(डॉ. पुनीत बिसारिया)
इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। ज्योतिपर्व दीपावली पर यूँ तो बहुत से कवियों ने अनेक कविताएँ लिखीं। नज़्म, गज़लें, दोहे, पद आदि रचे किन्तु दो कविताएँ ऐसी हैं, जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। पहली नीरज जी की ‘जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना’ जो मैंने संभवतः कक्षा 8 में पढ़ी थी और आज भी हर दीपावली पर इसे गुनगुनाता हूँ और दूसरी है नज़ीर बनारसी की नज़्म ‘दीपावली’ जो उन्हीं के शब्दों में ‘मिरी साँसों को गीत औ र आत्मा को साज़ देती है’। इसके अलावा दीपावली को लेकर बहुत से यादगार फिल्मी गीत भी बने। सबसे पहले कवितायें।
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना / गोपालदास ‘नीरज’
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए ।
नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए ।
मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए ।
गोपाल दास नीरज की इस कविता की तरह नज़ीर बनारसी की रचना भी अद्भुत है। साहित्य की यह सुंदर रचना दीपपर्व पर हमारी अनुभूतियों और हमारी गंगा-जमनी तहज़ीब को बयान करती है।
दीपावली / नज़ीर बनारसी
मिरी साँसों को गीत और आत्मा को साज़ देती है / ये दीवाली है सब को जीने का अंदाज़ देती है।
हृदय के द्वार पर रह रह के देता है कोई दस्तक / बराबर ज़िंदगी आवाज़ पर आवाज़ देती है।
सिमटता है अंधेरा पाँव फैलाती है दीवाली / हँसाए जाती है रजनी हँसे जाती है दीवाली।
क़तारें देखता हूँ चलते-फिरते माह-पारों की / घटाएँ आँचलों की और बरखा है सितारों की।
वो काले काले गेसू सुर्ख़ होंठ और फूल से आरिज़ / नगर में हर तरफ़ परियाँ टहलती हैं बहारों की।
निगाहों का मुक़द्दर आ के चमकाती है दीवाली / पहन कर दीप-माला नाज़ फ़रमाती है दीवाली।
उजाले का ज़माना है उजाले की जवानी है / ये हँसती जगमगाती रात सब रातों की रानी है।
वही दुनिया है लेकिन हुस्न देखो आज दुनिया का / है जब तक रात बाक़ी कह नहीं सकते कि फ़ानी है।
वो जीवन आज की रात आ के बरसाती है दीवाली / पसीना मौत के माथे पे छलकाती है दीवाली।
फिल्मों में जब भी दीपावली से जुड़े कुछ पल या दृश्य आये। कहानी में ढले उन प्रसंगों को लेकर कुछ यादगार गीत भी बने। उन्हीं यादगार गीतों की श्रंखला को याद करना भी प्रासंगिक होगा।
दिवाली के कुछ यादगार फ़िल्मी गीत
1. दीपावली मनाई सुहानी । शिरडी के साईं बाबा
2. दीप जलेंगे दीप दीवाली । पैसा
3. आई दीवाली दीप जला जा । पगड़ी
4. दीवाली में अली राम रमज़ान में । मालिक एक
5.दीवाली फिर आ गयी सजनी । खजांची
6. एक वो भी दीवाली थी एक ये भी दीवाली है । नज़राना
7. आई अबकी साल दिवाली मुंह पर अपने खून मले। हक़ीक़त
8. आई दिवाली आई कैसे उजाले लाई। खजांची
9. कैसे मनाएँ दिवाली हम लाला अपना तो बारा महीने दिवाला। जॉनी वाकर
10. दीवाली आई दईया रे दईया। लीडर
11. आई दीवाली आई दीवाली। रतन
12. आज है दीवाली । आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया
13. इस रात दिवाली ये कैसी। सबसे बड़ा रुपैया
14. जगमगाती दीवाली की रात आ गयी । स्टेज
15. सरगमवाली तू दीवाली। फरार क़ैदी
16. हैप्पी दीवाली। होम डिलीवरी
17. आई है दीवाली सखी आई सखी आई। शीशमहल
18. जहाँ में आई दीवाली बड़े चराग जले। ताज
19 दीवाली की रात पिया घर आने वाले हैं। अमर कहानी
20. ओ दिवाली के दिए तुझमें जलता है या दिल जले उनके लिये। बिल्वमंगल
21. आई दिवाली दीपों वाली । महाराणा प्रताप
22. दिवाली बम्ब लगदी। दिवाली बम्ब
23. ज्योति कलश छलके। भाभी की चूड़ियाँ
24. दीपक जलाओ ज्योति जगाओ मन में। संगीत सम्राट तानसेन
दीपावली के प्रकाश की ‘पुनीत’ ‘दीप्ति’ आपका ‘प्रशस्ति’ पथ आलोकित करे। इसी कामना के साथ ज्योति पर्व की शत- शत बधाई। (लेखक बुंदेलखंड विश्वविद्यालय,झाँसी में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हैं। आप साहित्य और सिनेमा पर लेखन के लिये अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं।)

