Wednesday, May 13, 2026
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नाटक और साहित्य में शाहिद मिर्ज़ा की बड़ी रूचि थी, इंदौर राइटर्स क्लब की बैठक में बोले प्रो. सरोज कुमार

इंदौर,27 मई ( प्रवीण खारीवाल)। ‘स्व. शाहिद मिर्ज़ा की नाट्य कला और साहित्य में बड़ी रुचि थी। उनकी समीक्षाएं बेहद गंभीर होती थी और रंगकर्म पर उनकी पकड़ थी। ‘रंगशाला’ नाम की एक नाट्य संस्था भी शाहिद ने बनाई थी। इंदौर राइटर्स क्लब की बैठक पत्रकार स्व. शाहिद मिर्ज़ा को याद करते हुए यह बात कवि प्रो.सरोज कुमार ने कही। 27 मई को उनके जन्म दिवस होने की वजह से राइटर्स क्लब का कार्यक्रम उन पर केंद्रित रहा। प्रो.सरोज कुमार ने कहा, स्व. शाहिद ने ही प्रख्यात चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन को इंदौर बुलाया था। वे बेहद पारदर्शी थे और विभिन्न कलाओं में उनकी रुचि थी । नईदुनिया ने उन्हें जर्मनी भेजा था। शाहिद राजेंद्र माथुर के बेहद प्रिय थे। राजेंद्र माथुर के निधन पर उन्होंने कहा था कि मेरे पिता चले गए हैं । इंदौर में वह बेहद लोकप्रिय थे,उनका अपना एक आकर्षण था । उन्होंने कविताएं भी लिखी थीं।

बड़े लोगों से दूर रहते थे – रूख़साना मिर्ज़ा

बैठक में वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने कहा कि शाहिद मिर्जा से उनका हमेशा संपर्क बना रहा। नईदुनिया के बाद में जब जयपुर गए, तब भी उनके संपर्क में रहे । शाहिद के पिता जी द्वारा लिखी गई एक चिट्ठी को वैदिक जी ने बेमिसाल बताया। इस चिट्ठी का वाचन स्व.शाहिद की बहन पत्रकार रुखसाना मिर्जा ने किया । पत्रकार रुखसाना मिर्जा ने कहा कि वे अक्सर अपनी मां को चिट्ठी लिखते थे और उसकी भाषा अलग होती थी। कभी हिंदी, कभी उर्दू । मां को लिखी चिट्ठी का वाचन भी रुखसाना जी ने इस अवसर पर किया और उन्होंने शादी के बाद के किस्से भी बताये। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से उनकी दोस्ती थी। वे उनके नजदीक रहते थे लेकिन अशोक गहलोत के कई बार कहने के बावजूद उन्होंने उन्हें अपने घर आमंत्रित नहीं किया। वे बड़े लोगों से दूर रहना ही पसंद करते थे । उनके अपने तेवर थे। उन्होंने शाहिद मिर्जा की लिखी हुई कविताएं भी सुनाई ।

शाहिद बहुत नेक इंसान थे – सुशील दोषी

पद्मश्री और हिंदी कमेंट्रेटर सुशील दोषी जी ने कहा कि हिंदी में मैं उस जमाने में कमेंट्री करता था और शाहिद मिर्जा उज्जैन में पढ़ते थे। उन्होंने मुझे एक कार्यक्रम में वहां बुलाया था । उन्होंने मुझे उस समय यह बात कही थी कि एक कलाकार और लेखक का सत्य एक आम आदमी के सत्य से अलग होता है ।शाहिद बहुत नेक इंसान थे और उनमें सेंस ऑफ ह्यूमर अच्छा था। उनमें एक अजीब सी छटपटाहट थी और उनमें असीम संभावनाएं थी। शाहिद मूलतः कलाकार थे लेकिन फिर भी वे जो करना चाहते थे, शायद वे कर नहीं पाये । उन्होंने कहा कि किसी दोस्त की मौत पर ऐसा लगता है कि हम भी कहीं-कहीं टुकड़े में मर गए हैं उन्होंने कहा कि मौत पर हम भाषण देते हैं लेकिन हम कभी यह नहीं सोचते कि जीते जी उनके लिए हमने क्या किया। बैठक में पूर्व विधायक  अश्विन जोशी ने कहा कि होलकर कॉलेज में हमारी गैंग थी, उसमें आदिल कुरैशी और शाहिद मिर्जा आते थे। शाहिद भाई ने मुझे उनके नाटकों के टिकट की बिक्री के लिए भी कहा था। उनके साथ मेरा बड़ा अच्छा समय गुजरा । उस महफिल में कभी कोई गाना गाता था और शाहिद भाई मालवी में बेहद अच्छी बातें किया करते थे।

राजेंद्र माथुर की परंपरा को आगे बढ़ाया- कीर्ति राणा

वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा ने कहा कि बहती हवा सा था वो । वे बेहद बेफिक्र इंसान थे। मालवी में वे गालियां देते थे और उन्हें अच्छी लगती थी ।  उन्होंने बेबाक पत्रकारिता की।  नईदुनिया भास्कर और पत्रिका में अपनी पहचान बनाई । उन्हें खाने के साथ ही लिखने का बहुत शौक था ।  भास्कर में  राष्ट्रपति वेंकटरमन की मेरी चर्चा को फ्रंट पेज पर छापा था । वे पूरी तरह से पत्रकारिता को समर्पित थे और राजेंद्र माथुर जी को उनपर बहुत भरोसा था। लेखक और कवि राजकुमार कुंभज ने कहा कि उन्होंने विभिन्न कलाओं में भ्रमण किया और वे प्रतिबद्धता के साथ काम करते थे वे खबर के महत्व को समझते थे । राजेंद्र माथुर की परंपरा उन्होंने आगे बढ़ाया भाषा की संजीदगी शाहिद मे थी, शाहिद की मंडली ने कंधे पर बिठाकर मेरा जुलूस निकाला था । उनमें रचनात्मक बेचैनी थी लेकिन वह जल्दी चले गए।

फ़नकार एक बढ़िया संस्था थी- रवींद्र व्यास

कवि,पत्रकार रवींद्र व्यास ने कहा कि फनकार संस्था सबसे अच्छी संस्था थी और यही संस्था मकबूल फिदा हुसैन को इंदौर लाई। उस दौरान शाहिद भाई ने एक्टिंग वर्कशॉप भी लगाई थी य़ उन्होंने एक किस्सा भी सुनाया जिसमें उन्होंने कहा कि मकबूल फिदा हुसैन जब इंदौर आए और फनकार की तरफ से उन्होंने पेंटिंग बनाई तो वे उसे कला महाविद्यालय को समर्पित करना चाहते थे लेकिन शाहिद भाई ने  कहा कि  इसे फनकार के लिए दीजिए बाद में वह पेंटिंग आदिल भाई के पास रह गई ।  शाहिद भाई मैं इतनी उदारता थी कि वह अपने साथियों को बड़ा बनाते थेय़ पत्रकारिता का यह गुण अब कहीं लुप्त हो गया है । उनमें रचनात्मक आवारगी भी थी । वे फोकस करते तो उनकी कई पुस्तकें आती । श्री अभय वर्मा ने कहा कि भास्कर में वे ट्रेनी  थे और उस दौरान उनका मुझे बहुत सहयोग मिला पत्रकारिता की चमक उनमें थी । उन्होंने मुझे कई मौके दिए और मेरे ऊपर हाथ भी रख दिया था, उनका सहयोग में हमेशा याद रखूंगा।

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