Saturday, May 9, 2026
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जनता के रंगमंच ‘इप्टा’ की दिलचस्प है कहानी

इंदौर स्टूडियो डॉट कॉम। एक दौर था जब कला और फ़िल्म जगत में इप्टा यानी  भारतीय जन नाट्य संघ से जुड़े कलाकारों का बड़ा मान-सम्मान था। कला से जुड़े लोग इप्टा से जुड़ने को फ़ख़्र की बात समझते थे। देश के सांस्कृतिक और सामाजिक परिदृश्य को बदलने में यक़ीनन इप्टा ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। उसका आज भी महत्व कम नहीं हुआ है। इप्टा के औपचारिक स्थापना दिवस 25 मई को माना जाता है। इसी तारीख़ पर इप्टा के बीते दिनों को याद करना ज़रुरी है।        

25 मई 1943 को औपनीवेशीकरण, फासीवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ मुंबई में इप्टा की स्थापना हुई थी। उल्लेखनीय है कि इप्टा की स्थापना के स्वर्ण जयंती के अवसर पर भारत सरकार ने डाक टिकट भी जारी किया था। इप्टा, इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन का संक्षेप है। हिन्दी में इसे ‘भारतीय जन नाट्य संघ’, असम व पश्चिम बंगाल में ‘भारतीय गण नाट्य संघ’ व आन्ध्रप्रदेश में प्रजा नाट्य मंडली के नाम से जाना गया। इसका सूत्र वाक्य है ‘ पीपुल्स थियेटर स्टार्स द पीपुल ‘ यानी, ‘जनता के रंगमंच की असली नायक जनता है।’ प्रतीक चिन्ह सुप्रसिद्ध चित्रकार चित्त प्रसाद की कृति नगाड़ावादक है, जो संचार के सबसे प्राचीन माध्यम की याद दिलाता है।

आज की पीढ़ी को यह जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि भारतीय जन नाट्य संघसे ही वैचारिक रूप से भारतीय वामपंथी आंदोलन में सांस्कृतिक आंदोलन का हिस्सा बनी इप्टा से रंगमंच और फिल्मों की अनेक नामी गिरामी हस्तियां जुड़ीं।

इनमें से कुछ प्रमुख हैं- ए. के. हंगल, ख्वाजा अहमद अब्बास, राजेन्द्र सिंह बेदी, कृष्ण चंदर, पं. रविशंकर, कैफी आज़मी, हबीब तनवीर, सलिल चौधरी,शैलेन्द्र ,साहिर लुधियानवी,मज़ाज, मख्दूम, बलराज साहनी, भीष्म साहनी, एम.एस. सथ्यू, फारूख शेख, राजेन्द्र रघुवंशी, जैसे कई नामचीन कलाकार इप्टा से जुड़े रहे । एक समय फिल्म जगत में इप्टा से जुड़े कलाकारों का काफी सम्मान हुआ करता था । धीरे-धीरे फिल्मों के व्यवसायीकरण और फिर बाजारीकरण की अंधी दौड़ के चलते वैचारिकता एवं प्रतिबद्धता कहीं हाशिए पर चली गई। इसमें इप्टा के आंदोलन का धीमापन भी रहा। आजादी के एक लम्बे समय के पश्चात जब 7 वें 8वें दशक में जनआंदोलन अपने पूरे शबाब पर था, इप्टा ने फिर अहम भूमिका निभाई और देश में जनसरोकारों के प्रति अपनी सांस्कृतिक भूमिका का पूरी जिम्मेदारी से निर्वहन करते हुए देश में अपनी साख जमाई । मगर नौवें दशक की शुरुवात से काफी परिवर्तन महसूस होने लगे । विश्व में साम्यवादी आंदोलन की गिरावट,एनजीओ के उभार के साथ ही तेजी से एकध्रुवीय उदारीकरण एवं वैश्वीकरण का असर इप्टा पर भी दिखाई देने लगा । जन सरोकारों पर काम करने वाली इप्टा में भी जन की जगह धन के सरोकार ने कई लोगों को विचलित किया । ऐसे में इप्टा से अलग होकर अनेक नाट्य संस्थाएं उभरीं । इनमें से कुछ इप्टा के सिद्धांतों पर चलती रहीं मगर अधिकांश नए ज़माने और बाजारवाद के प्रभाव से खुद को बचा नहीं पाई और वैश्वीकरण के रंग ढंग में घुलमिल गईं । इवेन्ट मैनेजमैंट और महोत्सवों के जमाने में जनसरोकारों के प्रति कटिबद्धता वाकई आसान नहीं है, मगर इस कठिन दौर में देश के कई हिस्सों में प्रतिबद्ध व जुझारू रंगकर्मियों ने इप्टा की अलख जगाए रखी और इसके जनपक्ष को कायम रखने में अपनी अहम भूमिका निभाही । समर्पित और जुझारू साथियों की सक्रिय भागीदारी और मजबूत इरादों के बल पर इप्टा लगातार संघर्ष व कठिन दौर से गुजर जूझकर भी अपनी उपस्थिति कायम रखने में कामयाब रही है। 

हाल के वर्षों में एक बार फिर इप्टा सक्रिय होकर उभर रही है और कई स्थानों पर युवा वर्ग इप्टा से आकर्षित हो रहा है।आज देश भर में इप्टा की लगभग 600 इकाइयां कार्यरत हैं और इनमें से अनेक स्थानों पर इप्टा का स्थापना दिवस मनाया जाता है। आज जब नवपूंजीवाद, नव साम्राज्यवाद, फासीवाद और वैश्वीकरण रोज नए रूप में सामने आ रहे हैं । फासीवाद और नस्लवाद पूरे विश्व में नंगा नाच कर रही है और पूंजीवादी ताकतें पूरे विश्व को युद्ध और अराजकता के भंवर में फंसाकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। ऐसे कठिन समय में जन सरोकारों से जुड़ी तमाम संस्थाओं को और सक्रिय व एकजुट होकर संघर्ष करने की आवश्यकता है। ऐसे दौर में इप्टा की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है । हम आशा करते हैं कि विपरीत परिस्थितियों और संघर्ष के इस दौर में भी इप्टा अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता कायम रखते हुए जनसरोकार के प्रति समर्पित रहते हियेआम जन में लगातार वैज्ञानिक व सांस्कृतिक चेतना विकसित करती रहेगी ।

 

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