हक़्क़ानी अल-क़ासमी, इंदौर स्टूडियो। उर्दू अदब और नाटकों की दुनिया में इक़बाल नियाज़ी एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने नाटकों के जरिए समाज की नब्ज़ को बखूबी पकड़ा है। उनके नाटक न केवल वर्तमान ‘पोस्ट-ट्रुथ’ युग की सच्चाइयों को उजागर करते हैं, बल्कि अत्याचार, शोषण और सांप्रदायिकता जैसे ज्वलंत मुद्दों पर सीधा प्रहार भी करते हैं। उनका नाट्य संग्रह “बहुत देर कर दी” उनकी गहरी रचनात्मक दृष्टि का प्रमाण हैं, जो दर्शकों को वैचारिक और भावनात्मक धरातल पर झकझोर कर रख देते हैं।
वैचारिक संघर्ष के द्वार खोलता है रंगमंच:
कहानी अमूमन लेखक की तय दिशा में चलती है, जबकि नाटक में पात्रों के आपसी मानसिक टकराव और संवादों से कई विचारधाराएं सामने आती हैं। इक़बाल नियाज़ी कहानियां भी लिखते हैं, लेकिन उनकी मुख्य पहचान उनके उर्दू नाटकों से है। वे आधुनिक नाट्य तकनीक और उसकी कलात्मक जरूरतों को बेहद बारीकी से समझते हैं।
कहानियों का अत्यंत प्रभावशाली नाट्य रूपांतरण:
वे वर्तमान दौर की चुनौतियों को समझते हुए समाज की स्थितियों का सजीव चित्रण करते हैं। उनके संग्रह “बहुत देर कर दी” में सुरेन्द्र प्रकाश की “बिजूका” और असगर वजाहत की “शाह आलम कैंप की रूहें” जैसी मशहूर कहानियों का बेहतरीन नाट्य रूपांतरण है। इन प्रस्तुतियों में मूल कहानियों के प्रतीक समकालीन संदर्भों (चाहे वह बिहार हो, मुंबई या दिल्ली) में और भी अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं।
सांप्रदायिकता और हिंसा पर सीधा प्रहार:
नियाज़ी के नाटकों के केंद्र में शोषण, सांप्रदायिक दंगे, आतंकवाद और आम जीवन के संघर्ष जैसे विषय गहराई से रचे-बसे हैं। “सफ़र सिंदबाद का” और उनकी मोनोलॉग श्रृंखला कर्म और परिणाम के सिद्धांत पर जोर देती है। वे समाज को चेतावनी देते हैं कि ‘यह एक्शन और रिएक्शन है… नफ़रत की इस आग में कोई नहीं बचेगा, न हिन्दू, न मुसलमान।’
हबीब और इस्मत के जीवन का सशक्त चित्रण:
उन्होंने रंगकर्मी हबीब तनवीर और लेखिका इस्मत चुगताई पर प्रभावशाली जीवनीपरक नाटक (नाट्य-कोलाज) भी लिखे हैं, जो किसी भी लंबे लेख से अधिक सशक्त हैं। इनके जरिए दोनों विभूतियों के संघर्ष और रचना-यात्रा को समझा जा सकता है। नियाज़ी के नाटकों की सबसे बड़ी खूबी उनकी भाषा है, जो हमेशा पात्रों की सामाजिक पृष्ठभूमि और उनके मानसिक स्तर के बिल्कुल अनुरूप होती है। आपको बता दें कि इकबाल नियाज़ी शॉर्ट फिल्मों के निर्माण भी जुटे हैं और उनकी फिल्मों को पुरस्कार भी मिले हैं। आगे पढ़िये – खुल जा सिम सिम:रंगमंच की पाठशाला में खिलता बचपन https://indorestudio.com/rangmanch-ki-pathshala/
इक़बाल नियाज़ी के नाटकों में धड़कता है समकालीन समाज
RELATED ARTICLES

