शोभा जैन, द टेलीप्रिंटर। इंदौर शहर की गलियों से अनंत चतुर्दशी की रात झिलमिल झांकियों का कारवां हर साल निकलता है। इन्हें निहारने के लिये शाम से ही लोग अपना स्थान सुनिश्चित कर लेते हैं। बूढ़े, बच्चे और महिलाएँ भी घर की छतों से खड़ी झांकियों के उत्सव में शामिल हो जाती हैं। आनंदमग्न यह दृश्य त्यौहार के उत्सव का बोध कराते हैं। त्यौहार जो हमारी ऐतिहासिक परम्पराओं की विरासत हैं। इन्हें हर वर्ष नये स्वरुप के साथ नया आकार देते हैं। वे कलाकार जिनके हाथों में हुनर है और कल्पना में अपने ही समय का बोध जो त्योहारों पर सजी इन झांकियों में दिखाई भी देता है। परम्परा में आधुनिकता के रूप में।
परंपरा में आधुनिकता का समावेश : इन झांकियों में केवल परम्पराएँ ही नहीं उनका आधुनिक स्वरुप भी हम देखतें है। ये झांकियाँ हमें बताती है समय कितना बदल गया है। श्रमिकों की कला से सजता है त्योहारों का ये रूप और परम्परा की ये झांकियाँ, जिन्हें कच्चा माल लाकर बनाया जाता है। इससे परिपुष्ट होकर पकती हैं हमारी पम्पराएँ। अगर ये पर्व त्यौहार न हो तो भावी पीढ़ी के आधुनिक उपकरण और उनके अंधानुकरण में ये परम्पराएँ बिसर जायें ।अनंत चतुर्दशी की ये केवल झांकियाँ नहीं बल्कि परम्पराओं को जीवित और समृद्ध बनाये रखने का हुनर भी है। पर क्या हमने कभी ये सोचा है कि इन आकर्षक झांकियों में उन कलाकारों की कला के साथ श्रम भी जुड़ा होता है, जिनसे उनकी जीविका चलती है।
परंपरा को जीवित रखना हमारी ज़िम्मेदारी : को जीवित रखने के लिए आर्थिक तंगी से जूझते ये श्रमिक झांकियाँ उधारी के पैसों से इतनी सुंदर आकर्षक और ज्ञानवर्धक बनाकर हमारे सामने प्रस्तुत करतें हैं कि उसकी खूबसूरती के पीछे की पृष्ठभूमि को हम समझ ही नहीं पाते। कुछ संस्थाओं द्वारा उन्हें शासकीय रूप से आर्थिक मदद की भी जाती है तो वह समय पर श्रमिकों तक अपने उसी स्वरुप में पहुँचना भी एक चुनौती भरा कार्य है। परम्पराएँ जब सहेजकर समृद्ध की जाती है तो हमारी भी मानवीय जिम्मेदारी है कि उसे जीवन्त बनाये रखने वाले उन श्रमिकों पर एक बार विचार अवश्य करें। कला का जीवन विलासिता में नहीं हो सकता किन्तु बुनियादी ज़रूरतों को किसी भी कलाकर से अलग नहीं किया जा सकता। क्यों न उनकी इस जीविका बन चुकी कला को एक और दृष्टी से परखें। क्या कोई कलाकार केवल कला के सहारे जीवित रह सकता है?
कला जीविका का साधन बने : कला अगर जीविका का साधन भी बन जाय तब जीविका चलाना शायद कुछ सरल हो। त्योहारों में हमारा ध्यान केवल झांकियों पर नहीं उस चमक के पीछे छिपे अँधेरे और आर्थिक तंगी में जीवन जीते श्रमिकों पर भी हो जो मूलभूत आवश्यकताओं के अभाव में अपना जीवन जीतें हैं पर झांकियों की चमक को कम नहीं होने देते। ये भी एक कला हैं। इन ऐतिहासिक परम्पराओं को जीवित रखने के साथ उनकी जीविका जुडी है। झांकियों के निर्माण की कल्पना में उनके अपने जीवन के स्वप्न भी जुड़ें हैं। मिट्टी के दिये बनाने वाले घरों में रौशनी होगी भी या नहीं हम नहीं जानते। हम जो तीज, त्योहार, उत्सव और जयंतियाँ मनाते हैं। इनकी सजावट ऐसे ही हमारे मन पर अपनी अमिट छाप नहीं छोड़ती।
कला का धर्म कला का पोषण : हर उत्सव त्यौहार के पीछे परम्पराओं और ऐतिहासिक गाथाओं को सहेजने की भावना के साथ मानवीय गरिमा को समृद्ध करना भी आवश्यक है। शायद यही कारण है कि एक समय किसी धर्म विशेष के त्यौहार माने जाने वाले पर्व आज सभी धर्मों के लोग आदर के साथ एक सामूहिक उत्सव की तरह मनाते हैं क्योकि उन्हें बनाने वाले कलाकार का धर्म केवल कला को जन्म देकर उसे पोषित करना है। आपकी पूजा की जाने वाली गणेश जी की मूर्ति किसी मुसलमान भाई द्वारा बनाई जाती है। इससे श्रेष्ठ उदाहरण धर्म का और क्या हो सकता है। इन त्योहारों से हम अपने इतिहास से खुद को जोड़ते हैं। जिसकी वजह से इस सृष्टि में इंसानी-समाज का विकास हुआ। हमें सम्मान देने के साथ आभार मानना चाहिए उन श्रमिक कलाकारों का जिनकी कला ने हमारी शुद्ध भावनाओं को अभिव्यक्ति दी।

