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क्या आपने कभी सोचा है कि भारतीय सिनेमा में गूंजते हुए संवाद, नाच-गाना और भव्य दृश्य कहाँ से आए? जवाब है— पारसी थियेटर। वही विधा जिसने सोहराब मोदी, पृथ्वीराज कपूर, मास्टर विट्ठल, रूबी मायर्स और डब्लू एम. खान जैसे दिग्गजों को गढ़ा और बॉलीवुड की नींव रखी। आज जब यह परंपरा दम तोड़ रही है, तब जबलपुर के ‘तरंग प्रेक्षागृह’ में पंद्रह मार्च दो हज़ार छब्बीस की शाम एक इतिहास रचने जा रहा है। पैतालिस दिनों की कड़ी मेहनत के बाद नाट्य-प्रेमियों के लिए तैयार किया गया है पारसी शैली में – ‘सीता बनवास’। जबलपुर के सजग नाट्य दर्शक, इस इतिहास के साक्षी बनेंगे। इस बारे में हमें और अधिक जानकारी दे रहे हैं राइटर जर्नलिस्ट शकील अख़्तर।
उन्होंने लिखा है, सीता वनबास का मंचन केवल एक नाटक का मंचन नहीं, बल्कि एक दम तोड़ती विरासत को बचाने का महायज्ञ है। जबलपुर के प्रतिभाशाली नाट्य निर्देशक अक्षय सिंह ठाकुर ने यह प्रशंसनीय प्रयास किया है। उन्होंने जबलपुर में इस रंग परंपरा को लेकर पैतालिस दिनों की एक थियेटर वर्कशॉप की और उसमें शामिल कलाकारों के साथ सौ साल यह पारसी ड्रामा तैयार किया है। मंच पर तीस से अधिक कलाकार इस नाटक को प्रस्तुत करेंगे। तरंग प्रेक्षागृह में इसकी प्रस्तुति के लिये विशेष तैयारियां की गई हैं।
आपको बता दें, हाल ही में ‘भारत रंग महोत्सव’ (दिल्ली) में वरिष्ठ रंग निर्देशक अतुल तिवारी के निर्देशन में भी ‘सीता वनवास’ का मंचन हुआ था। उन्होंने भी पारसी शैली में नाटक को मंचित किया लेकिन इस शैली का उन्होंने संतुलित या प्रतीकात्मक रूप में ही उपयोग किया है। लेकिन अक्षय सिंह ठाकुर ने इस प्रयोग से एक कदम आगे बढ़कर इसे पारसी थियेटर के उसी स्वरूप में प्रस्तुत करने की तैयारी की है, जैसा कि वह अपने सुनहरे दौर में रहा था।
मध्यप्रदेश में पारसी थियेटर के पुनरुद्धार की यह दूसरी बड़ी कोशिश है। इससे पहले ग्वालियर के अयाज़ खान ‘परिवर्तन नाट्य समूह’ के ज़रिए ‘लैला मजनूँ’ जैसे नाटकों के मंचन से इस परंपरा की मशाल जला चुके हैं। अब उसी सिलसिले को जबलपुर आगे बढ़ा रहा है। इस नाटक का संगीत इसकी आत्मा है, जिसे तैयार किया है पारसी थियेटर के ‘लिविंग लीजेंड’ ज़फ़र संजरी ने। ज़फर संजरी वो शख्सियत हैं जिनका जन्म ही पारसी थियेटर के आंगन में हुआ। उन्होंने सत्ताइस से अधिक पारसी नाटकों का सफल निर्देशन किया है। दिलचस्प बात ये भी है कि ज़फ़र साहब इस नाटक के निर्देशक अक्षय सिंह ठाकुर के रंग-गुरु भी रहे हैं।
गुरु के संगीत और शिष्य के निर्देशन वाली ये जुगलबंदी जबलपुर के रंगमंच के लिए एक दुर्लभ उपहार है। ग्वालियर में अयाज़ ख़ान की कोशिशों के पीछे भी ज़फ़र संजरी जी का योगदान रहा है। यही वो परंपरा भी है जिसने आधुनिक भारतीय रंगमंच और सिनेमा की आधारशिला रखी।
पारसी थियेटर के आरंभिक काल के दिग्गजों में आगा हश्र कश्मीरी, खुरशेदजी बालीवाला, सोहराब मोदी, राधेश्याम कथावाचक और आधुनिक दौर के स्तंभ मदन लाल कपूर रहे हैं। मदनलाल जी प्रसिद्ध अभिनेता अन्नू कपूर और निर्देशक रणजीत कपूर के पिता थे। मदन लाल जी ने पारसी थियेटर की परंपरा को अपनी घुमंतू थियेटर कंपनी से जीवंत किया था। आज अन्नू कपूर, रणजीत कपूर और ज़फर संजरी जैसे चंद नाम ही इस परंपरा के जानकार रह गये हैं।
आज़ादी के बाद निर्देशकों में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली के बीएम शाह का नाम एक मिसाल के रूप में सामने आता है। उन्होंने ‘यहूदी की लड़की’ का मंचन कर पारसी थियेटर को नई प्रतिष्ठा दी। बीवी.कारंत ने बैकग्राउंड स्कोर में पारसी शैली के संगीत का सदुपयोग किया। रणजीत कपूर ने भी उसी अंदाज़-ए-बयां और काव्यात्मकता को पारसी थियेटर में जीवंत किया। हबीब तनवीर का नया थियेटर में भी इसका प्रभाव रहा। नज़्म और शायराना अंदाज़ में संवाद कहे गये। एमके रैना ने पारसी थियेटर के क्लासिक नाटकों पर काम किया। इसे मनोरंजन से आगे विचार का मंच बना दिया। मगर स्टाइलाइज़ेशन, लफ़्ज़ों की अदायगी और म्यूज़िक का सभी ने पूरा खयाल रखा।
अब यही अंदाज़ ए बयां जबलपुर के अक्षय सिंह ठाकुर लेकर आये हैं। उन्होंने एक तरह से इस बात का भरोसा दिलाया है कि पारसी थियेटर आगे बढ़ता रहेगा। यह रंग-परंपरा विलुप्त नहीं होगी। वे करीब दो साल से इस प्रोजेक्ट के बारे में योजना बना रहे थे। आख़िर उन्होंने अपने थियेटर ग्रुप रंगाभरण के लिये पारसी थियेटर की वर्कशॉप की और उर्दू थियेटर के शेक्सपियर आगा हश्र कश्मीरी का नाटक ‘सीता-बनवास’ तैयार कर दिया।
पारसी शैली में संवाद बोले नहीं, बल्कि लय में कहे और गाये जाते हैं। मंच पर सुर्ख रंगीन पर्दे, रथ, नाव चलने और धरती के फटने जैसे अद्भुत दृश्य नज़र आते हैं। इसमें रिकॉर्डेड म्यूज़िक नहीं, बल्कि हारमोनियम और तबले की थाप पर कलाकारों की सजीव गायकी सुनाई देती है। शायराना और काव्यात्मक संवाद दर्शकों के दिल में उतर जाते हैं। माना जाता है कि दमदार एक्टर बनने के लिये पारसी थियेटर की ट्रेनिंग ज़रूर लेना चाहिये, इसके मूल तत्वों को समझना चाहिये।
अक्षय सिंह कहते हैं— “सीता बनवास, केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि राज धर्म और प्रेम के संघर्ष का एक आईना भी है। हम उस स्वर्णिम युग को पुनर्जीवित कर रहे हैं ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों को देख सके।” अक्षय दो हज़ार आठ से रंगमंच पर सक्रिय हैं। उन्होंने दो हज़ार अठारह में MPSD से प्रशिक्षण लिया। हैदराबाद यूनिवर्सिटी से थियेटर आर्ट्स (डिज़ाइन और डायरेक्शन) में एमए किया। वे न केवल एक मंझे हुए निर्देशक हैं, बल्कि एक प्रशिक्षित ‘तबला नवाज़’ भी हैं। अक्षय अपने नाटक ‘स्वांग:जस का तस’ के लिये संगीत और निर्देशन का मेटा पुरस्कार जीत चुके हैं। उनके इस नाटक की 25 वें भारत रंग महोत्सव में भी बेहद प्रशंसा हुई है। वे
ज़ाहिर है कि जबलपुर के दर्शकों के लिये तरंग प्रेक्षागृह में पंद्रह मार्च की शाम सिर्फ एक नाटक देखने की शाम नहीं है, बल्कि उस परंपरा को अपना समर्थन देने की शाम है जिसने भारतीय कला जगत को पहचान दी। इस दिन इस प्रेक्षागृह को मध्य प्रदेश विद्युत मंडल की तरफ से एक सौगात भी मिलने जा रही है। शो से पहले यहां पर बुज़ुर्ग दर्शकों के लिये लिफ्ट का शुभारंभ होगा। इसकी काफी समय से मांग की जा रही थी। कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिये हर संभव मदद देने वाले विद्युत मंडल परिवार की यह भेंट प्रशंसनीय है। नाट्य गृह में आने वाले वयोवृद्ध दर्शकों को अब सीढ़ियां चढ़ना नहीं पड़ेगा। इसी तरंग सभागार में मुझे विवेचना के आयोजन में हाल ही में शामिल होने को मिला था। मैं इस बात से परिचित हूँ कि लिफ्ट के शुभारंभ का यहां के दर्शक बेहद प्रसन्नता से स्वागत करेंगे। इंदौर स्टूडियो की रिपोर्ट।

