रिपोर्ट: हरनाम सिंह, चित्र: प्रशांत सोनोने, इंदौर स्टूडियो|मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित अनूपपुर का ‘बलराज साहनी सभागृह’ हाल ही में जन-प्रतिबद्ध कला और वैचारिक मंथन का केंद्र बना। यहाँ भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) का 10वां राज्य सम्मेलन संपन्न हुआ, जिसमें प्रदेश भर से आए कलाकारों, लेखकों और चिंतकों ने देश-दुनिया के मौजूदा हालातों पर गंभीर विमर्श किया। सम्मेलन में नाटकों, जनगीतों और पोस्टरों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं को बचाने का संकल्प दोहराया गया। आयोजन समिति की अध्यक्ष पल्लविका पटेल और महासचिव लक्ष्मी खेड़िया ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि बिरादराना संगठनों के शुभकामना संदेशों का वाचन कोषाध्यक्ष श्रद्धा सोनी द्वारा किया गया।
सदाचार का तावीज़’ और व्यवस्था पर तीखा प्रहार: सम्मेलन के आकर्षण का केंद्र इप्टा इंदौर की नाट्य प्रस्तुति रही। हरिशंकर परसाई की कालजयी कहानी पर आधारित नाटक ‘सदाचार का तावीज़’ ने दर्शकों को हंसाने के साथ-साथ व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ों पर सोचने को मजबूर किया। गुलरेज़ ख़ान के निर्देशन और विनीत तिवारी व सारिका श्रीवास्तव की पटकथा ने अपनी सादगी से गहरा प्रभाव छोड़ा। फिल्म अभिनेता राजेंद्र गुप्ता और निर्देशक अनिल रंजन भौमिक जैसी हस्तियों की उपस्थिति में मंचित इस नाटक में शब्बीर हुसैन, विशाल यादव, आयुष अहिरवार और हूर बानो सैफी सहित कई कलाकारों ने शानदार अभिनय किया। इसके अतिरिक्त, राजेंद्र गुप्ता द्वारा प्रस्तुत धूमिल की कविता ‘पटकथा’ के एकल मंचन और इप्टा लखनऊ की ‘दास्तान-ए-अशफाक’ जैसी प्रस्तुतियों ने इतिहास और समकालीन विसंगतियों को बखूबी उभारा।
वैश्विक संकट और इप्टा की ऐतिहासिक भूमिका: उद्घाटन सत्र में इप्टा के राष्ट्रीय कार्यवाहक अध्यक्ष राकेश वेदा ने वैश्विक उथल-पुथल पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने इप्टा के इतिहास का स्मरण कराते हुए कहा कि जिस तरह इस संगठन का जन्म फासीवाद और युद्ध के विरोध में हुआ था, आज फिर वही भूमिका निभाने की ज़रूरत है। उन्होंने साम्राज्यवादी नीतियों की कड़े शब्दों में निंदा की। इसी क्रम में राष्ट्रीय सचिव मंडल के सदस्य शैलेंद्र ने अफ़सोस ज़ाहिर किया कि वियतनाम युद्ध के दौरान साम्राज्यवाद का विरोध करने वाला भारत आज वैश्विक हिंसा पर मौन है। उन्होंने ज़ोर दिया कि लोक-मंगल की कामना ही कला की धुरी होनी चाहिए। संस्कृतिकर्मियों को मानवता की रक्षा का दायित्व उठाना होगा।
संवेदनशीलता को बचाना ही असली संस्कृतिकर्म: राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने अपने संबोधन में कहा कि आज पूँजीवादी ताकतें आम आदमी की संवेदनशीलता खत्म करना चाहती हैं ताकि वह अन्याय पर खामोश रहे। उन्होंने मणिपुर की त्रासदी और फिलिस्तीन व ईरान की जनता के साहस का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्कृतिकर्म केवल नाटक करना नहीं, बल्कि इंसानियत और मानवीय विवेक के संस्कार पैदा करना है। वहीं, प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य सचिव सत्यम पांडे ने संस्कृति को बाज़ारवाद से बचाने की चुनौती पर बात की। वरिष्ठ रंगकर्मी सुश्री वेदा राकेश ने गौरी लंकेश और कलबुर्गी जैसे बुद्धिजीवियों की शहादत का ज़िक्र करते हुए कहा कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सच की लड़ाई हमेशा जारी रहती है।
वैज्ञानिक चेतना और मानवीय मूल्यों का विमर्श : सम्मेलन के वैचारिक सत्रों में खगोल विज्ञानी अमिताभ पांडे ने संस्कृति और विज्ञान के अंतर्संबंधों की व्याख्या करते हुए वैज्ञानिक चेतना के अभाव में बढ़ते उत्पीड़न पर चिंता जताई। ‘समय के साखी’ की संपादक आरती ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को एक वृहत्तर मानवीय मूल्य बताते हुए कला के माध्यम से मानवीय पीड़ा को आवाज़ देने की वकालत की। इप्टा के प्रांतीय महासचिव शिवेंद्र शुक्ला ने कहा कि वर्तमान में झूठ को सच बनाकर प्रचारित किया जा रहा है, ऐसे में प्रतिरोध के स्वरों को मज़बूत करना अनिवार्य है। इसके साथ ही हिमांशु राय और हरिओम राजोरिया ने स्थानीय नाट्य संस्थाओं की भूमिका और संगठन निर्माण पर अपने विचार रखे।
साझा सांस्कृतिक प्रतिरोध और नवीन कार्यकारिणी: सम्मेलन में प्रतिनिधियों द्वारा कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव सर्वानुमति से पारित किए गए। इनमें इज़राइल की आक्रामक नीतियों का विरोध, गाज़ा की जनता के साथ एकजुटता, और फिल्म ‘वॉइस ऑफ हिंद रजब’ पर लगे प्रतिबंध की निंदा शामिल थी। साथ ही, वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो की रिहाई और क्यूबा पर लगे प्रतिबंधों को हटाने की मांग भी अंतरराष्ट्रीय प्रस्तावों के माध्यम से की गई।
पोस्टर प्रदर्शनी और जनगीतों की गूँज: सम्मेलन के दौरान सभागार में युद्ध-विरोधी पोस्टरों और फिलिस्तीन के हालातों को दर्शाती प्रदर्शनियां लगाई गईं, जिन्हें अशोक दुबे और विनीत तिवारी ने तैयार किया था। अशोकनगर, इंदौर, छतरपुर और गुना की इकाइयों ने कबीर, फैज़, दुष्यंत कुमार और राजेश जोशी की रचनाओं को जनगीतों के रूप में प्रस्तुत कर वातावरण को ऊर्जावान बनाए रखा। अंत में, अनूपपुर की सड़कों पर एक विशाल रैली निकाली गई, जहाँ नारों और गीतों के माध्यम से युद्ध, जातिवाद और सांप्रदायिकता के विरुद्ध एकजुटता का संदेश दिया गया।
कार्यकारिणी का सर्वानुमति से गठन: आगामी वर्षों के लिए कार्यकारिणी का सर्वानुमति से गठन किया गया। इसमें हरिओम राजोरिया को अध्यक्ष, शिवेंद्र शुक्ला को महासचिव और नीरज खरे को कोषाध्यक्ष की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। संगठन के मार्गदर्शन हेतु गठित संरक्षक मंडल में हिमांशु राय, डॉ. विद्या प्रकाश और विजय नामदेव को शामिल किया गया है, जबकि विनीत तिवारी, अनिल दुबे, सीमा राजोरिया, हरनाम सिंह, पंकज दीक्षित और विजेंद्र सोनी अध्यक्ष मंडल के सदस्य निर्वाचित हुए। सचिव मंडल में अभिषेक अंशु, सारिका श्रीवास्तव, हूरबानो सैफी, गुलरेज़ खान और आयुष सोनी को स्थान मिला, वहीं रामदुलारी शर्मा, पल्लविका पटेल और आदित्य रुसिया सहित अन्य सदस्यों को प्रांतीय कार्यकारिणी में शामिल किया गया है। आगे पढ़िये – ‘गुरु-शिष्य परंपरा योजना’ में नये नियमों से कला जगत में खलबली – https://indorestudio.com/guru-shishya-parampara-scheme-new-rules-controversy/

