसमें काम किया। नाटक में मंच सज्जा और प्रकाश आकल्पन का दायित्व प्रगल्भ क्षोत्रिय ने संभाला। मेकअप का सतीश क्षोत्रिय का रहा । नाटक के लिए गीत डॉ. जावेद अहमद शाह अल हिन्दी ने लिखे हैं। जबकि उर्दू अनुवाद भी उन्होंने तनवीर फारुकी के सहयोग से किया है। लेखन,निर्देशन के साथ ही संगीत आलोक बाजपेयी का रहा। सहयोगी संगीत कलाकारों में भरत चौहान, हर्ष मेहता, उज्जवल परसाई, सजल तायवाड़े, संक्षेप पांचाल रहे। वस्त्र विन्यास श्री दिग्दीप सिंह, रंगभूषा का था। मंच पार्श्व प्रबंधन सौरभ अनंत, विहान ड्रामा वर्क्स, भोपाल का था।
मंच पर फिर दिखे दिग्गज : ‘राम इमाम -ए -हिन्द, नाज़ -ए -हिन्द राम’ नाटक से इंदौर के कई दिग्गज कलाकारों की मंच पर नई पारी प्रारम्भ की। सुशील जौहरी लगभग एक दशक के बाद स्टेज पर नज़र आये तो वहीं तनवीर फ़ारूक़ी लगभग 30 साल बाद मंच पर अभिनय करते नज़र आये। इसी तरह शेखर पाठक,रवि वर्मा, डॉ. जावेद अहमद शाह ‘अल हिन्दी” आदि भी बरसों के बाद रंगमंच पर लौटे। इस नाटक के लिए संस्कृति मंत्री सुश्री उषा ठाकुर एवं उर्दू अकादमी की निदेशक सुश्री नुसरत मेहदी ने विशेष रूचि ली तो मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक विकास दवे ने अपने क्रिएटिव इनपुट दिये।
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