वक़ार क़ादरी, मुंबई। यशवंत नाट्य मंदिर में ‘इप्टा’ (IPTA) के 53वें इंटरकॉलेजिएट ड्रामा मुकाबले का फाइनल उर्दू-हिंदी रंगमंच के लिए नई उम्मीद लेकर आया। खचाखच भरे सभागार में युवा कलाकारों और दर्शकों के भारी उत्साह ने यह साबित कर दिया कि नई पीढ़ी के हाथों में थिएटर की मशाल पूरी तरह सुरक्षित है और रंगमंच का इक़बाल आज भी बुलंद है। कॉलेज के छात्र-छात्राओं के साथ उनके अभिभावक और रंगमंच के गंभीर दर्शक इस आयोजन में बड़ी संख्या में मौजूद थे।
इक़बाल नियाज़ी की कोशिशों से सिलसिला जारी:
इस शानदार प्रतियोगिता को देखने का मौका मशहूर उर्दू नाटककार, निर्देशक और इप्टा मुंबई के सक्रिय सदस्य इक़बाल नियाज़ी की वजह से मिला। इप्टा के ड्रामा मुकाबलों को देखने का जो सिलसिला लंबे समय से रुक गया था, वह नियाज़ी की कोशिशों से पिछले तीन वर्षों से फिर जारी है। आज के युवा कलाकारों को कॉलेज स्तर पर नाटक करते देखना अपने आप में एक दिलचस्प अनुभव था। उनके विषय, उनकी सोच और मंच पर समस्याओं को पेश करने का अंदाज़ हमें लगभग पचास वर्ष पीछे की यादों में ले जाता है। साथ ही यह एहसास भी होता है कि इन वर्षों में समाज और उसकी समस्याओं को देखने के नजरिए में कितना बदलाव आया है।
84 वर्षों से भारतीय रंगमंच की मशाल ‘इप्टा’:
इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन (IPTA) 84 वर्षों से भारतीय रंगमंच की मशाल जलाती आ रही है। कॉलेजों के बीच आयोजित होने वाली इस प्रतियोगिता का यह 53वां वर्ष था। शुरुआती दौर में विभिन्न कॉलेजों ने कुल 21 नाटक प्रस्तुत किए थे। फाइनल मुकाबले में शामिल छह नाटकों ने पर्यावरण, सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों और आज के दौर के कई महत्वपूर्ण मुद्दों को मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
“स्वतंत्र सौभाग्य” का रहा दबदबा:
प्रतियोगिता में सेंट जॉन कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के नाटक “स्वतंत्र सौभाग्य” का दबदबा रहा। इसे सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति के लिए पृथ्वीराज कपूर ट्रॉफी प्रदान की गई। इसी कॉलेज की जिया राउत को शौकत कैफ़ी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, अमित पाटिल को आर.एम. सिंह सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और “स्वतंत्र सौभाग्य” को ख्वाजा अहमद अब्बास सर्वश्रेष्ठ पटकथा का पुरस्कार मिला। कॉलेज ने ईशान आर्या सर्वश्रेष्ठ लाइटिंग ट्रॉफी भी जीती।
“दि मक्का” को दूसरी सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति:
वहीं, सतीश प्रधान ज्ञान साधना कॉलेज के नाटक “दि मक्का” को दूसरी सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति के लिए मनमोहन कृष्ण ट्रॉफी और असाधारण प्रदर्शन के लिए बलराज साहनी ट्रॉफी मिली। उषा प्रवीण गांधी कॉलेज के नाटक “जब वी मेट” को कैफ़ी आज़मी क्रिटिक अवॉर्ड और एम.एस. सथ्यू सर्वश्रेष्ठ सेट डिजाइन पुरस्कार से नवाज़ा गया। फाइनल की जूरी में राजेंद्र गुप्ता, आसिफ शेख और वरिष्ठ पत्रकार बेला जे. सिंहानिया शामिल थीं।
महान रंगकर्मियों की विरासत को सलाम
इप्टा ने अपने महान मार्गदर्शकों और रंगकर्मियों की स्मृति को पुरस्कारों के माध्यम से जीवित रखा है। पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, कैफ़ी आज़मी, ख्वाजा अहमद अब्बास, ए.के. हंगल, सागर सरहदी और एम.एस. सथ्यू जैसे दिग्गजों के नाम पर दिए जाने वाले पुरस्कार नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का प्रतीक हैं।
ऐसे हुआ था नाटकों का चयन
इससे पूर्व एलिमिनेशन राउंड में 21 ड्रामों में से छह का चयन किया गया था। मुकाबले के सीनियर जज इक़बाल नियाज़ी ने बताया था कि 21 में से 11 बेहतरीन ड्रामों को शॉर्टलिस्ट किया गया था। उनमें से हर ड्रामा फ़ाइनल के लायक था, लेकिन समय की कमी और अन्य मजबूरियों के कारण सिर्फ़ छह नाटकों को चुना गया। जजों के पैनल में इक़बाल नियाज़ी के अलावा अंकिता पांडे और ओम प्रकाश शर्मा शामिल थे। इप्टा के सीनियर सदस्य रमेश तलवार ने बताया कि फ़ाइनल में जगह न बना पाने वाले कॉलेजों के लिए भी मुख़्तलिफ़ ज़मरों में कई अवॉर्ड्स और नकद इनाम रखे गए थे। इस पूरे सफल आयोजन में इप्टा के जूनियर फ़नकारों की टीम ने भी अहम किरदार अदा किया। अब नाटक में भी वास्तनेगुइया – https://indorestudio.com/fanda-nach-play-review/
‘इप्टा’ के 53वें ड्रामा मुकाबले में चमके युवा
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