कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। इंदौर में पीयूष मिश्रा लिखित नाटक – ‘गगन दमामा बाज्यो’ का मंचन दर्शकों के लिये एक यादगार अनुभव बन गया। 82 साल की एक बुज़ुर्ग महिला मंचन देखकर बेहद भावुक हो गईं। उनकी आँखों से आँसू बह निकले। नाटक के निर्देशक तपन शर्मा के मुताबिक, उन्होंने हम कलाकारों से कहा – ‘फाँसी के बाद भगत सिंह की माँ विद्यावति कौर, उनके साथ कुछ वक्त तक गुना में रहीं थीं। उनके साथ बिताये उन अनमोल पलों की याद, आज भी ताज़ा है’।
भगत सिंह के जीवन की गाथा: ‘सहस्त्रार थियेटर ग्रुप’ ने शहर के रवींद्र नाट्य गृह में इस नाटक का मंचन किया। यह नाटक भगत सिंह की जीवन पर आधारित है। उन्होंने गुलामी के दौर में जिस तरह के हालात का सामना किया। देश के लिये जिस तरह से ख़ुद को कुरबान किया। इस भावप्रवण और संगीतमय नाटक की यही सशक्त कथा है। शहीद भगत सिंह का जीवन और उनके विचार कितने प्रासंगिक और प्रेरक हैं, यह इस नाटक में बेहद प्रभावशाली ढंग से उभरकर सामने आता है।
मंच पर सहस्त्रार के 40 कलाकार: नाटक की बड़ी ख़ूबी इसमें सहस्त्रार के कलाकारों का अभिनय है। नाटक में इस थियेटर ग्रुप के करीब 40 कलाकारों ने मंच और नेपथ्य में रहकर अपना योगदान दिया। नाटक में दस गीत भी हैं जो कहानी को गहरी अभिव्यक्ति देते हैं। कहना ना होगा, पीयूष मिश्रा ख़ुद एक अच्छे कवि और गीतगार भी हैं। यह ख़ूबी उनके नाटक में भी नज़र आती है। इसके लिये तपन और उनकी टीम ने मेहनत भी की। दर्शकों पर इसका असर दिखाई दिया।
आम युवा जैसे थे भगत सिंह: इस नाटक में लेखक ने यह बात भी बताने की कोशिश की है कि भगतसिंह जन्मजात हीरो नहीं थे। वे भी एक आम नौजवान की तरह ही थे। परंतु वे अपने दौर में, आस-पास की घटनाओं के प्रति सजग थे। उन्होंने अपने परिवार, क्रांतिकारी साथियों और दुनिया की किताबों से यह जागरुकता और संवेदनशीलता हासिल की थी। इसका उन्होंने, आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेज़ों के खिलाफ उपयोग किया। अपने जीवन की परवाह ना कर, ख़ुद को भारत माँ के लिये कुरबान कर दिया।
मंच पर प्रस्तुति को लेकर प्रयोग: इस नाटक में अभिनय,गीत-संगीत के साथ ही प्रस्तुति की दृष्टि से भी नवीनता लाने की कोशिश की गई। नाटक की प्रकाश योजना इसी नयेपन और प्रयोगशीलता का अंग रही। वहीं वेशभूषा के लिये सिर्फ सफ़ेद कमीज़, मिल्ट्री पैंट और बूट का इस्तेमाल किया गया। इसके पीछे का निर्देशक का मकसद यह था, कि नाटक में कथा प्रधान रहे,पूरी अभिव्यक्ति में यह पक्ष ही प्रबल रूप से सामने आये।
फाँसी की सज़ा से आरंभ: नाटक दिल्ली के असेम्बली बम कांड के बदले मिली फांसी की सज़ा से शुरू होती है। फिर यह 1921 से लेकर 1931 तक के बीच भगत सिंह की जीवन यात्रा पर ले जाती है। इस दौरान सुखदेव, बटुकेश्वर या आज़ाद से लेकर जेल में उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों और एक नौजवान इंसान के रूप में उनसे जुड़ी बातों,घटनाओं को प्रस्तुत करती है।
दर्शकों के लिये यादगार अनुभव: नाटक के निर्देशक और सहस्त्रार के प्रमुख तपन शर्मा ने बताया -‘हमारी प्रस्तुति की दर्शकों ने सराहना की। उनकी प्रतिक्रिया में, यह नाटक एक यादगार अनुभव रहा’। उन्होंने कहा, ‘हम कलाकारों के लिये वह पल बेशकीमती रहे, जब 82 साल की एक बुज़ुर्ग महिला, नाटक देखकर भावुक हो उठीं। उनकी आँखों में आँसू थे। उन्होंने हमसे कहा – ‘फाँसी के बाद मेरे पति, शहीद भगत सिंह की माँ, विद्यावती जी को अपने साथ गुना लेकर आये थे। उन्होंने तब हमारे साथ कुछ वक्त बिताया था। उनके साथ बिताये उन अनमोल पलों की याद, आज भी ताज़ा हैं’।अपनी बात कहने के बाद उस बुज़ुर्ग महिला ने अपना पर्स निकाला और जो कुछ उनके हाथ में आया, वह उन्होंने हमें भेंट कर दिया और कहा – ‘बहुत अच्छा काम कर रहे हो बेटा, ये बरकत है। संभाल कर रखना’।
शहीद दिवस पर दो शोज़: तपन शर्मा ने बताया, हमने इस नाटक की प्रस्तुति शहीद दिवस पर की थी। इस दिन हमने नाटक के एक के बाद एक दो शोज़ किये। दोनों में ही दर्शकों की संख्या हौसला बढ़ाने वाली रही। नाटक को देखने कवि प्रो.सरोज कुमार के साथ ही सर्वश्री सुशील जौहरी,तपन मुखर्जी,अनिल चापेकर,सुनील मतकर जैसे वरिष्ठ रंगकर्मी भी आये थे, यह बात हमारे लिये मनोबल बढ़ाने वाली थी’।
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