इंदौर में ‘अनुकृति रंगमंडल’ के दो स्त्री प्रधान नाटकों का मंचन

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कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। कानपुर के रंग समूह ‘अनुकृति रंगमंडल’ ने इंदौर में अपनी दो स्त्री प्रधान भूमिकाओं वाले नाटकों का मंचन किया। इनके नाम हैं क्रमश: ‘टेररिस्ट की प्रेमिका’ और ‘पुरूष’। दोनों ही नाटकों का सफल मंचन दर्शकों के लिये यादगार अनुभव रहा। यह प्रस्तुतियां दो दिवसीय नाट्य उत्सव के तहत अभिनीत की गईं। आयोजन इंदौर की प्रतिष्ठित कला संस्था ‘सूत्रधार’ ने स्थानीय इंदौर के प्रेस क्लब के राजेंद्र माथुर सभागार में किया। पहली बार इंदौर में अनुकृति के कलाकार: यह पहला मौका था, जब अनुकृति के कलाकारों ने इंदौर में अपनी नाट्य कला का प्रदर्शन किया। इसके लिये अनुकृति के प्रमुख डॉ.ओमेन्द्र कुमार ने आयोजक संस्था ‘सूत्रधार’ के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा, इंदौर में नाटकों का मंचन हमारे लिये सौभाग्य की बात रही। इसका काफ़ी समय से इंतज़ार था। इसके लिये हम कला आयोजनों में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले श्री सत्यनारायण व्यास के आभारी हैं। इंदौर में वे जिस निरंतरता के साथ वे नाट्य और कला आयोजन करते हैं, वह अपने आप में एक मिसाल है,अनुकरणीय बात है। नाइंसाफी के खिलाफ संघर्ष का नाटक: नाट्य उत्सव में प्रस्तुत नाटक ‘पुरूष’ का निर्देशन निशा वर्मा ने किया है। नाटक के लेखक प्रसिद्ध मराठी नाटककार जयवंत दलवी हैं। नाटक में दर्शाया गया है कि नाइंसाफ़ी के लिए आवाज़ उठाने पर अंबिका को किस तरह से संघर्ष करना पड़ता है। परंतु वह हार नही मानती और अदालत का फैसला अपने खिलाफ आने पर बलात्कारी गुलाबराय से अपने तरीके से प्रतिशोध लेती है।  क्या है नाटक पुरूष की कहानी: नाटक की कहानी शुरू होती है अण्णा साहब आप्टे के घर से, जो एक आदर्श शिक्षक हैं। उनके अपनी पत्नी तारा के साथ कुछ वैचारिक मतभेद होते हैं, लेकिन वह हमेशा उनका साथ देती है। अण्णा की बेटी अंबिका एक स्कूल में पढ़ाती है। उसका एक दोस्त है सिद्धार्थ, जो दलितों के हक की लड़ाई लड़ता है। नाटक के अगले सीन में बाहुबली गुलाबराव जाधव की एंट्री होती है, जिसके काले कारनामे कई बार अंबिका सबके सामने उजागर कर चुकी है। गुलाबराव अंबिका से बदला लेने के लिए उसको धोखे से डाक बंगले में बुलाकर बलात्कार करता है। बलात्कार का सदमा और आत्महत्या: यह सदमा अंबिका की मां तारा बर्दाश्त नहीं कर पाती और वह आत्महत्या कर लेती है।  सिद्धार्थ भी उसका साथ छोड़ देता है। जबकि अंबिका की सहेली मथू इस मुश्किल समय में उसके साथ डटी रहती है। मथू अंबिका और अण्णा का हौसला बढ़ाती है और उन्हें प्रतिकार के लिए प्रेरित करती है। अंततः अंबिका गुलाबराव को जिंदगी भर न भूल पाने वाला सबक सिखाती है और इसी के साथ नाटक का पटाक्षेप होता है। मंच और नेपथ्य के कलाकार: नाटक में दीपिका सिंह (अंबिका), संध्या सिंह (मथू), सुरेश श्रीवास्तव (अण्णा साहब), कमल गौड़ (तारा), महेन्द्र धुरिया (गुलाबराव), विजय भास्कर (सिद्धार्थ), सम्राट यादव (इंस्पेक्टर गाडगिल), आकाश शर्मा (पांडु), नरेन्द्र (शिवा), कुशल (बंडा) ने प्रमुख भूमिकाएं निभायी। नाटक का रूपांतरण सुधाकर करकरे ने किया है। नाटक के निर्देशन में डॉ. ओमेंद्र कुमार के साथ कृष्णा सक्सेना का सहयोग रहा। संगीत विजय भास्कर का है। इस नाटक के अब तक 47 मंचन हो चुके हैं। नाटक ‘टेररिस्ट की प्रेमिका’: पुरूष की तरह ही नाटक टेररिस्ट की प्रेमिका भी स्त्री की प्रधान और प्रभावी भूमिका वाला नाटक है। नाटक की नायिका अनीत (संध्या सिंह) का विवाह पुलिस अफसर देवराज (विजयभान सिंह) से होता है। देव की पोस्टिंग पहाड़ी इलाके में है, अनीत खुश है कि आसमान छूते पहाड़, देवदार के वृक्ष, सफ़ेद बादलों के बीच खूबसूरत जीवन का उसका सपना शायद सच हो गया, लेकिन यहां गोलियों के धमाके उसे निराशा करते हैं। उसे पता चलता कि यह इलाका आतंक प्रभावित क्षेत्र है। कहानी में एक अजनबी की एंट्री: तभी कहानी में प्रवेश होता है एक अजनबी (दीपक राज राही) का। उसके हाव-भाव से अनीत उसे देव का कोई पुराना दोस्त समझ बैठती है लेकिन उसका भ्रम जल्दी ही टूटता है। अजनबी बताता है कि मैं एक टेररिस्ट हूं और देव से एक पुराना बदला लेने के लिए उसे खत्म करने आया हूं। इसके बाद नाटक में क्या होता है, यही इस नाटक की खूबी है। रोमांच और संस्पेंस भरा नाटक: नाटक का कथ्य जितना रोमांचक और संस्पेंस भरा है, कलाकारों के अभिनय और दमदार संवादों से दर्शक भी अंत तक बँधे रहते हैं। नाटक में अनीत की मुख्य भूमिका को अनुकृति की अभिनेत्री संध्या सिंह ने जीवंत किया है। अन्य कलाकारों का अभिनय भी सहज, स्वाभाविक था। नाटक के अलग-अलग दृश्यों में पंजाबी गीतों उपयोग किया गया है। संगीत विजय भास्कर रहा और प्रकाश संचालन कृष्णा सक्सेना का था। https://indorestudio.com/

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