विशेष प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। शोर और तमाशे के सांस्कृतिक दौर में ‘जयपुर लिटफेस्ट 2026’ की तीन शांत और गंभीर साहित्यिक शामें कुछ अलग रहीं। इसमें अपनेपन, स्मृति और टूटने के सवालों पर चर्चा हुई। जहां सरहदी दूरी कम हुईं और भाषाएं एक-दूसरे के करीब आईं। इसने अहसास कराया कि लिटरेचर से पॉलिसी तो नहीं बनाई जा सकती लेकिन यह पॉलिसी से भी कुछ कम ज़रूरी नहीं होता। यहां बातचीत के दरवाज़े खुले रहते हैं और जटिलताएं सरलीकरण से इनकार करती हैं।
टूटे-बिखरे भूगोल और अस्थिर समय में लेखक: ऑस्ट्रियाई कल्चरल फोरम, ऑस्ट्रियाई दूतावास नई दिल्ली और यूक्रेनी दूतावास नई दिल्ली द्वारा ऑस्ट्रियाई-यूक्रेनी सांस्कृतिक सहयोग के तहत प्रस्तुत, यह साहित्यिक कार्यक्रम इस पड़ताल के रूप में सामने आया कि लेखक टूटे-बिखरे भूगोल और अस्थिर समय पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। साहित्य को सजावट या पलायन के रूप में पेश करने के बजाय, इन सत्रों ने इसे एक जीवित, साँस लेने वाली प्रथा के रूप में स्थापित किया – एक ऐसी प्रथा जो इतिहास को दर्ज करती है, मिटाए जाने का विरोध करती है, और वर्तमान की तात्कालिक हिंसा से परे भविष्य की कल्पना करती है।
पहला सत्र: अपनेपन और विस्थापन की बातचीत: कार्यक्रम की शुरुआत ‘द ज्योग्राफी ऑफ़ बिलॉन्गिंग’ से हुई। इसमें ऑस्ट्रियाई लेखक एंड्रियास अनटरवेगर और भारतीय ग्राफिक उपन्यासकार सरनाथ बनर्जी ने बातचीत की, जिसका संचालन स्वाति चोपड़ा ने किया। चर्चा स्थान से शुरू हुई लेकिन जल्दी ही यह स्मृति, विस्थापन और उन अदृश्य नक्शों तक पहुँच गई जिन्हें लेखक अपने भीतर लिए चलते हैं। लेखन को प्रभावित करता इतिहास: अनटरवेगर ने बताया कि यूरोप का परिदृश्य – इतिहास, युद्ध और चुप्पी से भरा – आज भी लेखन को प्रभावित करता है, चाहे उसका नाम सीधे न लिया जाए। बनर्जी ने कहा कि अपनेपन की भावना कोई विरासत नहीं, बल्कि लगातार चलती रहने वाली बातचीत है। इस संवाद ने यह दिखाया कि साहित्य घर और निर्वासन के बीच की साधारण सीमाओं से आगे जाकर विस्थापन को भी रचनात्मक बना देता है।
दूसरा सत्र: कविता और अशांत भावनाएँ : दूसरे सत्र में कविताओं की बारी थी। इसमें कवि बद्री नारायण, पार्वती तिर्की, चार्मी छेड़ा, यूलिया मुसाकोव्स्का और राधा चक्रवर्ती शामिल हुए। अनीशा लालवानी द्वारा प्रस्तुत इस सत्र में कविता को सिर्फ अशांति का बयान नहीं, बल्कि उसे आत्मसात कर बदलने की ताकत के रूप में देखा गया। कविताओं में अपने परिवेश की पीड़ा: कविताओं में हाशिए पर पड़े इतिहास, पर्यावरणीय दुख, युद्ध और व्यक्तिगत नुकसान की झलक थी। इन सबने कविता की उस क्षमता को उजागर किया जिसमें गुस्सा और कोमलता, निराशा और उम्मीद – सब एक साथ सांस लेते हैं। खासकर यूक्रेनी कवि यूलिया मुसाकोव्स्का की संयमित कविताएँ बेहद असरदार रहीं। उन्होंने याद दिलाया कि संघर्ष के समय में कविता कम शब्दों में भी गहरी बात कह सकती है।
तीसरा सत्र: भाषा से परे कविता: अंतिम सत्र ‘बिटवीन अस: पोयम्स बियॉन्ड लैंग्वेज’ था। इसमें मुसाकोव्स्का और अनटरवेगर ने असद लालजी के संचालन में बातचीत की। ऑस्ट्रियन कल्चरल फोरम के डायरेक्टर माइकल पाल और यूक्रेन दूतावास के सेकंड सेक्रेटरी वलोडिमिर प्रितुला भी मौजूद थे। इस चर्चा का केंद्र था अनुवाद – जो केवल तकनीकी काम नहीं, बल्कि नैतिक और भावनात्मक जिम्मेदारी भी है। सवाल यह था कि जब किसी कविता का मूल संदर्भ हिंसा से जुड़ा हो, तो उसे दूसरी भाषा में ले जाने का क्या अर्थ है? अनुवाद में क्या बचता है और क्या बदल सकता है?
अनुवाद भरोसे का काम है: दोनों लेखकों ने कहा कि अनुवाद भरोसे का काम है – भरोसा कि दूसरी भाषा उस निजी अनुभव को सुरक्षित रखेगी। तीनों सत्रों ने मिलकर एक यात्रा बनाई: भूगोल से आवाज़ तक और फिर भाषाओं के बीच की नाजुक जगह तक। भारतीय लेखकों और मॉडरेटरों की मौजूदगी ने इसे केवल यूरोपीय चिंता नहीं, बल्कि साझा वैश्विक अनुभव बना दिया। आगे पढ़िये – रंग-राख में मंच पर बच्चों का बॉलीवुड! https://indorestudio.com/rang-rakh-nsd-children-drama-festival-2026/











