ग्वालियर 15 मई, इंदौर स्टुडियो। जो मज़ा हाथ में कि़ताब लेकर पढ़ने का है वो भला कंप्यूटर और इंटरनेट पर कहां ? हाथ में पुस्तक का अहसास परमानंद में लीन होने जैसा है। आज भी पुस्तक संस्कृति कायम हैं हालांकि आज के दौर में इस संस्कृति को बचाना ज़रूरी है। इंटरनेट ने सामूहिकता को खत्म किया है लेकिन किताब इसे बचाती है। इंटरनेट का कितना रचनात्मक उपयोग किया जाए ये बड़ी चुनौती है। लक्ष्मीबाई समाधि के सामने मैदान में जारी एनबीटी के पुस्तक मेले में यह बात वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश पंकज ने कही। पुस्तक मेले में इंटरनेट के ज़माने में पुस्तक संस्कृति पर एक आयोजन किया गया था। इसमें कई प्रमुख साहित्यकार,लेखक और संस्कृतिकर्मी शामिल हुए।
लाइब्रेरी से लाने का आनंद नेट पर कहां : प्रो.चारूचित्रा
साहित्यकार प्रो चारुचित्रा ने कहा कि इंटरनेट ने जीवन को बहुत सुगम बनाया है। दूरी का अहसास कम कर दिया है। हम इंटरनेट पर बहुत आश्रित हो गए हैं। हमें अहसास की जरूरत होती है, व्यक्तियों की ज़रूरत होती है लेकिन इंटरनेट हमें यह नहीं दे सकता। उन्होंने कहा कि इंटरनेट के सकारात्मक और नकारात्मक दोनो पक्ष हैं। किसी समय पुस्तकालय से किताबें लाना और पढ़ना जो आंनद देता था वो नेट नहीं दे सकता। किताबों को छूने का आनंद होता है उसका कोई विकल्प नहीं होता।किताबें संस्थान जैसी होती हैं जो बहुत कुछ सिखातीं हैं। इंटरनेट सूचना देता है किताबें ज्ञान देती हैं।
किताबें ज्ञान का रास्ता : सुभाष अरोरा
सेवानिवृत जनसंपर्क अधिकारी सुभाष अरोरा ने कहा कि किताबें जिज्ञासु के लिए उसकी माला के मनके हैं जो रास्ता ज्ञान के लिये खोलते हैं। किताबें जीवन का अहम हिस्सा हैं। इंटरनेट ने नई चुनौती दी है। ज्ञान के विस्तार का काम कर रहा है लेकिन वो किताब का विकल्प नहीं बन सकता। किताब का अपना महत्व है। किताब से मानसिक स्तर पर अनुभूती की जो यात्रा हम तय करते हैं, उसकी तुलना नहीं हो सकती।ज्ञान की परंपरा किताबों से ही पल्लवित और पोषित की है। जीवन का अटूट हिस्सा हैं। इंटरनेट के दौर में किताबों से रिश्ता टूटना नहीं चाहिए। किताबें के अंदर जाने से अनदेखे समय को जान सकते हैं। धार्मिक ग्रंथ जो यात्रा करके हम तक पहुंचे हैं उनने हमें जोड़ने का काम किया है।
रंगकर्म का पहला प्रेम पुस्तक : गीतांजलि गिरवाल

रंगकर्मी गीतांजलि गिरवाल ने कहा कि रंगकर्म के लिए सबसे पहले किताब से प्रेम करना सिखाया जाता है। किताब के पन्ने पलटते हुए उंगलियों को जो अनुभूति होती है उसका विकल्प कम्यूटर नहीं हो सकता है। हम लिखित पर विश्वास करते हैं। जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में विश्व पुस्तक मेले में बीते बरस में दस अरब यूरो का कारोबार हुआ मतलब किताब का मोह खत्म नहीं हुआ है।उन्होंने कहा कि एक क्लिक पर भले ही तमाम जानकारी मिल जाती है लेकिन उसमें से सब कुछ विश्वसनीय नहीं होता। किताबें भरोसे का माध्यम हैं। किताबें इंटरनेट के बावजूद ज़रूरी हैं। विचार विमर्श का संचालन राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के संपादक ललित किशोर मंडोरा ने किया।
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