जबलपुर में टिकट लेकर नाटक देखते हैं दर्शक: प्रीता माथुर ठाकुर

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शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। जबलपुर के सजग दर्शक, टिकट लेकर नाटक देखने आते हैं। दूसरी तरफ़ कुछ शहरों में आज भी ‘पास’ मांगे जाते हैं। मुंबई की बात अलग है, मगर जबलपुर जैसे शहर में यह बात देखकर दिली ख़ुशी होती है। बेशक, इसका श्रेय विवेचना के ‘रंग-संस्कारों’ और इसकी 50 वर्षीय ‘रंग यात्रा’ को जाता है’। यह बात ख्यात एक्टर-डायरेक्टर और स्व. दिनेश ठाकुर की पत्नी प्रीता माथुर ठाकुर ने कही। वे जबलपुर में विवेचना के नाट्य समारोह में 8 नवंबर की शाम अपना नाटक ‘आपस की बात’ प्रस्तुत करेंगी। इसके निर्देशन के साथ वे इसमें मुख्य भूमिका निभाती हैं। ‘आपस की बात’ दिनेश जी का रूपांतरण: दिनेश ठाकुर के निधन के बाद प्रीता माथुर ठाकुर ही ‘अंक’ थियेटर ग्रुप की बतौर प्रेसिडेंट कमान संभालती हैं। दिनेश जी की विरासत के साथ ही, वे अंक को नये प्रयोगों से सजाने और नया विस्तार देने में निरंतर प्रयासों में जुटी हैं। ‘आपस की बात’ नाटक के बारे में उन्होंने बताया – ‘यह नाटक दिनेश ठाकुर जी का पसंदीदा रूपांतरण रहा है। उन्होंने बड़ी दिलचस्पी से इसे लिखा और इसके किरदारों के बारे में गहराई से सोचा’। दिनेश जी के जन्मदिन उनके नाटक का मंचन: प्रीता जी ने बताया- ‘8 अगस्त 2025 को हमने दिनेश जी का 78 वां जन्म दिन मनाया था। हमने तय किया था कि हम उनके जन्मदिन पर, उनके रूपांतरित किये गये इस नाटक को करेंगे। मुंबई के वेदा कुनबा थियेटर और एनएसीपीए में इसके हमने 2 शोज़ किये। अब विवेचना के फेस्टिवल में इसका तीसरा शो प्रस्तुत कर रहे हैं’। 4 कहानियों पर आधारित प्रस्तुति: उन्होंने कहा- ‘दिनेश जी ने ‘आपस की बात’ के रूपांतरण के लिये मूल रूप से रूसी साहित्यकार एंटोन चेखव की 7 कहानियों का चयन किया था। सभी शोषण (Exploitation) की थीम वाली कहानियां थी। उनमें से हमने अपने निर्माण के लिये 4 कहानियां ही चुनी हैं। इस तरह हमने कॉम्पेक्ट शो तैयार किया है – बिना इंटरवेल के। विश्वास है जबलपुर के सुधि दर्शक इसे पसंद करेंगे’। ‘अंक’ और ‘विवेचना’ का गहरा नाता: ‘विवेचना और अंक’ के रिश्तों के सवाल पर उन्होंने बहुत सी बातें कहीं। प्रीता जी ने कहा- ‘अंक और विवेचना’ का गहरा नाता रहा है। हिमांशु राय और काशी जी (स्व. वसंत काशीकर) दिनेश जी के पुराने दोस्त रहे हैं। बहुत पहले से तीनों, एक-दूसरे को जानते थे। 2006 में जब काशी जी मुंबई आये, तब उनसे मुलाक़ात हुई और बहुत सी बातें भी। तय हुआ कि ‘विवेचना’ के मंच पर ‘अंक’ का एक नाटक ज़रूर होगा। विवेचना के मंच पर ‘हम दोनों’: उन्होंने बताया – ‘उस समय ‘हम दोनों’ नाटक तैयार था। उसमें मैं और दिनेश ठाकुर जी ही काम कर रहे थे। नाटक के मुंबई में ओपनिंग शोज़ हुए थे। मध्यप्रदेश के इंदौर और उज्जैन में इस नाटक को ज़बरदस्त रेस्पांस मिला था – ख़ासकर इंदौर में। इंदौर के दर्शकों ने जिस तरह से उस नाटक को पसंद किया था, उससे हमें बड़ा हौसला मिला। हमें लगा कि हमने बेहतर प्रदर्शन किया है। उसी को हमने ‘विवेचना’ के दर्शकों के लिये प्रस्तुत किया। वह प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा। मिल-जुलकर साझा नाट्य समारोह: प्रीता जी ने बताया, नाटक ‘हम दोनों’ की प्रस्तुति के बाद से ‘विवेचना और अंक’ में साझा रंगमंच की समझ बनी। एक साल बाद ही हमने विवेचना के लिये ‘मित्र’ नाटक प्रस्तुत किया। तय किया कि हम जबलपुर जाते रहेंगे। दिनेश जी के निधन के बाद, काशी जी हमसे मिलने आये थे। तब उन्होंने कहा था- ‘हमें आपस में रंगमंच का रिश्ता बनाये रखना है। आप जबलपुर अपने नाटक लाते रहें। अफ़सोस कि अब काशी जी भी हमारे बीच नहीं। वे विवेचना के विद्वान रंग-निर्देशकों में से एक थे’। दिनेश ठाकुर मेमोरियल थियेटर फेस्टिवल: प्रीता जी ने कहा – ‘काशी जी के कहने के बाद, हमने जबलपुर में ‘जात ही पूछो साधु की’ ड्रामा किया। हमने दिनेश ठाकुर मेमोरियल थियेटर फेस्टिवल भी किया। ‘विवेचना’ के अपने प्रॉडक्शन के साथ। यह एक मिला-जुला उपक्रम था। हमने ‘बीवियो का मदरसा, अटके,भटके,लटके सुर’ के साथ एक सेमिनार भी किया। हमने विवेचना के मंच पर ‘हाय मेरा दिल’ और उसके बाद ‘हमारी नीता की शादी’ मंचित किया। इस साल हम ‘आपस की बात’ करने जा रहे हैं। अंक’ को मैं संभालना नहीं चाहती थी: प्रीता माथुर ठाकुर ने कहा- ‘दिनेश जी ने मुझ से कहा था कि आगे ‘अंक’ को संभालना तुम्हारी ज़िम्मेदारी होगी। तब मैंने साफ़ मना कर दिया था। मैंने कहा था कि एक्टर्स को मैनेज करना मेरे बस की बात नहीं। एडमिनिस्ट्रेशन तक ठीक है। परंतु 2008 में जब दिनेश जी बीमार पड़े, तब समझ में आया कि बैठे रहने से काम नहीं चलेगा। मैंने साथियों से कहा, हम लोग अपना काम शुरू करें। तभी दिनेश जी भी एक्टिव हो सकेंगे। हालांकि वे कभी अच्छे नहीं हुए- लेकिन 2008 से 2012 के उन 4 सालों में मैंने ‘अंक’ को पूरी तरह से संभालना सीख लिया’। 50 साल पूरे होंगे भी या नहीं: प्रीता माथुर ने याद किया- ‘दिनेश जी ने एक दिन कहा, ‘अंक’ के 50 साल पूरे होने वाले हैं, पता नहीं तब तक ये सिलसिला चलेगा या नहीं’? उस वक्त मैंने उनसे कहा था, चाहे कुछ हो-50 साल तक तो हम इसे चलाएंगे ही। मेरी इस बात से दिनेश जी बड़े ख़ुश हो गये थे। उम्मीद जगाने वाली बातों को सुनकर, उन्हें अच्छा लगता था’। इस तरह ‘सोलो प्ले’ हुआ तैयार: उन्होंने बताया– ‘दिनेश जी की सेहत उनका साथ नहीं दे रही थी, तब भी वो एक नया प्रॉडक्शन करना चाहते थे। मैं जानती थी कि बड़े नाटक का भार और निर्देशन उनके लिये मुश्किल होगा। इसलिये मैंने उनकी इच्छा का खयाल रखते हुए, एक ‘सोलो प्ले’ के बारे में सोचा। ताकि दिनेश जी उसे आसानी से डायरेक्ट कर सकें। इसी दौरान मैंने सुनीता बुद्धिराजा के एक कविता संग्रह को पढ़ा। उसमें महाभारत के काल से लेकर पांडवों के स्वर्ग जाने का संदर्भ है, उनपर सुनीता जी की कविताएं हैं। मैंने ये कविताएं दिनेश जी को सुनाईं, उनका चयन और संपादन किया। फिर उनके निर्देशन में ‘सोलो प्ले’ की चुनौती स्वीकार की। इस तरह 2010 में ‘प्रश्न पांचाली’ नाम के एकल नाटक का मंचन शुरू हुआ। इसमें मंच पर अकेले काम करना, मेरे लिये एक अलग अनुभव था’।मुंबई समेत कुछ शहरों में करेंगे फेस्टिवल: प्रीता जी ने ‘अंक’ के 50 साल पूरे होने की योजना पर भी पहली बार चर्चा की। उन्होंने कहा- ‘1 अक्तूबर 2026 को अंक की स्थापना के 50 साल पूरे होने वाले हैं। इसकी तैयारी हमने शुरू कर दी है। हम तब तक, 2-3 नये नाटक तैयार कर लेंगे। ‘सीता वनवास’ नाटक तैयार हो चुका है। पुराने नाटक भी हैं। हमारा इरादा है कि हम स्वर्ण जयंती का एक फेस्टिवल मुंबई के अलावा दूसरे शहरों में भी करें। इनमें इंदौर, उज्जैन, जबलपुर, जोधपुर, बीकानेर, देहरादून, अहमदाबाद, हैदराबाद जैसे शहर शामिल हैं। प्लानिंग तो है, अब देखते हैं- आगे क्या सिचुएशन बनती है’।बड़ी टीम वाले नाटक अब नहीं: प्रीता जी ने नये प्रयोगों के सवाल पर कहा- ‘अब बड़े नाटक की जगह, चार-पांच कैरेक्टर वाले इंटेस नाटक करने का मन है। बडी टीम वाले नाटक फिलहाल नहीं करना चाहती। एक्टर्स को बाँधकर रखना संभव नहीं है। इस संघर्ष से निजात मिलना ही अच्छा है। हां, छोटे, स्ट्रांग, फोर्सफुल और पोर्टेबल प्ले करेंगे। अब देखते हैं ये कितना हो पायेगा। एक्टर्स के मामले में हमारे ‘अंजी’ जैसा बेहतरीन नाटक बंद हो गया है। विजय तेंदुलकर जी का यह एक अच्छा नाटक है, जिसे बहुत अच्छा रेस्पांस मिला और कला संतुष्टि भी। मगर एक्टर्स और रिप्लेस करने की मुश्किल इसके सामने खड़ी है।विविध भूमिकाओं को जीने का मौका मिला: पिछले 38 सालों में 50 से अधिक नाटकों के सैकड़ों प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाली इस अभिनेत्री ने कहा- ‘ मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे विविध भूमिकाओं वाले एक से बढ़कर एक नाटक करने को मिले। जैसे ‘जिस लाहौर’ में वृद्धा की भूमिका, ‘प्रश्न पांचाली’ में बहुत से किरदार, ‘अटके, भटके, लटके सुर’ में एक सिंगर का किरदार, ‘सीता वनवास’ की सीता…ऐसे ही कई बेहतरीन नाटक और किरदार। वाकई थियेटर में मेरी वंडर फुल जर्नी रही है। मगर हर नये किरदार के लिये आपको ‘एबीसीडी’ से ही शुरू करना पड़ता है। तभी उसमें नई ऊर्जा और ताज़गी आती है। अब अभिनय के साथ मुझे निर्देशन के ज़रिये भी काफ़ी कुछ क्रियेट करने का मौका मिल रहा है। मैं इस ज़िम्मेदारी को भी ख़ुशी के साथ निभा रही हूँ’। थियेटर सिखाता है मैनेजमेंट और मल्टी टास्किंग: प्रीता जी एक कॉरपोरेट हैं, उसके साथ थियेटर ग्रुप की प्रबंधक, अभिनेत्री और डायरेक्टर। उन्होंने फिल्मों और टीवी के लिये भी समय-समय पर बहुत से काम किये हैं। मेरे इस सवाल पर कि वे ये ‘सब कैसे मैनेज कर लेती हैं’? प्रीता जी ने रंगमंच के प्रति अपने जज़्बे को ज़ाहिर करते हुए कहा- ‘मैं ‘मंच’ पर होने के लिये सबकुछ कर लेती हूं। यही इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है’। ऊर्जा से भरी इस थियेटर पर्सनैलिटी ने कहा-‘थियेटर आपको मैनेजमेंट के साथ मल्टी टास्किंग सिखाता है। स्टेज की बातें ज़िदंगी में बड़ी काम आती हैं। जैसे- आप जिस वक्त में हैं, उसी वक्त में जीना ज़रूरी है। जैसे मंच पर होता है, अगर आपने अपना पल गवाँ दिया तो गया आपका डॉयलाग…जीवन भी ऐसा ही है, चूके तो फिर गये! आगे पढ़िये – क्या है थियेटर एक्टिंग के जादुई मंत्र, यहां सिर्फ टैलेंट काम नहीं आता!   https://indorestudio.com/theatre-acting-ke-mantra/

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