विशेष प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। जबलपुर शहर के साहित्य और कला जगत ने प्रतिष्ठित कथाकार और पहल पत्रिका के संपादक स्व. ज्ञानरंजन को शिद्दत से याद किया। श्रद्धांजलि सभा में अवधेश बाजपेयी द्वारा बनाया गया ज्ञानरंजन का पोट्रेट स्मृति स्वरूप रखा गया। उसपर पुष्पांजलि अर्पित की गई। शहर के प्रबुद्ध जन और संस्कृति कर्मियों ने उनके शब्द-संसार को साहित्य के लिए अनमोल ख़ज़ाना करार दिया। उनके प्रति आत्मीय भावनाएं व्यक्त कीं। बता दें कि ज्ञानरंजन का विगत 7 जनवरी 2026 को निधन हो गया था। वे 89 वर्ष के थे और काफी समय से बीमार थे। इस बीच उनकी पत्नी श्रीमती सुनयना ज्ञानरंजन अस्पताल में भर्ती हैं।
‘अन्नपूर्णा होटल इन’ में आयोजित स्मृति सभा: स्थानीय अन्नपूर्णा होटल इन के सभागार में स्मृति सभा आयोजित हुई। चार बजे से लोगों का आना शुरू हुआ और कुछ ही देर में हॉल पूरा भर गया—कई लोग बाहर खड़े होकर भी शामिल रहे। ज्ञानरंजन जी एक सार्वजनिक व्यक्तित्व थे; उनका हर व्यक्ति और संस्था से व्यक्तिगत नाता रहा, इसलिए समाज के हर वर्ग की उपस्थिति दर्ज हुई।
आरंभ, संचालन और संवेदनाओं का दौर: सभा की शुरुआत विवेचना के सचिव हिमांशु राय ने की और संचालन के लिए सहयोगी बांके बिहारी ब्यौहार को आमंत्रित किया। ब्यौहार ने 1961 से जी.एस. कॉलेज में साथ रहे वरिष्ठ साहित्यकार कुंदनसिंह परिहार को आमंत्रित किया।
कहानियों और उनकी भाषा से चर्चा में रहे: कुंदनसिंह परिहार ने कहा कि ज्ञानरंजन अपनी कहानियों और उनकी भाषा के कारण उस दौर में विशेष चर्चा में रहे—वे मिलनसार थे, साहित्य के अतिरिक्त भी उन्होंने खूब मित्र बनाए और लोगों के सुख-दुःख में साथ दिया।
साहित्यिक स्मृतियाँ और प्रभाव: राजेन्द्र दानी ने भरे गले से कहा—ज्ञान जी जितने बड़े साहित्यकार थे, उतने ही बड़े मनुष्य थे; उन्होंने ‘पहल’ के सहयोगी के रूप में बहुत सिखाया और भरोसा किया। राजेन्द्र चंद्रकांत राय ने कहा कि कॉलेज के दिनों में ज्ञान जी से परिचय के कारण उनका साहित्य से गहरा नाता बना—ज्ञानरंजन की कहानियाँ परंपरागत कहानियों से अलग थीं।
ज्ञान जी ने लेखन के लिये किया प्रेरित: इंदौर से आए तरुण भटनागर ने बताया कि उनके शुरुआती दौर में ज्ञान जी की कहानियों ने उन्हें प्रभावित किया; ज्ञान जी ने उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया और मार्गदर्शन दिया।
समाज के हर व्यक्ति की चिंता: पंकज स्वामी ने उनके मानवीय पक्ष को रेखांकित किया। उन्होंने बताया ज्ञान जी समाज में हर किसी की चिंता करते थे; उन्होंने उनके पुत्र से अलग से बातचीत कर उसकी परेशानियाँ समझीं। अपने यहाँ सब्ज़ी देने आने वाले की लड़की के लिए लैपटॉप खरीदा; कॉफी हाउस में बैठकर भी वे लोगों के व्यवहार और व्यक्तिगत समस्याओं पर ध्यान देते थे।
सहयोगियों और मित्रों की निजी यादें: ज्ञान जी के निकट सहयोगी मनोहर बिल्लोरे ने कहा कि उनसे परिचय के बाद उनका जीवन बदल गया—वे साहित्य के अध्येता बने और पहल पत्रिका के सहयोगी के रूप में प्रतिदिन उनके साथ बैठते थे। राजीव शुक्ल ने बताया कि सत्तर के दशक में जबलपुर आकर ज्ञानरंजन से मुलाकात के बाद से साहित्यिक, व्यक्तिगत और पारिवारिक—हर स्तर पर गहरे संबंध बने।
कबीर समूह के पीछे ज्ञानरंजन जी: इंदौर से आए सुरेश पटेल ने भावुक होकर बताया कि जीवन के शुरुआती दौर में ज्ञान जी ने उन्हें प्रेरित किया—“तुम कबीर पर काम करो।” आज कबीर समूह की अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों के पीछे ज्ञान जी की प्रेरणा रही।
मृत्यु को उत्सव की तरह लेना चाहिए: हिमांशु राय ने याद किया कि सुदीप बैनर्जी के निधन पर ज्ञान जी कहते थे—मृत्यु को उत्सव की तरह लिया जाना चाहिए। उन्होंने एक शानदार जीवन जिया; लेखक के रूप में वे अमर रहेंगे। उन्होंने अपने संपर्क में आए हर व्यक्ति से व्यक्तिगत संबंध बनाए और उसकी चिंता की। वे आलोचना और अनुशासन—दोनों में स्पष्ट थे; उन्होंने सिखाया कि हर आयोजन कितने सुनियोजित तरीके से होना चाहिए—इस उम्र में भी वे अपने कार्यक्रम का कार्ड घर-घर जाकर बाँटते थे। ‘पहल’ संगोष्ठी के रूप में उन्होंने एक सुदृढ़ परंपरा कायम की।
प्रेरणा, मार्गदर्शन और कला-दृष्टि: अवधेश बाजपेयी ने कहा—मैं गाँव से आया; ज्ञान जी से मिला तो लगा मानो अभिभावक मिल गया—उन्होंने कला की समझ और दृष्टि दी। डॉ. निशा तिवारी ने कहा कि प्रारंभ में कॉलेज के कामों के कारण संपर्क हुआ, बाद में उन्होंने मेरे लेखन की प्रशंसा की।
रचना-संशोधन, नाटक और पारिवारिक संबंध: विवेक चतुर्वेदी ने कहा कि ज्ञान जी ने हमेशा प्रोत्साहित किया और आलोचना के माध्यम से रचनाओं का परिमार्जन कराया। डॉ. सुधीर तिवारी ने बताया कि मेडिकल कॉलेज के दिनों में ज्ञानरंजन ने उनके नाटकों का निर्देशन किया था। श्रीमती गीता तिवारी ने ज्ञानरंजन से अपने पारिवारिक संबंधों को याद किया। डॉ. स्मृति शुक्ला, श्रद्धा सुनील, कुंदन सिद्धार्थ, डॉ. राधेश्याम सुहाने और डॉ. अनामिका तिवारी ने भी उनके जीवन में ज्ञान जी के महत्व पर अपने विचार रखे।
परिवार की उपस्थिति और सामूहिक शोक: इस श्रद्धांजलि सभा में सैकड़ों लोग शामिल हुए और अंत तक रुके रहे—किसी का जाने का मन नहीं था। ज्ञानरंजन के पुत्र शांतनु, पुत्री वत्सला, बहू, पोती ऋतुपर्णा और नातिन सुकृति भी सीधे अस्पताल से आकर शामिल हुए।
इस बीच ज्ञान जी के निधन के बाद से उनकी पत्नी श्रीमती सुनयना ज्ञानरंजन अस्पताल में भर्ती हैं। उनका भी शहर के अनेक परिवारों से आत्मीय जुड़ाव रहा है। प्रशंसक आप दोनों के प्रति अभिभावकों की तरह स्नेह रखते हैं। स्मृति शेष: 21 नवंबर 2023 को ज्ञानरंजन के जन्म दिवस पर उनकी पत्नी के साथ हिमांशु राय और बांके बिहारी ब्योहार।
सांस्कृतिक संस्थाएँ और दस्तावेज़ीकरण: श्रद्धांजलि सभा में डॉ. छाया राय, आकांक्षा सिंह, मदन तिवारी, मनु तिवारी, अजय यादव, देवेन्द्र सुरजन, प्रकाश दुबे, गंगाचरण मिश्रा, बसंत मिश्रा, पंकज कौरव, दिनेश चौधरी, विवेक श्रीवास्तव, रीना शुक्ला, तनु राय, डॉ. भारती शुक्ला, नरेश जैन, रमेश सैनी, युनूस अदीब, तपन बैनर्जी, नवीन चौबे, मुरलीधर नागराज, डॉ. एस.के. सिंह, सतीश रेड्डी, वेदप्रकाश अधौलिया, देवेन्द्र श्रीवास्तव आदि उपस्थित रहे।
श्रद्धांजलि सभा जबलपुर की सामूहिक पहल: पहल परिवार, अन्विति, विवेचना, विवेचना रंगमंडल, समागम रंगमंडल, नाट्यलोक, रंगाभरण, सुरपराग, म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रगतिशील लेखक संघ, कालजयी अनिल कुमार श्रीवास्तव फाउंडेशन आदि के सदस्य उपस्थित रहे। सभा के लिये विवेक चतुर्वेदी ने श्रद्धांजलि सभा का बैनर बनाया। पंकज स्वामी ने पूरे कार्यक्रम का फेसबुक लाइव किया और अजय धाबर्डे ने फोटोग्राफ़ी की। आगे पढ़िये- आलोक की वो ख़ूबियां जिनसे मुझे हुआ था प्यार – शोभा चटर्जी https://indorestudio.com/alok-chatterjee-barsi-shobha-chatterjee-tribute/
अपने ‘ज्ञानरंजन’ को जबलपुर ने शिद्दत से किया याद
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