अरविन्द शर्मा, इंदौर स्टुडियो डॉटकॉम। एक रंगकर्मी की जिजीविषा तभी पूरी होती है, जब वह अपना रंगकर्म हर हाल में पूरा करे। अभावों की दुहाई न दे। कोई भी कृति चाहे वह पुस्तक के रूप में हो, नाटक के रूप में या फिर सिनेमा के पर्दे पर, यदि उसमें दम है तो वह दर्शकों तक या पाठकों तक पहुँचती है और इसी बात का साक्षी बना नर्मदा मंदिर परिसर। जहाँ 5 जुलाई को के जी त्रिवेदी ने बलराम गुमास्ता की कविताओं का कोलाज नाटक की शक्ल में प्रस्तुत किया। इसको नाटक के रूप में ब्रजेश अनय ने बखूबी तराशा है।
कविताओं को नाटका का रूप देना सरल नहीं : मैं इस नाटक का कायल इसलिए हुआ क्योंकि नाटक की कविताएँ, उसे नाटक में तब्दील करने का सलीका और निर्देशन के स्तर पर कसावट मेरे लेखकीय मन को छू गई। कविताओं को नाटक का रूप देना सरल नहीं है। इसके लिए कविताओं की लय के साथ दृश्यों को बांधना तथा एक कविता के छोर को दूसरी कविता के हाथ में ऐसे सौंप देना जैसे माँ अपने बच्चे का हाथ शिक्षक के हाथ में सौंप देती है, यही सब उस नाटक की सरसता को बनाये रखता है। माँ से गहरे प्रेम और बेटी के भोलेपन के ताने-बाने के बीच बुना गया यह नाटक निश्चित रूप से बेटी के सवालों के जवाब ढूंढने के लिए हम सभी को मजबूर करता है। कविताओं के प्रवाह को अपने में समेटे है यह नाटक ‘बेटी के सवाल’।
बेटी के सवाल और मासूम जिज्ञासा : इन कविताओं में चिन्ता है, चिन्तन है, भाव हैं, विचार हैं। जहाँ एक ओर माँ के देहावसान की सूचना पर उसकी यादें परत दर परत सामने आने लगती हैं, वहीं दूसरी ओर बेटी के सवाल चारों ओर से घेरे रहते हैं। बेटी के सवाल और उसकी जिज्ञासा इतनी मासूम है कि उसे टाला भी नहीं जा सकता। इन कविताओं में प्रकृति प्रेम स्पष्ट झलकता है। पर्यावरण, नदी, जड़ी-बूटियाँ, मूर्ति विसर्जन जैसे विषयों को कविता में पिरोते हुए लोगों के समक्ष सवाल उठाये हैं, प्रकृति को लेकर एक चिन्ता व्यक्त की है। माँ-बेटे के सम्बन्ध, दादी-पोती के मध्य स्नेह जैसे मानवीय रिश्तों को कविता में करीने से पिरोया गया है। के जी त्रिवेदी के निर्देशन को उनके अभिनेताओं जिस शिद्दत से अपने अभिनय से निभाया है वह काबिले तारीफ है। किसी अच्छे शायर की पंक्तियों के साथ यही कह सकता हूँ कि एक टेम्प्रेरी स्टेज बनाकर इतना बेहतरीन नाटक खेला जाना तो यही सिखाता है –
हम तो दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है / जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा।

