Thursday, October 15, 2026
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इंदौर में जब मिले नाटक के कलाकार, सबने सुनाया ‘रंगकर्म’ का हाल

चंद्रशेखर बिरथरे, इंदौर स्टूडियो। ऐसा कम ही होता है जब शहर के रंगकर्मी एकसाथ मिलकर बैठें और अपने रचनात्मक कामों को लेकर संवाद करें। हाल ही में इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में एक ऐसी ही बैठक आयोजित हुई। इसमें शहर के नये और पुराने कलाकार शामिल हुए। सभी ने अपने रंगकर्म का हाल सुनाया। हालात पर मिलकर की बात: असल में ये बैठक लेखक, पत्रकार शकील अख़्तर से जुड़े एक संयोग की वजह से हुई। इंदौर के कला और पत्रकारिता जगत से जुड़े शकील अख़्तर जब भी दिल्ली से आते हैं, वे अपने साथियों से मुलाक़ात करना नहीं भूलते। इस बार उन्होंने जब यही बात अपने रचनाकार मित्र डॉ.अमित डेविड से कही। तब उन्होंने इंदौर क्रिश्चियन कॉलेज में ही सभी को आमंत्रित करने का विचार रखा। इसका एक उद्देश्य उनकी प्रोड्यूस की गई पहली फ़िल्म ‘लौटते बसंत का प्रेम गीत’ की घोषणा भी थी, जिसका सभी ने स्वागत किया। डॉ. अमित डेविड इंदौर क्रिश्चियन कॉलेज के प्राचार्य भी है। उनकी वजह से यह मुलाक़ात अनौपचारिक बैठक के साथ ही रंगमंच पर एक सार्थक संवाद में बदल गई।सुशील जौहरी ने ताज़ा की यादें: बैठक में वरिष्ठ रंग निर्देशक, सुशील जौहरी जी ने शहर में रंगकर्म की बहुत सी यादें ताज़ा कीं। उन्होंने अस्सी के दशक से सक्रिय हुए अपने रंग समूह ‘अरंक’ की गतिविधियों की याद की। विशेषकर ‘एक था गधा’ के 100 शोज़ की याद उभरकर सामने आई। ख़ास बात ये है कि इस चर्चा में ‘एक था गधा’ के कई शोज़ में भूमिकाएं निभाने वाले कलाकार शेखर पाठक, राकेश साहू भी मौजूद थे। वहीं भोपाल से इंदौर आए वरिष्ठ रंग निर्देशक और अभिनेता गोपाल दुबे ने भारत भवन से जुड़े दिग्गज नाट्य निर्देशकों और नाटककारों से जुड़े गहरे अनुभव साझा किये। उन्होंने कहा कि बेहतर प्रयोग के लिये निरंतर नाटकों को देखना,पढ़ना और पहले हुए कामों के बारे में भी हमें जानना ज़रूरी है।आत्मनिर्भर बनें, तैयारी रखें: नाटक में मराठी थियेटर के वरिष्ठ रंगकर्मी संस्था “अष्टरंग” के अनिल चाफेकर ने एक महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा-‘ अपने सफ़र में हमने नाटकों की ज़रूरत के हिसाब से हमने, बहुत से साज़ और प्रॉपर्टीज़ एकत्रित की। इससे हम आत्मनिर्भर बने। बार-बार होने वाले खर्चों से बचे। वह तामझाम आज भी हमार पास है। अब जब भी किसी थियेटर ग्रुप को उन सामानों की ज़रूरत पड़ती हैं, हम उन्हें सहर्ष ही उपयोग के लिये दे देते हैं।  उठी मँहगे ऑडिटोरियम की बात: बैठक में सभी ने एकमत से, ऑडिटोरियम और रिहर्सल के स्थानों की कमी का ज़िक्र किया। यह बात फिर उठी कि स्थानीय रवींद्र नाट्य गृह का शुल्क लगातार बढ़ता जा रहा है। यह अब 70 हज़ार की राशि से भी ज़्यादा हो गया है। इतना रेंट देना कलाकारों के लिये संभव नहीं है। वे बहुत मुश्किल से यह पैसा जमा कर पाते हैं। जबकि शहर में जो दूसरे प्रेक्षागृह हैं, वह मंचन के अनुकूल नहीं है। इसी तरह से रिहर्सल के लिये भी स्थानों की कमी भी अखरने वाली है। इस दिशा में सभी को मिलकर मुहिम चलाये रखने की बात विचार में आई।ब्रॉन्सन हॉल भी एक विकल्प: डॉ.अमित डेविड ने इस विषय में कहा – ‘रिहर्सल और मंचन के लिये हम अपने कॉलेज के ब्रॉन्सन हॉल को उपलब्ध कराने को तैयार हैं। साथ ही निकट भविष्य में हम यहाँ भी रंगकर्म के लिये उपयुक्त निर्माण का इरादा रखते हैं। उन्होंने बताया, क्रिश्चियन कॉलेज में करीब 30 साल उनके पिता स्व.विनोद डेविड ने ‘मंच’ कला संस्था की नींव रखी थी। तब संस्था के माध्यम से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक राजेंद्र गुप्त और स्व. संजीव दीक्षित ने उनके लिखे नाटकों का निर्देशन किया था। उन नाटकों में यहाँ मौजूद सुशील जौहरी,राकेश साहू,शेखर पाठक,गोपाल दुबे, शकील अख़्तर जैसे कलाकारों ने काम किया था। उनमें मैं ख़ुद भी शामिल था। कलाकारों के हित में ‘मंच’ की यह सक्रियता जारी रहेगी।युवा कलाकारों का काम प्रशंसनीय: चर्चा में यह बात भी सामने आई कि इंदौर में कुछ पुराने कलाकारों के साथ नये थियेटर ग्रुप्स बड़ा प्रशंसनीय काम कर रहे हैं।  बैठक में ‘सहस्त्रार’ नाट्य समूह के युवा अभिनेता और निर्देशक तपन शर्मा भी मौजूद थे। उन्होंने कहा -‘इस तरह की बैठक बेहद उपयोगी है, भविष्य में इस तरह की रचनात्मक चर्चाओं से और भी कलाकार जुड़े, यह प्रयास जारी रहेगा’।सभी कला विधाओं के कलाकार हों: युवा अभिनेत्री सुश्री मुस्कान अष्ठाना ने कहा, ‘नाटक सभी कलाओं का संगम है, इसलिये हमें अन्य कला विधाओं को जोड़कर भी काम करना चाहिये। इससे हमारे काम में नया प्रभाव पैदा होगा। उन्होंने नाटकों में नये प्रयोगों को आज़माने की बात भी कही’। बेहतर नाट्य समूह से जुड़ने की चाहत:  युवा अभिनेता और योगा टीचर हेमंत कमल ने कहा, वे निरंतर रंगकर्म से जुड़े रहना चाहते हैं, मगर उनका अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा है। आज कुछ आशा ज़रूर बँधी है। उम्मीद है मैं सभी के सहयोग से बेहतर नाट्य समूह के साथ जुड़ सकूँगा’। बैठक के समन्यक प्रो.पकंज वीरमाल के साथ ही सभी ने, नाट्य गतिविधियों को नई दिशा और गति देने के लिये,‘सूत्रधार’ संस्था के श्री सत्यनारायण व्यास की प्रशंसा की।
मराठी रंगमंच हर तरह से आगे: बात मराठी रंगमंच की भी चली। संस्था “पथिक” इन्दौर के वरिष्ठ अभिनेता और रंग निर्देशक सतीश श्रोत्री ने कहा, ‘मराठी रंगमंच की निरंतरता और कलाकारों का समर्पण मराठी थियेटर की विशेषता है। रंगमंच यहाँ एक परंपरा है। यहाँ पर विविध प्रयोग जमकर होते हैं। नये से नये विषयों को निर्देशक मंच पर प्रस्तुत करने में नहीं हिचकते। महाराष्ट्र में तो स्कूल स्तर से ही रंगकर्म की गतिविधियां प्रारंभ हो जाती हैं। उन्होंने कहा, हमारे राज्य के साथ ही हिन्दी नाटकों से जुड़े कलाकारों को इन अच्छाइयों को अपनाना चाहिये’। नाटक के प्रतिबद्ध दर्शकों की कमी: चर्चा में यह बात भी रेखांकित हुई कि नाटकों की दर्शक संख्या आज भी सीमित है। टिकट ख़रीदकर नाटक देखने वालों की कमी है। जैसे-तैसे राशि जुटाकर नाटक मंच तक तो पहुँच जाता है, मगर दर्शक संख्या डेढ़-दो सौ लोगों तक सिमट कर रह जाती है। इसके विपरीत कुछ साथियों का मत रहा, अच्छे ग्रुप्स और उनके नाटकों के टिकट लेकर दर्शक देखते भी हैं और उन्हें पसंद भी करते हैं। भारंगम के नाटकों की चर्चा: बातचीत में शकील अख़्तर ने एनएसडी,दिल्ली के भारत रंग महोत्सव के कुछ नये नाटकों की जानकारी दी। उनकी प्रभावशाली प्रस्तुति के पीछे की वजहों के बारे में बताया। इस बैठक में सर्वश्री राकेश अष्ठाना जी, मिलिंद शर्मा, मदन मोहन गुप्ता और श्रीमती गोपाल दुबे ने भी अपने विचार रखे। सभी ने भविष्य में इस तरह की बैठकों को जारी रखने की आवश्यकता जताई। डॉ.अमित ने कहा कि यह सुखद संयोग भविष्य में ‘मंच संवाद’ की श्रंखला के साथ जारी रहेगा। आगे पढ़िये –

इंदौर के अभिनव कला समाज में दो प्रेक्षागृहों का बदल रहा रंग-रूप

 

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