(शकील अख़्तर)। दिल्ली में बायोपिक फ़िल्म मेकर और वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की, ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह पर लिखी क़िताब ‘कहाँ तुम चले गये’ का विमोचन हुआ। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित इस कार्यक्रम में जगजीत सिंह के छोटे भाई करतार सिंह ने चुनिंदा ग़ज़लें सुनाईं। इंटरनेशनल मेलोडी फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में गाँधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत, सिक्किम के पूर्व राज्यपाल और लेखक श्री वाल्मिकी प्रसाद सिंह,आकाशवाणी के पूर्व उप-महानिदेशक और कवि डॉ.लक्ष्मी शंकर वाजपेयी,ओएनजीसी के वरिष्ठ अधिकारी हरीश हवाल मंच पर प्रमुख रूप से मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ.हरीश भल्ला ने किया। राजेश बादल की यह पुस्तक मंज़ुल प्रकाशन हाउस ने पब्लिश की है। विमोचन से पहले ही उनकी क़िताब की कई प्रतियाँ कार्यक्रम में पहुँचे लोगों ने ख़रीद ली।
ग़ज़लों की ज़रख़ेज़ ज़मीन थे जगजीत: कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथी कुमार प्रशांत ने कहा, ‘जगजीत वो ज़रख़ेज़ ज़मीन थे जिनपर शायरों की लिखी ग़ज़लों के बीज गिरे और लहलहाती हुई फ़सलें पैदा हुईं। शब्द और भाव को पकड़ने में उन्हें महारत हासिल थी। जगजीत ने शब्दों और उनमें गूँथे हुये भावों को इतनी कोमलता से छुआ कि ग़ज़लें खिलखिलाने लगी। बेशक उन्होंने दूसरे शायरों की रचनाओं को चुनकर, उन्हें अपने रागों की पालकी में बिठाकर, हम तक पहुँचाया। परंतु उन्होंने अपनी लाजवाब गायन कला के ज़रिये इस काम को इतनी ख़ूबी से किया कि हम सुनने वाले पहले से और बेहतर हुये। किसी भी कला का यह काम भी यही होता है। बड़ी बात ये है कि जगजीत सस्ते नहीं थे। उन्होंने स्तरीय काम किया। आज हम ग़ज़लों की दुनिया को बड़ी आसानी से दो हिस्सों में बाँट सकते हैं। पहला, जगजीत सिंह के आने से पहले और दूसरा जगजीत के आने के बाद।
गाँधी के राम में ग़ज़लों की ध्वनि: श्री प्रशांत ने कहा, ‘एक बार मुंबई में मेरा ‘गाँधी के राम’ शीर्षक से व्याख्यान हुआ था। व्याख्यान देकर जब मैं मंच से नीचे उतरा,तब जगजीत सिंह से मुलाक़ात हुई। वे कहने लगे, भैया आपकी कही बातों से बहुत सी ग़ज़लें निकलती हैं। यह उनका नज़रिया और समझ थी। उस वक्त हमारा थोड़ा परिचय हुआ। बाद में मिलने,बैठने का मौका भी मिला। एक बार वे कहने लगे, आपकी ग़ज़लें भी बताइये मुझको। मैंने कहा, मैं वैसा लिखता नहीं। कहने लगे, वो मैं बताऊँगा कि जो आप लिखते हैं, वह ग़ज़ल है या नहीं। वो दिन कभी आया नहीं। आज जब दस साल बाद हम ये प्रोग्राम कर रहे हैं। लगता नहीं कि वे हमसे दूर चले गये हैं। उन्होंने निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल ‘जब किसी से कोई गिला रखना’ गाई थी। उसका एक शे’र मुझे आजकल बहुत महसूस होता है – ‘घर की तामीर चाहे जैसी हो / इसमें रोने की जगह रखना’। …हम सबके घरों में, हमारे समाज में और हमारे देश में आज उन जगहों की बहुत कमी हो गई है, जहाँ इंसान को बैठकर अपने बारे में रोने का कुछ समय मिले। जगजीत रोने का वह समय देते हैं। इसीलिये जगजीत कभी जाते नहीं। वो हमारे साथ ही रहते हैं।
नवाचार ने जगजीत को जगजीत बनाया: कवि डॉ. लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने कहा, ‘ग़ज़ल गायिकी में नवाचार की वजह से जगजीत सिंह को शुरू में आलाचनाओं का शिकार ज़रूर होना पड़ा। मगर उनके नये काम ने ही उनकी अलग धारा और पहचान बनाई । देखते-देखते वे मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र-छात्राओं के चहेते सिंगर बन गये। उन्होंने बड़ी हिम्मत से अपनी ग़ज़ल गायिकी में ‘इनोवेशन’ को बढ़ाया। सारंगी,तबला,ढोलक की जगह गिटार,वायलिन,की बोर्ड को जगह दी। हमारे समय की संवेदनाओं और भावनाओं को अभिव्यक्त करने वाली रचनाओं को चुना। वे सिर्फ सिंगर नहीं बल्कि एक इंस्टीट्यूशन थे। मैंने आकाशवाणी में 35 साल की सेवाओं के दौरान गायकों को जगजीत साहब की तर्ज पर कुछ नया करने का आग्रह किया। ऐसा कहने का मतलब ये नहीं है कि पुराना ना गाया जाये। ख़ुद जगजीत सिंह ने टप्पा जैसी बहुत सी मिट्टी की चीज़ें गाई हैं। राम पर गाया उनका भजन सबसे ज़्यादा रायल्टी देने वाला हिट नंबर है। परंतु उन्होंने समय की चुनौती को पहचान कर काम किया। ग़ज़ल को नई जनरेशन में मकबूल बना दिया।
राजेश बादल आधुनिक पत्रकारिता का फरिश्ता: डॉ. वाजपेयी ने कहा, ‘जगजीत सिंह पर राजेश बादल की क़िताब, एक बड़ा दस्तावेज़ है। यह बहुत ही सराहनीय काम है। बादल जी ने अपने सम्बोधन में जगजीत सिंह को फरिश्ता कहा, मगर मैं उन्हें आधुनिक पत्रकारिता का फरिश्ता कहता हूँ। उन्होंने पत्रकारिता और किताबों के साथ ही,संगीत, साहित्य और सिनेमा के कलाकारों पर बायोपिक फिल्में बनाकर देश को एक बड़ा ख़ज़ाना सौंपा है। उसका आकलन कब होगा, पता नहीं। मगर उन्होंने वह भी एक बहुत अद्भुत कार्य किया है।
जज़्बातों को दिलों में उतार देने वाला फ़नकार: ओएनजीसी के वरिष्ठ अधिकारी हरीश हवाल ने कहा, सुनने वाले के दिलो-दिमाग़ में ग़ज़ल के जज़्बातों को किस अंदाज़ में पहुँचाना है, जगजीत सिंह ने अपनी गायिकी में सबसे पहले यह सुनिश्चित किया। यह ठीक वैसा ही है, जैसे खयाल गायिकी में भाव को प्रधानता दी जाती है जबकि ठुमरी,दादरा में शब्द को। वे ऐसे फ़नकार रहे जिन्होंने ग़ालिब जैसे शायर को भी आम लोगों के दिलों में गहरे तक उतार दिया’। उन्होंने कहा, ‘मैं जगजीत सिंह का उनके पहले अलबम ‘अनफॉरगेटेबल’ से फ़ैन रहा हूँ। इसी तरह से मैं निष्पक्ष पत्रकारिता के प्रतिमान, राजेश बादल की लेखनी का भी प्रशंसक हूँ। बादल साहब ने जिस सहजता से सरल शब्दों में जगजीत साहब के सफ़र को पिरोया है, वह बेहद दिलचस्प है। सरल भाषा में लिखना सबसे मुश्किल होता है। जब आप जगजीत पर लिखी उनकी पुस्तक को पढ़ेंगे तब आप उसकी लय में बहते चले जायेंगे।
अनूठा था जगजीत सिंह की मदद का तरीका: राजेश बादल ने कहा, ‘जगजीत सिंह एक बेहतरीन ग़ज़ल गायक ही नहीं एक बेहद हमदर्द इंसान भी थे। वे लोगों की गुपचुप आर्थिक मदद किया करते थे। मदद करने का उनका तरीका भी बहुत अलग था। वे हफ्ते-दस दिन में, रूपयों से भरे लिफाफे तैयार किया करते थे। किसी में दस हज़ार रूपये होते, किसी में पचास हज़ार। किसी में एक लाख तो किसी में ढाई लाख। इन लिफाफों के साथ दर्जनों लोगों के नाम-पतों की एक सूची होती। वे रूपयों वाले उन लिफाफों के साथ वह सूची भी बनाकर एक बैग में रख देते। यह करने के बाद वे, मुंबई के वाशी में एक रेस्टारेंट चलाने वाले अपने करीबी मित्र जसबीर सिंह को फोन करते। कहते, जसबीर गड्डी लेकर आ जा। जसबीर समझ जाते कि उन्हें जगजीत सिंह के दिये लिफाफे लेकर, ज़रूरत मंदों के घरों तक पहुँचाना है। वे ऐसे लोग होते जिन्हें पैसों की सख़्त ज़रूरत होती। उनके घरों में जाते और उनके नाम का बंद लिफाफा सौंप देते। बिना यह बताये कि लिफाफे में रुपये किसने भेजे हैं।
निधन पर नहीं जले
सैकड़ों घरों में चूल्हे: बादल ने कहा, जहाँ तक जगजीत सिंह की गायिकी की बात है, उन्होंने वहाँ से अपना सफ़र शुरू किया, जहाँ पर बेगम अख़्तर का सफ़र ख़त्म हुआ था। तब ग़ज़ल का आसमान सूना था, ग़ज़लें महफिलों तक सीमित थीं। मगर जगजीत सिंह ने अपने फ़न से ग़ज़लों को घर-घर तक पहुंचा दिया। उन्होंने आज के हालात और मुद्दों पर बेशक़ीमती ग़ज़लें गाकर पुराने ग़ज़ल गायकों से आगे बढ़कर अपना फ़ासला तय किया। माशूका से मुहब्बत की बातें गुज़रे दौर की बात हो गई। उनकी ग़ज़लों में आम आदमी के मुद्दे छाने लगे। उनकी चुनी गई रचनाओं में गाँधी वाले राम भी नज़र आये और भारतीय तहज़ीब,अध्यात्मिकता और चिंतन के दर्शन भी हुये। मिसाल के लिये कुछ ग़ज़लें याद कीजिये।…आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यों है / अब मैं राशन की क़तारों में नज़र आता हूँ / वो रुलाकर हँस न पाया देर तक / मैं न हिंदू न मुसलमान मुझे जीने दो..।
छोटे भाई के सुरों में जगजीत सिंह की आवाज़: कार्यक्रम में जगजीत सिंह के छोटे भाई करतार सिंह जब मंच पर साजिंदों के साथ जगजीत की ग़ज़लों को आवाज़ दी, एक बारगी वहम हुआ कि क्या हम जगजीत सिंह को ही सुन रहे हैं !… करतार सिंह ने ग़ज़लों का सुरीला सफ़र एक ‘फास्ट ट्रैक मेमोरी लेन’ की तरह तय किया। उन्होंने बड़े भाई के शुरूआती दौर से लेकर उनके शिखर तक पहुँचने के सफ़र को, दिल की गहराइयों से याद किया। उन्हें जगजीत सिंह के दिल्ली में उनके घर पर आने, आकर ‘भरमा करेले और मूँग की दाल’ खाने की फरमाइश जैसी तमाम यादें आईं। उन्होंने भैया की तरह ही हारमोनियम बजाना बीच में रोककर कुछ मूड हल्का करने वाला अंदाज़ भी याद दिलाया। साथ ही
जगजीत साहब के इन सुपरहिट गीतों और ग़ज़लों की झलक पेश की। बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी / दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है / ये दौलत भी ले लो, ये शौहरत भी ले लो / होंठो से छू लो तुम / तुमको देखा तो ये ख़याल आया / तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो / परेशाँ रात सारी है सितारों तुम तो सो जाओ / होश वालों को ख़बर क्या, बेख़ुदी क्या चीज़ है / चिट्ठी न कोई संदेश,कहाँ तुम चले गये / सुनते हैं कि मिल जाती है हर चीज़ दुआ से।
वीणा की झंकार का, झरना था जगजीत: वीणा की झंकार का झरना था जगजीत / सात सुरों का बहता दरिया था जगजीत / रफ़्ता-रफ़्ता जिसमें सारी दुनिया डूब गई / मोसेक़ी की इक ऐसी धारा था जगजीत….कार्यक्रम के संचालन के दौरान डॉ.हरीश भल्ला ने अपने ख़ास अंदाज़ में जहाँ जगजीत सिंह पर यह कविता सुनाई। वहीं उन्होंने राजेश बादल की तारीफ़ में कहा -‘ क़लम के कमाल का, जिसका है अनमोल हुनर / पन्ने पर या परदे पर, क़िस्सा कहती उसकी नज़र / रचता है अद्भुत अफ़साने, उड़ता फिरता ये बादल / चुपके से दिल में आ बैठा हैं, ये आँख का काजल’।
मंजुल पब्लिशिंग हाउस,भोपाल से प्रकाशित किताब: राजेश बादल की किताब कहाँ तुम चले गये -दास्तान ए जगजीत सिंह भोपाल के मंजुल पब्लिशिंग हाउस ने प्रकाशित की है। 242 पेज की इस शोधपूर्ण पुस्तक को लिखने में राजेश बादल जी को दस साल तक निरंतर अथक प्रयास और श्रम करना पड़ा है। पुस्तक में जगजीत के बचपन से लेकर उन्हें स्थापित होने तक का सफर है। साथ ही उनके जानने वालों के विरल साक्षात्कार,चित्र आदि संग्रहित हैं। पहली बार सामने आये कई दिलचस्प क़िस्से हैं। पुस्तक से यह भी पता चलता है कि जगजीत सिंह का सफ़र एक आम आदमी की तरह ही कठिनाइयों और अभावों से भरा था। मगर उन्होंने अपने संघर्ष भरे सफ़र, मख़मली आवाज़ और पूरे मनोयोग से सीखे संगीत से वो कर दिखाया जिसकी गूँज अब पीढ़ियों तक सुनाई देती रहेगी। इंदौर स्टूडियो के यू ट्यूब चैनल पर देखें यह प्रोग्राम –

